न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
अथानुमानपरिच्छेदः २.
भाषाकारकृतमंगलाचरणम् ।
यन्नामसिंहैकसुकीर्तनेन भूयोऽन्तरायाश्च शृगालयन्ति ॥
पद्मेक्षणः पावनपादपद्मः पायात्सदा श्रीगुरुनानको नः ॥ १ ॥
अनुमिति व्युत्पादयति, व्यापारस्त्विति-
भाषा-अनुमान प्रमाण बहुवादिसम्मत है इसलिये हेतु हेतुमद्भावसङ्गतिसे प्र-
त्यक्षनिरूपणानन्तर 'व्यापारस्तु परामर्शः' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार अनुमान प्रमाणका
निरूपण करतेहैं-
व्यापारस्तु परामर्शः करणं व्याप्तिधीर्भवेत् ॥६६॥
अनुमायां -
भाषा-अनुमित्यात्मक ज्ञानमें व्याप्तिज्ञानको कारणता है और परामर्शात्मक ज्ञान
मध्यमें व्यापार है.
अनुमायामनुमितौ व्याप्तिज्ञानं करणं, परामर्शो व्यापारः।तथा-
हि । येन पुरुषेण महानसादौ धूमे वह्नेर्व्याप्तिर्गृहीता पश्चात्स
एव पुरुषः क्वचित् पर्वतादविच्छिन्नमूलां धूमलेखां पश्यति,
तदनन्तरं धूमो वह्निव्याप्य इत्येवं रूपं व्याप्तिस्मरणं तस्य भव-
ति, पश्चाच्च वह्निव्याप्यधूमवानयमिति ज्ञानं भवति स एव
परामर्श इत्युच्यते । तदनन्तरं पर्वतो वह्निमानिति ज्ञानं जायते,
तदेवानुमितिः।
भाषा-अनुमितिज्ञानके प्रति व्याप्ति ज्ञानको करणता और परामर्श व्यापार
इस रीतिसे है कि-जिस पुरुषने महानसादिस्थलोंमें “यत्र२धूमस्तत्र२ वह्निः” इत्या-
कारक 'सहचर्यनियमरूपाव्याप्ति' वह्नि निरूपित धूमहेतु विषयक अनेक वार ग्रहण
करी है. फिर पीछे दैवात् वही पुरुष किसी पर्वतादिके समीप जायकर ऊपरनीचेतक
एकरस सरल लम्बायमान धूम शिखाको देखकर पीछे महानसादिमें गृहीत व्याप्ति-
को स्मरण करता है कि "धूम वह्निनिरूपित व्याप्तिका आश्रय है” इत्याकारक व्याप्ति
स्मरणके पीछे उसी पुरुषको "वह्निनिरूपित व्याप्तिका आश्रय जो धूम उसवाला यह
परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १२३
है" इत्याकारक ज्ञान होता है. इसी ज्ञानको शास्त्रमें परामर्शात्मक ज्ञान कहते हैं,
इस ज्ञानके पीछे "पर्वतो वह्निमान्" ऐसा ज्ञान होता है यही ज्ञान अनुमितिरूप है.
