न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १४७
ननु कालो घटवान् कालपरिमाणादित्यत्र प्रतियोगिव्यधिकरणा-
भावाप्रसिद्धिः, हेत्वधिकरणस्य महाकालस्य जगदाधारतया
सर्वेषामभावानां साध्यतावच्छेदकसम्बन्धेन कालिकविशेषण-
तया प्रतियोग्यधिकरणवृत्तित्वात् । अत्र केचित् । महाकालभे-
दविशिष्टघटाभावस्तत्र प्रतियोगिव्यधिकरणो महाकालस्य
घटाधारत्वेऽपि महाकालभेदविशिष्टघटानाधारत्वात्, महाकाले
महाकालभेदाभावात् । १५ ।
शङ्का-इस पूर्वोक्त समग्र लक्षणकी "कालो घटवान् कालपरिमाणात्" इस स्थलमें
अव्याप्ति है, क्योंकि यहां कालिकसम्बन्धसे घट साध्य है; और समवायेन कालपरि-
माण हेतु है; हेत्वधिकरणीभूत महाकाल कालिकविशेषणतासम्बन्धसे जगत् मात्रका
आश्रय है. एवं साध्यतावच्छेदक कालिकसम्बन्धसे यावद्वस्तुका अभाव स्वप्रतियोगिके
अधिकरण महाकालमें रहताहै. इस रीतिसे यहां प्रतियोगि व्यधिकरणाभावही प्रसिद्ध
नहीं होसकता. समाधान-यहां कईएक विद्वान् एसे कहतेहैं कि-हेत्वधिकरण महा-
कालमें अभावीय कालिकविशेषणताघटित सामानाधिकरण्य सम्बन्धसे महाकालभेद-
विशिष्ट घटका अभाव लेसकतेहैं, वही अभाव प्रतियोगि व्यधिकरणभी होसकताहै,
क्योंकि यद्यपि महाकाल घटका आधार है तथापि महाकाल भेदविशिष्ट घटका
आधार नहीं होसकता; क्योंकि अभावीय विशेषणतासम्बन्धसे महाकालमें महाकालभे-
दका अभाव है. भाव यह कि-विशिष्टाधिकरणता वहांही मानी जातीहै; जहां सामानाधि-
करण्य घटकीभूत विशेषण विशेष्यके सम्बन्धोंसे विशेषण विशेष्य उभयका सत्त्वलाभ
होवे एवं अभावीयविशेषणता सम्बन्धसे महाकालभेदके महाकालमें न रहनेसे
महाकालभेदविशिष्ट घटभी ‘ विशेषणाभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव होनेसे ’ नहीं
रहसकता-इति १५ ।
वस्तुतस्तु प्रतियोगितावच्छेदकसम्बन्धेन प्रतियोग्यनधिकरणी-
भूतहेत्वधिकरणवृत्त्यभावप्रतियोगितासामान्ये यत्सम्बन्धाव-
च्छिन्नत्वयद्धर्मावच्छिन्नत्वोभयाभावस्तेन सम्बन्धेन तद्धर्मा-
वच्छिन्नस्य तद्धेतुव्यापकत्वं बोध्यम् । व्यापकसामानाधिकरण्यं
च व्याप्तिः ।