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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 166, कुल 350 में से

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पृष्ठ 166

१४२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
स्वरूप ऐसा हुआ कि-(साध्यतावच्छेदक सम्बन्धावच्छिन्न) या प्रतियोगिता तादृश
( प्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्नप्रतियोग्यनधिकरणं ) यत् ( हेतुतावच्छेदकसम्बन्धाव-
च्छिन्नहेतुतावच्छेदकावच्छिन्न ) हेत्वधिकरणं तादृश ( हेत्वधिकरणवृत्त्यभावयि
प्रतियोगितानवच्छेदकं यत् साध्यतावच्छेदकं तदवच्छिन्नसाध्यसामानाधिकरण्यं
व्याप्तिः ) १३ ।
ननु प्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्नस्य यस्य कस्यचित् प्रतियोगि-
नः तत्सामान्यस्य वाऽनधिकरणत्वम्, यत्किञ्चित्प्रतियोगि-
तावच्छेदकावच्छिन्नस्य वाऽनधिकरणत्वं विवक्षितम् ।
शंका-“विशिष्टसत्तावान् जातेः ” इत्यादि स्थलोंमें अतिव्याप्ति वारणार्थ आपने
प्रतियोग्यनधिकरणमें प्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्नानधिकरणकी विवक्षा करी है;
उसमें हम यह पूछते हैं कि- क्या प्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्न यत्किञ्चित् प्रति-
योगिका अनधिकरण कहते हो किंवा प्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्न यावत् प्रति-
योगिका अनधिकरण विवक्षित है? अथवा यत् किञ्चित् जो प्रतियोगितावच्छेदक धर्म
तदवच्छिन्नानधिकरण कहते हो ?
आद्ये कपिसंयोगी एतद्वृक्षत्वादित्यादावेवाव्याप्तिः। कपिसंयोगा-
भावस्य हि प्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्नो वृक्षावृत्तिरपि कपि-
संयोगो भवति तदनधिकरणं च वृक्ष इति ।
भाषा-इनमें यदि प्रथमपक्ष कहो तो “ वृक्षः कपिसंयोगवान् एतद्वृक्षत्वात्”
इस स्थलमें अव्याप्ति होगी; क्योंकि यहां साध्यतावच्छेदक समवायसम्बन्धावच्छिन्न
प्रतियोगितावच्छेदक धर्म कपिसंयोगत्वभी लेसकते हैं; तद्धर्मावच्छिन्न यत्किञ्चित्
प्रतियोगी शब्दसे भूतलवृत्ति कपिसंयोगभी लेसकतेहैं . तादृश भूतलवृत्ति कपिसं-
योगका अनधिकरण जो हेत्वधिकरण एतद्वृक्ष तद्वृत्त्यभाव “ वृक्षे भूतलवृत्तिक-
पिसंयोगो नास्ति ” इत्याकारक अभाव, एतादृशाभावीय प्रतियोगितावच्छेदकही
कपिसंयोगत्वरूप साध्यतावच्छेदक धर्म है; अनवच्छेदक साध्यतावच्छेदक धर्मके न
होनेसे अव्याप्तिरूप दोष हुआ. इस दोषके निवारणार्थ यदि प्रतियोगितावच्छेदका-
वच्छिन्न यावत् प्रतियोगीके अनधिकरणकी विवक्षा करें तौ यद्यपि “ वृक्षः कपिसंयो-
गवान् एतद्वृक्षत्वात्” इत्यादि स्थलमें दोषवारण होसकताहै; क्योंकि प्रतियोगिताव-
च्छेदक कपिसंयोगत्वावच्छिन्न यावत् कपिसंयोगका अनधिकरणीभूत हेत्वधिकरण
एतद्वृक्ष नहीं है किन्तु प्रतियोगितावच्छेदक घटत्वाद्यवच्छिन्न याव घटादिका अन-