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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 169, कुल 350 में से

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पृष्ठ 169

परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १४५

अव्याप्तिरूप दोष अवश्य है,क्योंकि यहां साध्यतावच्छेदक सम्बन्धस्वरूपहै और स्व-
रूपसम्बन्धसे वस्तुमात्रका अभाव पूर्वक्षणवृत्तित्वविशिष्ट स्वाभात्मक प्रतियोगिके साथ
हेत्वधिकरणह्रदादिकोंमें एकाधिकरणमें वृत्तिहै एवं अभावसाध्यक स्थलमें प्रतियोगिव्यधि
करणाभावप्रसिद्धहोनेसे अव्याप्तिरूप दोषनियतहै. एतद्दोषपरिहारार्थयदि 'यत्किञ्चित्
जो प्रतियोगितावच्छेदक धर्म तदवच्छिन्न यावत् प्रतियोगिका अनधिकरण' इस तृतीय-
पक्षका आश्रयण करो तो यद्यपि "ह्रदो धूमाभाववान् वह्नयभावात्"इत्यादि स्थलमें दोष
नहीं है क्योंकि यहां यत्किञ्चित् प्रतियोगितावच्छेदक धर्मसे घटत्वादि धर्मोंका ग्रहण
होसकता है. तदवच्छिन्न यावत् प्रतियोगि घटादिही होंगे तदनधिकरण हेत्वधिकरण
जलह्रद तद्वृत्त्यभावीय प्रतियोगितावच्छेदक घटत्वादि धर्म अनवच्छेदकसाध्यताव-
च्छेदक धूमाभावत्व तदवच्छिन्नधूमाभाव उसके साथ ह्रदात्मकाधिकरणमें वह्नय-
भावरूप हेतुका सामानाधिकरण है. एवं अव्याप्तिरूप दोष नहीं.
तृतीये तु कपिसंयोगाभाववान् आत्मत्वादित्यादावव्याप्तिः ।
तत्रात्मवृत्तिकपिसंयोगाभावाभावः कपिसंयोगः,तस्य च गुण-
त्वात् तत्प्रतियोगितावच्छेदकं गुणसामान्याभावत्वमपि तदव-
च्छिन्नानधिकरणत्वं हेत्वधिकरणस्यात्मन इति ।
भाषा-तथापि यत्किञ्चित् प्रतियोगितावच्छेदक धर्मके ग्रहण करनेसे “ आत्मा
कपिसंयोगाभाववान् आत्मत्वात् ” इस स्थलमें अव्याप्तिरूप दोष होगा. यद्यपि यहां
घटाभावीय यत्किञ्चित् प्रतियोगिताके अवच्छेदक घटत्वधर्मावच्छिन्नका अनधिकरण
हेत्वधिकरण आत्मा होसकताहै; इसलिये प्रतियोगि व्यधिकरणाभावकी अप्रसिद्धिनि-
बन्धन अव्याप्तिरूप दोष नहीं है तथापि यत्किञ्चित् प्रतियोगितावच्छेदक धर्मसे
साध्यतावच्छेदक धर्मका व्यापकीभूत धर्मभी लेसकते हैं. इस तात्पर्यसे अव्याप्ति है.
उसका प्रकार यह है कि-हेत्वधिकरण आत्मवृत्ति जो कपिसंयोगाभावाभाव वह कपि-
संयोग स्वरूप हुआ और संयोगकी गणना दशसंख्यादि सामान्यगुणोंमें है. एवं साध्या-
भावरूप कपिसंयोग गुणसामान्यस्वरूपभी हुआ. उसकी प्रतियोगिता जैसे कपिसंयो-
गाभावमें है वैसे गुणसामान्याभावमेंभी रही. एवं अभावीय प्रतियोगिताका अवच्छेदक
धर्म्म कपिसंयोगाभावत्वका व्यापकीभूत गुणसामान्याभावत्वभी होसकताहै; क्योंकि
हेत्वधिकरण आत्मामें “ सामान्यगुणो नास्ति ” इत्याकारक अभाव नहीं पासकते
किन्तु गुणसामान्याभावाभाव पासकतेहैं. उसकी प्रतियोगिता गुणसामान्याभावमें रहेगी,
प्रतियोगितावच्छेदक धर्म गुणसामान्याभावत्व होगा,उसीकी यत्किञ्चित् प्रतियोगिता-
वच्छेदक धर्मसे ग्रहण करें तो तदवच्छिन्न गुणसामान्याभाव होगा. उस गुणसामान्या-
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