अत्र प्राचीना व्याप्यत्वेन ज्ञायमानं धूमादिकं लिङ्गमनुमितिक-
रणमिति वदन्ति, तद्दूषयति, ज्ञायमानमिति-
भाषा-यहां प्राचीन नैयायिक लोग व्याप्ति आश्रयत्वेन ज्ञातहुए धूमादि हेतुओं-
को अनुमितिकी करणता कहतेहैं और लिङ्गपरामर्शको मध्यमें व्यापार मानतेहैं; उ-
सको 'ज्ञायमान' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार दूषित करतेहैं-
- ज्ञायमानं लिङ्गं तु करणं न हि ।
अनागतादिलिङ्गेन न स्यादनुमितिस्तदा ॥ ६७ ॥
भाषा-ज्ञातहुआ हेतु अनुमितिका करण नहीं होसकता, यदि ऐसा होय तो अती-
तानागत हेतुओंसे अनुमिति ज्ञान नहीं हुआ चाहिये ॥ ६७ ॥
लिङ्गस्यानुमित्यकरणत्वे युक्तिमाह । अनागतादीति ।
यद्यनुमितौ लिङ्गं करणं स्यात् तदाऽनागतेन विनष्टेन वा लिङ्गे-
नानुमितिर्न स्यात्, अनुमितिकरणस्य लिङ्गस्य तदानीमभावात्-
इति ॥ ६७ ॥
भाषा-लिङ्गको करण न होनेमें युक्ति यह है कि-यदि अनुमितिके प्रति लिंगको
करणता होय तो "इयं यज्ञशाला वह्निमती भविष्यति भाविधूमात्" एवं "इयं यज्ञशाल
वह्निमत्य्यासीत् भूतधूमात्" इत्यादि अनागत तथा विनष्ट हेतुओंसे अनुमिति नहीं होनी
चाहिये, क्योंकि अनुमिति कारणीभूत हेतु उस कालमें विद्यमान नहींहै. शंका-परा-
मर्शरूप व्यापार सम्बन्धसे स्वातीतानागत कालमेंभी हेतु विद्यमान है याते कुछ
दोष नहीं. समाधान-अतीतानागत लिङ्गको परामर्शकी जनकताही सिद्ध नहीं; इस
लिये परामर्श अतीतानागत लिङ्गका व्यापार नहीं बन सकता-इति ॥ ६७ ॥
व्याप्यस्य पक्षवृत्तित्वधीः परामर्श उच्यते ।
भाषा-साध्यनिरूपित व्याप्तिआश्रयहेतुको पक्षवृत्तित्वावगाहनी बुद्धिका नाम 'प-
रामर्श' है.
व्याप्यस्येति।व्याप्तिविशिष्टस्य पक्षेण सह वैशिष्ट्यावगाहि ज्ञान-
मनुमितिजनकम्, तच्च व्याप्यः पक्ष इति ज्ञानं पक्षो व्याप्यवा-
१२४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
निति ज्ञानं वा । अनुमितिस्तु पक्षे व्याप्य इति ज्ञानात् पक्षे सा-
ध्यमित्याकारिका, पक्षो व्याप्यवानिति ज्ञानात् पक्षः साध्यवा-
नित्याकारिका । द्विविधादपि परामर्शात् पक्षः साध्यवानित्येवा-
नुमितिरित्यन्ये ।
भाषा—साध्यनिरूपित व्याप्तिविशिष्ट हेतुका पक्षके साथ वैशिष्ट्यावगाहि ज्ञान अनु-
मितिका जनक है; उसीका नाम 'परामर्श' है. उसी परामर्शज्ञानके विशेषणविशेष्यभावके
विपर्याससे दो स्वरूप हैं; उनमें एक तो पक्षप्रकारक व्याप्तिविशिष्टविशेष्यक 'व्याप्यः
पक्षे' इत्याकारक ज्ञान है और दूसरा व्याप्तिविशिष्ट प्रकारक पक्षविशेष्यक "पक्षो
व्याप्यवान्" इत्याकारक ज्ञान है. एवं कारणीभूत परामर्शके आकारमें भेद होनेसे
अनुमितिके आकारमेंभी भेद होता है अर्थात् प्रथम परामर्शसे पक्षप्रकारक साध्य
विशेष्यक "पक्षे साध्यं" इत्याकारक अनुमिति ज्ञान होताहै और द्वितीय परामर्शसे
साध्यप्रकारक पक्षविशेष्यक "पक्षः साध्यवान्" इत्याकारक अनुमितिज्ञान होताहै और
कई एक नवीन नैयायिक ऐसा मानतेहैं कि—पूर्वोक्त पक्षविशेष्यक तथा व्याप्तिविशि-
ष्टविशेष्यक उभयविध परामर्शसे साध्यप्रकारक पक्षविशेष्यक 'पक्षः साध्यवान्' इत्या
कारक एकही अनुमिति होती है—इति। पूर्वोक्त रीतिसे लिङ्गदर्शन व्याप्तिस्मरण औ-
र परामर्श इन तीनोंज्ञानोंके पश्चात् अनुमिति ज्ञानकी उत्पत्ति मानी है. उनमें पराम-
र्श ज्ञानको अस्वीकार करता हुआ मीमांसक कहताहै.
