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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 350 में से

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पृष्ठ 168

१४४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
साध्यतावच्छेदकसम्बन्धेन तत्प्रतियोग्यनधिकरणत्वमस्त्येवेति
कथं प्रतियोगिव्यधिकरणाभावाप्रसिद्धिरिति वाच्यम्। घटाभावे
यो वह्न्यभावस्तस्य घटाभावात्मकतया घटाभावस्य वह्निरपि
प्रतियोगी तदधिकरणं च पर्वतादिरित्येवं क्रमेण प्रतियोगि
व्यधिकरणस्याप्रसिद्धत्वात् ।
सिद्धान्ती-“वह्निमान् धूमात्” इत्यादि स्थलमें घटाभावादिको पूर्वोक्त रीतिसे
यद्यपि पूर्वक्षणवृत्तित्वविशिष्टस्वाभावात्मक प्रतियोगिके साथ पर्वतादिमें समानाधि-
करण है तथापि “ ज्ञानवान् द्रव्यत्वात् ” इत्यादि स्थलमें अतिव्याप्ति वारणार्थ
साध्यतावच्छेदक सम्बन्धसे प्रतियोग्यनधिकरणत्व विवक्षित है. प्रकृतमें साध्यतावच्छे-
दक सम्बन्ध संयोग है. एवं संयोगसम्बन्धसे घटका तथा स्वाभावात्मक प्रतियोगिका
अनधिकरण हेत्वधिकरण है इसलिये प्रतियोगि व्यधिकरणाभावाप्रसिद्धि निबन्धन
दोष नहीं. वादी-यही दोष प्रकारान्तरसेभी होसकता है. जैसे-हेत्वधिकरण पर्वतमें
जो घटाभाव उस घटाभावात्मकाधिकरणमें लिया वह्न्यभाव वह वह्निका अभाव
घटाभावस्वरूप हुआ; क्योंकि अभावाधिकरणमें रहनेवाले अभावको विद्वान् लोग
अधिकरणस्वरूपही मानते हैं. एवं उस अभावका प्रतियोगी वह्नि तथा घट दोनों होंगे;
उनमें वह्निरूप प्रतियोगीके अधिकरण पर्वतादिमें वह अभावप्रतियोगिव्यधिकरण नहीं
है. एवं प्रतियोगि व्यधिकरणाभावाप्रसिद्धि पुनरपि तादवस्थ्य है.
यदि च घटाभावादौ वह्न्यभावादिर्भिन्न इत्युच्यते, तथापि धूमा-
भाववान् वह्न्यभावादित्यादावव्याप्तिः । तत्र साध्यतावच्छेदकस-
म्बन्धः स्वरूपसम्बन्धस्तेन च सम्बन्धेन सर्वस्यैवाभावस्य पूर्व-
क्षणवृत्तित्वविशिष्टस्वाभावात्मकप्रतियोग्यधिकरणत्वं हेत्वधि-
करणस्येति ।
सिद्धांती-हम लोग अभावाधिकरणक अभावको अधिकरणस्वरूप नहीं मानते;
इसलिये घटाभावमें रहनेवाला वह्न्यभाव घाटाभावात्मक कभी नहीं होसकता; किन्तु
पृथक् होनेसे स्वप्रतियोग्यधिकरणसे भिन्नाधिकरणमेंही नियमसे रहेगा. एवं प्रति-
योगि व्यधिकरणाभावकी अप्रसिद्धि नहीं है. वादी-आपके ऐसे कथनसे यद्यपि
“वह्निमान् धूमात्” इत्यादि स्थलमें प्रतियोगिव्यधिकरणाभावाप्रसिद्धिनिबन्धन अस-
म्भवरूप दोष नहीं है तथापि “ह्रदो धूमाभाववान् वह्न्यभावात्” इत्यादि स्थलमें