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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 173, कुल 350 में से

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पृष्ठ 173

परिच्छेदः २] भाषाटीकासमेता. १४९
क्योंकि समवायेन वह्न्यभावीय प्रतियोगितामें यद्यपि साध्यतावच्छेदक धर्मका
अभाव नहीं है तथापि साध्यतावच्छेदक संयोगसम्बन्धका अभाव है. एवं
"एकसत्त्वेपि द्वयं नास्ति" इस प्रतीतिके बलसे उभयाभाव पासकतेहैं; याते दोष
नहीं है. एवं अभावीय प्रतियोगितामें यदि साध्यतावच्छेदक धर्मका निवेश न करें
किन्तु "प्रतियोगितावच्छेदकसम्बन्धेन प्रतियोग्यनधिकरणभूतहेत्वधिकरणवृत्त्य-
भावप्रतियोगितासामान्ये यत्सम्बन्धावच्छिन्नत्वाभावः तेन सम्बन्धेन तद्धेतोः सामा-
नाधिकरण्यं व्याप्तिः" एतावन्मात्र लक्षण करें तो "वह्निमान् धूमात्" इसी स्थल-
में फिर अव्याप्ति होगी; क्योंकि यहां हेत्वधिकरणवृत्तिसंयोगेन घटाभावीय घटनिष्ठ
प्रतियोगितामें यत्सम्बन्धावच्छिन्नत्वाभाव नहींहै. किन्तु साध्यतावच्छेदक संयोगस-
म्बन्धावच्छिन्नत्वही है. एवं लक्षण अव्याप्त हुआ परन्तु यदि पूर्वोक्त सम्बन्ध तथा धर्म
उभयका निवेश करें तो दोष नहींहै; क्योंकि घटाभावीय घटनिष्ठ प्रतियोगितामें यद्य-
पि साध्यतावच्छेदक सम्बन्धावच्छिन्नत्व है तथापि साध्यतावच्छेदक वह्नित्व धर्माव-
च्छिन्नत्व नहीं है. एवं "एकसत्त्वेपि द्वयं नास्ति" इस प्रतीतिसे उभयाभाव पासक-
तेंहैं. प्रतियोगितामें उभयाभाव होनेसे पूर्वोक्त रीतिसे लक्षणसमन्वय होसकता है.
इसलिये प्रकृत लक्षणमें यत्सम्बन्धावच्छिन्नत्व यद्धर्मावच्छिन्नत्व उभयका निवेश
अवश्य करना उचित है.
इत्थं च कालो घटवान् कालपरिमाणादित्यादौ संयोगसम्बन्धेन
यो घटाभावस्तत्प्रतियोगिनो घटस्यानधिकरणे महाकाले वर्त-
मानः स एव संयोगेन घटाभावस्तस्य प्रतियोगितायां कालिकस-
म्बन्धावच्छिन्नत्वघटत्वावच्छिन्नत्वोभयाभावसत्त्वान्नाव्याप्तिः १६
भाषा-एवं "कालो घटवान् कालपरिमाणात्" इत्यादि स्थलमेंभी दोष नहीं;
क्योंकि यहां संयोगेन घटाभावीय घटनिष्ठ प्रतियोगितामें यद्यपि साध्यतावच्छेदक
घटत्वधर्मावच्छिन्नत्व है तथापि साध्यतावच्छेदक कालिक विशेषणतासम्बन्धावच्छि-
न्नत्व नहीं है. एवं "एकसत्त्वेऽपि द्वयं नास्ति" इस प्रतीतिबलसे उभयाभावसंयोगे-
न घटाभावीय घटनिष्ठ प्रतियोगितामें रहसकताहै. एवं "तेन कालिकविशेषणतासम्ब-
न्धेन तत् घटत्वधर्मावच्छिन्नस्य तत् कालपरिमाणरूपहेतोः सामानाधिकरण्यं व्याप्तिः"
यह व्याप्तिका लक्षण निर्दोष संगत होसकताहै १६।
धूमवान् वह्नेः इत्यादावतिव्याप्तिवारणाय सामान्यपदमुपात्तम्। १७।
शंका-इस लक्षणमें 'प्रतियोगितासामान्ये' क्यों कहा? किन्तु "यत्त