ननु वह्निव्याप्यधूमवान् पर्वत इति ज्ञानं विनाऽपि यत्र पर्वतो
धूमवानिति प्रत्यक्षं ततो धूमो वह्निव्याप्य इति स्मरणं भवति,
तत्र ज्ञानद्वयादेवानुमितिदर्शनात्, व्याप्तिविशिष्टवैशिष्ट्यावगा-
हि ज्ञानं सर्वत्र न कारणं किंतु व्याप्यतावच्छेदकप्रकारकपक्ष-
धर्मताज्ञानत्वेनैव कारणत्वमावश्यकत्वात्, विशिष्टवैशिष्ट्य-
ज्ञानकल्पने गौरवाच्चेति चेत् । न ।
शंका—जिस स्थलमें "पर्वतो धूमवान्" इत्याकारक प्रत्यक्ष हुआ ह तथा उसके पी-
छे "धूमो वह्निनिरूपितव्याप्त्याश्रयः" इत्याकारक जहां स्मरण हुआ है वहां इन ज्ञानद्वयसे
भी अनुमितिदेखनेमें आतीहै; इसलिये "वह्निव्याप्यधूमवानयं पर्वत:' इत्याकारक विशिष्ट-
वैशिष्ट्यावगाहि ज्ञानको अनुमितित्वावच्छिन्न यावत् अनुमितिके प्रति कारण नहीं
कहसकते, किन्तु व्याप्यतावच्छेदक 'धूमत्व' प्रकारक जो "पर्वतो धूमवान्" इत्याका-
रक पक्षधर्मताज्ञान तादृश ज्ञानत्वेन कारणता उभयवादी सिद्ध नियतपूर्ववृत्ति होनेसे
अवश्य माननेयोग्य है. ऐसे स्थलमें “वह्निव्याप्यधूमवानयं पर्वतः” इत्याकारक
विशिष्टवैशिष्ट्यावगाहि तृतीयज्ञानकी कल्पना करनी उपस्थिति कृत गौरवभी
है.-इति ।
व्याप्यतावच्छेदकाज्ञानेऽपि वह्निव्याप्यवानिति ज्ञानादनुमित्यु-
त्पत्तेर्लाघवाच्च व्याप्तिप्रकारकपक्षधर्मताज्ञानत्वेनैव कारणत्वम् ।
किंच धूमवान् पर्वत इति ज्ञानादनुमित्यापत्तिः, व्याप्यताव-
च्छेदकीभूतधूमत्वप्रकारकपक्षधर्मताज्ञानस्य सत्त्वात् ।
समाधान- “ अयमालोको धूमो वा ” इत्याकारक सन्देह स्थलमें
व्याप्यतावच्छेदक प्रकार ‘ धूमत्व ’ प्रकारक निर्णय न होनेसेभी “वह्न्य-
भाववदवृत्तिमानयमालोको धूमो वा ” इत्याकारक ज्ञानसे अनुमिति उत्पन्न
होती है इसलिये व्याप्यतावच्छेदक प्रकारक पक्षधर्मताज्ञानको वहां
व्यभिचारी होनेसे हरएक स्थलमें कारण नहीं मान सकते, किन्तु ‘व्याप्यतावच्छेदक
प्रकारकत्व’ की अपेक्षासे व्याप्तिप्रकारक पक्षधर्मताज्ञानत्वेन कारणता माननेमें अ-
वच्छेदक उपस्थिति अभावप्रयुक्त लाघव है. मीमांसक-आपने अवच्छेदकका लाघव
दिखलाया परन्तु पूर्वोक्त ज्ञानद्वयसे अनुमिति मानना मध्यमें परामर्शात्मक ज्ञानको
न स्वीकार करना तो हमारे मतमें परमलाघव है. नैयायिक-किञ्च व्याप्यता-
वच्छेदकादि अनवगाहि “धूमवान् पर्वतः” इत्याकारक ज्ञानसे अनुमिति होनी-
चाहिये;क्योंकि आपके कथनानुकूल यह ज्ञानभी व्याप्यतावच्छेदकी भूतधूमत्वप्रका-
रक पक्षधर्मता ज्ञानरूपही है.
