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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 163, कुल 350 में से

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पृष्ठ 163

योग्यधिकरणमें रहनेवाला नहीं होना चाहिये. यदि ऐसा कहो तो यद्यपि 'वृक्षः क-
पिसंयोगवान् एतद्वृक्षत्वात्' इस स्थलमें तो दोष नहीं; क्योंकि संयोगमात्रका
यह स्वभाव है कि-यह वस्तुके किञ्चिदवयवावच्छेदेन उत्पन्न होताहै. इसलिये दर्शन-
कारोंने इसको 'अव्याप्यवृत्ति' माना है. जिस वस्तुकी एकही कालमें स्वाधिकर-
णमें भावाभाव उभयावगाहनी प्रतीति होजावे वह वस्तु नियमसे अव्याप्यवृत्ति होती
है; प्रकृतमें ऐसा संयोग है. एवं कपिसंयोगभी अव्याप्यवृत्ति होनेसे हेत्वधिकरणवृ-
त्त्यभावका प्रतियोगि नहीं होसकता, किन्तु घटाद्यभावही लक्षणघटक होगा. अभा-
वीय प्रतियोगिताके अवच्छेदक घटत्व पटत्वादि धर्म होंगे; अनवच्छेदक साध्यताव-
च्छेदक कपिसंयोगत्वरूप धर्म होगा. एवं पूर्वोक्तस्थलमें तो इसरीतिसे दोष नहीं;
परन्तु तथापि 'प्रतियोगिव्यधिकरण' इस अंशका 'प्रतियोग्यधिकरणवृत्तित्व' ऐसा
अर्थ करनेसे "घटः संयोगवान् सत्त्वात्" इस स्थलमें अतिव्याप्तिरूप दोष होगा;
क्योंकि यहां व्यभिचारस्थल हेत्वधिकरण गुणकर्म हैं. उनमें यद्यपि संयोगरूप-
साध्यका अभावभी पासकतेहैं तथापि संयोगरूप साध्यका अभाव पूर्वोक्त रीतिसे
लक्षणघटक नहीं होसकता; क्योंकि संयोगरूप साध्यका अभाव पूर्वोक्तरीतिसे
स्वप्रतियोग्यधिकरणावृत्ति नहीं है किन्तु अव्याप्यवृत्ति होनेसे स्वप्रतियोग्यधिकरण
वृत्तिही है; इसलिये यह अभाव लक्षणघटक नहीं होसकता. एवं यहांभी हेत्वधिक-
रणवृत्ति घटाद्यभाव लेनेसे अभावीय प्रतियोगितावच्छेदक घटत्वादि धर्म होंगे अन-
वच्छेदक साध्यतावच्छेदक संयोगत्वरूप धर्म होगा. एवं अलक्ष्यस्थलमें लक्षण
संगत होनेसे अतिव्याप्ति हुई.
हेत्वधिकरणे प्रतियोग्यनधिकरणवृत्तित्वविशिष्टस्य विवक्षित-
त्वात्। स्वप्रतियोग्यनधिकरणीभूतहेत्वधिकरणवृत्त्यभाव इति
निष्कर्षः। १०।
समाधान-हेत्वधिकरणवृत्त्यभावके विशेषणीभूत 'प्रतियोगिव्यधिकरण'
अंशका अर्थ हम पूर्वोक्त रीतिसे नहीं करते; किन्तु 'प्रतियोगिव्यधिकरण' कथनसे
प्रतियोग्यनधिकरणवृत्तित्व विशिष्ट अभावकी हेत्वधिकरणमें विवक्षा करते हैं अर्थात्
इसका भाव यह है कि-हेत्वधिकरण वृत्त्यभाव अपने प्रतियोगिके अनधिकरणीभूत
हेत्वधिकरणमें वर्तनेवाला होना चाहिये. ऐसा अर्थ करनेसे पूर्वोक्त उभयस्थलमें
दोष नहीं क्योंकि “वृक्षः कपिसंयोगवान् एतद्वृक्षत्वात्” यहां अपने प्रतियोगिका
अनधिकरणीभूत हेत्वधिकरण वृत्त्यभाव कपिसंयोगाभाव तो होही नहीं सकता. यद्यपि
कपिसंयोगाभावभी मूलावच्छेदेन वृक्षमें रहताहै तथापि वह अभाव अपने प्रतियोगिके