न चगृह्यमाणव्याप्यतावच्छेदकप्रकारकपक्षधर्म्मताज्ञानस्य हेतु-
त्वमिति वाच्यम् । चैत्रस्य व्याप्तिग्रहे मैत्रस्य पक्षधर्मताज्ञानाद-
नुमितिः स्यादिति ।
मीमांसक-अनुमितिज्ञानके अव्यवहित पूर्व वर्तमान कालमें नेत्रादि इन्द्रियोंसे
ज्ञात हुए जो व्याप्यतावच्छेदकादि तादृश व्याप्यतावच्छेदकप्रकारक पक्षधर्मता
ज्ञानत्वेन हेतुता है इसलिये कालान्तरीय तादृश ज्ञानको लेकर दोष नहीं है. नैया-
यिक-तथापि महानसादिकोंमें चैत्रके व्याप्ति ग्रहण करनेसे और उसके भाई मैत्र-
को “पर्वतो धूमवान्” इत्याकारक व्याप्यतावच्छेदकप्रकारक पक्षधर्मता ज्ञान होनेसे
“पर्वतो वह्निमान्” इत्याकारक अनुमिति होनी चाहिये.
१२६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
यदि तु तत्पुरुषीयगृह्यमाणव्याप्यतावच्छेदकप्रकारकं तत्पुरु-
षीयपक्षधर्मताज्ञानं तत्पुरुषीयानुमितौ हेतुरित्युच्यते । तदा
ऽनन्तकार्यकारणभावः ।
मीमांसक-दूसरे पुरुषके व्याप्तिज्ञानसे तथा दूसरे पुरुषके पक्षधर्मताज्ञानसे
दूसरेको अनुमिति नहीं होय सकती इसलिये जिस पुरुषको व्याप्तिज्ञान हुआहै तथा
जिस पुरुषको व्याप्यतावच्छेदक प्रकारक पक्षधर्मताज्ञान हुआहै वह ज्ञान उसी पुरु-
षके अनुमितिज्ञानमें हेतु होसकताहै.नैयायिक-ऐसा कहनेसे आपको प्रतिपुरुषभे-
दसे अनन्त कार्यकारणभावकी कल्पना करनेमें महागौरव होगा.
मन्मते तु समवायेन व्याप्तिप्रकारकपक्षधर्मताज्ञानं समवायेना-
नुमिति जनयतीति नानन्तकार्यकारणभावः ।
मीमांसक-प्रतिपुरुषभेदसे कार्यकारणभेदकी कल्पना तो आपकेभी तुल्यही
है. नैयायिक-मेरे मतमें तो समवायसम्बन्धसे व्याप्तिप्रकारक पक्षधर्मता ज्ञान
जहां होय वहां समवायसम्बन्धसे अनुमितिज्ञानको उत्पन्न करता है. इसलिये प्रति-
पुरुषभेदसे अनन्त कार्यकारणभावरूप दोष मेरे मतमें नहीं है.
यदि तु व्याप्तिप्रकारकं ज्ञानं पक्षधर्मताज्ञानं च स्वतन्त्रं कारण-
मित्युच्यते, तदा कार्यकारणभावद्वयम्, ।
मीमांसक-हमारे मतमें “वह्निव्याप्यः” इत्याकारक व्याप्तिप्रकारक ज्ञानको
(स्वतंत्र) जुदा कारणता है और “धूमवान् पर्वतः” इत्याकारक पक्षधर्मता ज्ञानको जुदा
कारणता है; ऐसा कहनेसे तत्तत्पुरुषीयत्वके निवेशकरनेकाभी कुछ काम नहीं
क्योंकि मैत्रआत्मामें अनुमितिज्ञानके स्वतंत्र हेतुभूत व्याप्तिज्ञानका अभाव होनेसे
चैत्रके व्याप्तिज्ञानकालमें उस व्याप्तिज्ञानसे शून्य मैत्रको अनुमित्यापत्ति होही नहीं
सकती; इसलिये गौरवभी नहींहै. नैयायिक-ऐसा माननेसेभी व्याप्तिप्रकारक पक्षधर्म-
ताज्ञानत्वेन कारणता है या पक्षधर्मताविषयक व्याप्तिप्रकारक ज्ञानत्वेन कारणता है ?
इस प्रकार विशेष्य विशेषणभावके विपर्यास करनेसे कार्यकारणभावद्वय सिद्ध होगा.
वह्निव्याप्यो धूमः, आलोकवान् पर्वतः, इति ज्ञानादप्यनुमितिः
स्यादिति । इत्थं च यत्र ज्ञानद्वयं तत्रापि विशिष्टज्ञानं कल्प-
नीयं फलमुखगौरवस्यादोषत्वादिति ।
मीमांसक-इस प्रकारका कार्यकारणभावद्वय तो विनिगमनाविरहसे आपकोभी
माननाही होगा. नैयायिक-यह कार्यकारणभावद्वय तो हमभी मानतेहैं; परन्तु
परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १२७
आपके मतमें “वह्निव्याप्यो धूमः” तथा “आलोकवान् पर्वतः” इत्याकारक
ज्ञानद्वयसेभी अनुमितिज्ञान होना चाहिये; क्योंकि आपकी पूर्व कही रीतिसे व्याप्ति-
प्रकारक ज्ञान तथा पक्षधर्मता ज्ञान कारणरूपेण विद्यमान है; परन्तु ऐसे स्थलमें
अनुमितिका होना अनुभवसिद्ध नहीं. मीमांसक-आपके मतमेंभी पूर्वोक्त ज्ञान-
द्वयसे अनुमिति क्यों नहीं होती ? नैयायिक-हमारे मतमें तो व्याप्तिप्रकारतानि-
रूपित हेतुप्रकारता निरूपित जो पक्षनिष्ठ विशेष्यताशालि ज्ञान तादृश ज्ञानत्वेन
ज्ञानको अनुमितिज्ञानके प्रति हेतुता विवक्षित है, इसलिये “ वह्निव्याप्यो धूमः,
आलोकवान् पर्वतः” इत्याकारक ज्ञानसे अथवा “धूमो वह्निव्याप्यः, धूमवान् पर्वतः”
इत्याकारक ज्ञानसे अनुमितिकी आपत्ति नहीं होसकती; क्योंकि इन दोनों स्थलोंमें
व्याप्तिप्रकारतानिरूपित धूमनिष्ठ विशेष्यताका पर्वतविशेष्यतानिरूपित प्रकारतारूपेण
भान नहीं है; इसलिये जिस स्थलमें ज्ञानद्वय है वहांभी परामर्शात्मक विशिष्ट
ज्ञानकी कल्पना अवश्य करनी चाहिये. फलमुखगौरव दोषके वास्ते नहीं होता
अर्थात् कार्यकारणभावग्रहरूप फलके ( मुख ) अधीन होनेवाला गौरवज्ञान दोष-
कर नहीं है.
व्याप्यो नाम व्याप्त्याश्रयः, तत्र का व्याप्तिरित्यत आह,
व्याप्तिरिति-
भाषा-व्याप्य पक्ष उभयवैशिष्ट्यावगाहि परामर्शात्मक ज्ञान स्वसिद्धिमें व्याप्ति
ज्ञानकी अपेक्षा करता है, इसलिये 'प्रकृतसिद्धयर्थचिन्तन'रूपउपोद्घातसङ्गतिसे परामर्श
के अनन्तर व्याप्तिस्वरूप निरूपणार्थ टीकाकार कहते हैं कि-‘व्याप्य’ नाम व्याप्तिके
आश्रयका है परन्तु व्याप्य घटकीभूत व्याप्ति कैसी है, इसपर मूलकार कहता है-
व्याप्तिः साध्यवदन्यस्मिन्नसम्बन्ध उदाहृतः ॥ ६८ ॥
भाषा-साध्यवालेसे भिन्नाधिकरणमें हेतुका सम्बन्ध न होनाही हेतुनिष्ठ व्याप्ति
है अर्थात् व्याप्तिविशिष्ट हेतुका साध्यवद् भेदाधिकरणमें नियमसे वृत्तित्वाभाव
होना चाहिये ॥ ६८ ॥
साध्यवदन्येति । वह्निमान् धूमादित्यादौ साध्यो वह्निः
साध्यवान्महानसादिस्तदन्यो जलह्रदादिस्तदवृत्तित्वं धूमस्ये-
ति लक्षणसमन्वयः । १ ।
भाषा-“वह्निमान् धूमात्” इत्यादिस्थलमें साध्य वह्नि है, साध्यवाले महानसादि
हैं; साध्यवालोंसे भिन्नाधिकरण जल हृदआदि हैं; उनसे अवृत्तित्वधूमरूप हेतुमें है
इसलिये यह व्याप्तिका लक्षण संगत है १ ।
१२८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
धूमवान् वह्नेरित्यादौ साध्यवदन्यस्मिन्नयःपिण्डादौ वह्नेः सत्त्वा-
न्नातिव्याप्तिः । २ ।
भाषा-और 'धूमवान् वह्नेः' इत्यादि असद्धेतुओंमें यह लक्षण अतिव्याप्तिग्र-
स्तभी नहीं है, क्योंकि ऐसे स्थलमें साध्य धूम है, साध्यवाले महानसादि हैं, उनसे
भिन्नाधिकरण तप्तलोहपिण्डादिकोंमें वह्निरूप हेतुको वृत्तित्वही है किंतु अवृत्तित्व
नहीं इसलिये दोष नहीं २ ।
अत्र येन सम्बन्धेन साध्यं तेनैव सम्बन्धेन साध्यवान् बोध्यः ।
अन्यथा समवायसम्बन्धेन वह्निमान् वह्नेरवयवस्तदन्यो महान-
सादिस्तत्र धूमस्य विद्यमानत्वादव्याप्तिप्रसङ्गात् । ३ ।
भाषा-यहां लक्षणमें जिस सम्बन्धसे साध्यकी विवक्षा की होय उसी सम्बन्धसे
साध्यवालेकोभी जानना उचित है. ( अन्यथा ) जिस किसी एक सम्बन्धसे साध्यव-
त्त्वकी विवक्षा करेंगे तो पूर्वोक्त लक्षणकी 'वह्निमान् धूमात्' इसी स्थलमें अव्याप्ति
होगी; क्योंकि समवायसम्बन्धसे वह्निरूप साध्यवाले वह्निके अवयव हैं; उन अवय-
वोंसे भिन्नाधिकरण पर्वत महानसादि हैं; उन अधिकरणोंमें धूमरूप हेतुको वृत्तित्वही है,
वृत्तित्वाभाव नहीं याते लक्षणमें अव्याप्तिरूप दोष हुआ परन्तु साध्य साध्यवान्
दोनोंमें यदि एकही संयोगसम्बन्धकी विवक्षा होय तो पूर्वोक्त रीतिसे लक्षण सङ्गत
है. एवं लक्षणका स्वरूप ऐसा हुआ कि ( साध्यतावच्छेदकसम्बन्धावच्छिन्न ) जो
साध्यवत् तादृश ( साध्यवत् प्रतियोगिताक ) जो भेद तादृश ( भेदाधिकरणनिरूपित
वृत्तित्वाभाव ) ही हेतुनिष्ठ व्याप्ति है ३ ।
साध्यवदन्यश्च साध्यवत्त्वावच्छिन्नप्रतियोगिताकभेदवान् बो-
ध्यः । तेन यत्किञ्चिद्वह्निमान् महानसादिस्तद्भिन्ने पर्वतादौ
धूमस्य सत्त्वेऽपि न क्षतिः । ४ ।
भाषा-साध्यवदन्य शब्दसेभी यावत्साध्यवालोंमें रहनेवाला जो 'साध्यवत्त्व'
रूप धर्म तद्धर्मावच्छिन्न प्रतियोगिताक भेदवाले जानने चाहिये. ( अन्यथा ) यदि
साध्यवत्त्वधर्मसे यावत् साध्याधिकरणका ग्रहण नहीं करें तो "वह्निमान् धूमात् "
इसी स्थलमें फिर अव्याप्ति होगी; क्योंकि 'यत् किञ्चित्' शब्दसे कोई एक वह्निका
अधिकरण पर्वत या महानसादि हैं; उनसे भिन्न दूसरे पर्वत गोष्ठादि हैं; उनमें धूम-
१ यदि संस्कृतमात्र लक्षण याद करना होय तो केवल इन कोष्ठोंके भीतरके हिस्सोंको
आपसमें मिलाय कर बांचो.
परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १२९
रूप हेतुको वृत्तित्वही है; वृत्तित्वाभाव नहीं; याते अव्याप्तिरूप दोष हुआ और 'साध्य-
वत्त्व ' रूप धर्मावच्छिन्नके देनेसे साध्यवाले यावत् अधिकरणोंका ग्रहण होसकता है
उनसे भिन्न जल हृदादिही मिलेंगे उनमें वृत्तित्वाभाव धूमरूप हेतुमेंभी सिद्ध है,
याते अव्याप्तिरूप दोष नहीं. एवं लक्षणका स्वरूप ऐसा हुआ कि-( साध्यतावच्छे-
दक सम्बन्धावच्छिन्न ) जो साध्यवत् तादृश ( साध्यवत्त्वावच्छिन्न प्रतियोगिताक )
जो भेद, तादृश ( भेदाधिकरणनिरूपित वृत्तित्वाभाव ) ही हेतुनिष्ठ व्याप्ति है ४ ।
येन सम्बन्धेन हेतुस्तेनैव सम्बन्धेन साध्यवदन्यवृत्तित्वं बोध्यम्।
तेन साध्यवदन्यस्मिन् धूमावयवे धूमस्य समवायसम्बन्धेन
सत्त्वेऽपि न क्षतिः ।५।
भाषा-प्रकृतमें जिस सम्बन्धसे हेतुकी विवक्षा करी होय, साध्यवद् भिन्नाधिकर-
ण में वृत्तित्वभी उस हेतुको उसी सम्बन्धसे विचारणा उचित है; अन्यथा फिर 'वह्नि
मान् धूमात्' इसी स्थलमें अव्याप्ति होगी; क्योंकि वृत्तितामें हेतुतावच्छेदक सम्ब-
न्धका निवेश न करनेसे साध्यवत्त्वावच्छिन्न प्रतियोगिताक भेदाधिकरण धूमरूप
हेतुके अवयवभी होसकते हैं; उनमें धूमरूप हेतु समवायसम्बन्धसे वृत्तिही है. अवृ-
त्ति नहीं याते अव्याप्तिरूप दोष हुआ; और यदि साध्यवद् भेदाधिकरणनिरूपित
वृत्तितामें हेतुतावच्छेदक सम्बन्धका निवेश करें तो प्रकृतमें हेतुतावच्छेदक सम्बन्ध
संयोग है परन्तु संयोगसम्बन्धसे धूमरूप हेतु न अपने अवयवोंमें रहता है और
न जलह्रदादिमें रहताहै; किंतु स्वसाध्यवह्निके साथ पर्वतादिहीमें रहता है. इसलिये
अव्याप्तिरूप दोष नहीं. एवं लक्षणका स्वरूप ऐसा हुआ कि-( साध्यतावच्छेदक
सम्बन्धावच्छिन्न साध्यवत्त्वावच्छिन्नप्रतियोगिताक ) जो भेद तादृश ( भेदाधिकरण
निरूपिता ) जो ( हेतुतावच्छेदक सम्बन्धावच्छिन्ना ) वृत्तिता तादृश ( वृत्तित्वाभाव)
ही हेतुनिष्ठ व्याप्ति है । ५।
साध्यवदन्यावृत्तित्वं च साध्यवदन्यवृत्तित्वत्वावच्छिन्नप्रतियो-
गिताकाभावः, तेन धूमवान् वन्हेरित्यात्र साध्यवदन्यजलह्रदादिवृ-
त्तित्वाभावेऽपिनातिव्याप्तिः । ६।
भाषा-यहां हेतुनिष्ठ साध्यवद् भेदाधिकरणसे अवृत्तिताभी साध्यवद् भेदाधिकरणत्वा-
वच्छिन्नाधिकरणसे अपेक्षित है. अन्यथा साध्यवद् भेदाधिकरण यावत् नहीं लेंगे तो
'धूमवान् वन्हेः' इसी स्थलमें अतिव्याप्ति होगी; क्योंकि भेदाधिकरणत्वावच्छिन्न अ-
धिकरणका ग्रहण न करनेसे साध्यवत् पर्वतादिसे भिन्न जलह्रद है. उसमें वह्निरूप हेतु
९
अवृत्तिभी है अलक्षअसद्धेतुमें लक्षण संगत हुआ याते अतिव्याप्तिरूप दोष हुआ
और यदि भेदाधिकरणतावच्छिन्नाधिकरणका ग्रहण करें तो साध्यवद् भेदाधिकरण
जैसे जलह्रद है वैसे तप्त लोहापिण्डभी होसकताहै. उसमें वह्निरूप हेतुकी वृत्तित्व
ही है, वृत्तित्वाभाव नहीं; याते अतिव्याप्तिरूप दोष नहीं. एवं लक्षणका स्वरूप ऐसा
हुआ कि-( साध्यतावच्छेदक सम्बन्धावच्छिन्न साध्यवत्त्वावच्छिन्न प्रतियोगिक ) जो
भेद तादृश ( भेदाधिकरणतावच्छिन्न भेदाधिकरणनिरूपित )जो(हेतुतावच्छेदकसम्ब-
न्धावच्छिन्ना) वृत्तिता तादृश ( वृत्तिताकाभाव ) ही हेतुनिष्ठ व्याप्ति है ॥ ६ ॥
अत्र यद्यपि द्रव्यं गुणकर्मान्यत्वविशिष्टसत्तादित्यादौ विशिष्ट-
सत्तायाः शुद्धसत्तायाश्चैक्यात् साध्यवदन्यस्मिन् गुणादाव-
वृत्तित्वं नास्ति । तथापि हेतुतावच्छेदकरूपेणावृत्तित्वं
वाच्यम् । हेतुतावच्छेदकं तादृशवृत्तानवच्छेदकमिति
फलितोऽर्थः ॥ ६८ ॥
भाषा-यहां साध्यवद् भेदाधिकरणमें हेतुको हेतुतावच्छेदकरूपसे अवृत्तित्व होना
चाहिये. तात्पर्य यह कि, हेतुतावच्छेदक धर्म तादृश साध्यवद् भेदाधिकरणनिरूपित
वृत्तिताका अनवच्छेदक होना चाहिये.यदि ऐसा नहीं कहें तो"द्रव्यंद्रव्यत्ववत् गुणक-
र्मान्यत्वविशिष्टसत्त्वात् " इस स्थलमें अव्याप्ति होगी; क्योंकि ' विशिष्ट पदार्थ शुद्धसे
जुदा नहीं होता ' यह युक्तियुक्त अनुभव है .एवं गुणकर्मभेदविशिष्ट सत्ता जो कि
केवल द्रव्यमें ही रहती है और शुद्धसत्ता जो कि द्रव्य गुण कर्म तीनोंमें रहती
है उन दोनोंका परस्पर भेदभी नहीं कहसकते.ऐसे साध्यवत् जो द्रव्य तत्प्रतियोगि-
क भेदाधिकरण गुणकर्मादि उनमें वृत्तित्ताही है. विशिष्टसत्ताकी वृत्तित्वाभाव नहीं
याते अव्याप्ति हुई; और यदि हेतुतावच्छेदक धर्मको साध्यवद् भेदाधिकरणनि-
रूपित वृत्तिताका अनवच्छेदक मानें तो अव्याप्तिरूप दोष नहीं क्योंकि प्रकृतमें
हेतुतावच्छेदकधर्म ' गुणकर्मान्यत्वविशिष्टसत्तात्व ' है. यह धर्म साध्यवद् भेदाधि,
करणनिरूपित वृत्तिताका अनवच्छेदक इस रीतिसे है कि यद्यपि गुणकर्मभेदविशिष्ट
सत्ता तथा शुद्धसत्ताको एक होनेसे हेतु अधिकरणगुणकर्मभी हो सकतेहैं तथापि
गुणकर्मान्यत्वविशिष्टसत्तात्वेन विशिष्टसत्ता गुणकर्ममें नहीं रहती है किन्तु द्रव्यही-
में रहती है. ऐसे साध्यवद् भेदाधिकरण गुणकर्मादिकोंमें वृत्तिता गुणत्व कर्मत्वादि
धर्मोंकी है, वृत्तिताके अवच्छेदक गुणत्वत्वादि धर्म हैं. अनवच्छेदक गुणकर्मान्यत्व-
विशिष्टसत्तात्वरूप धर्म है याते पूर्वोक्त अव्याप्तिरूप दोष नहीं एवं लक्षणका स्वरूप
ऐसा हुआ कि-(साध्यतावच्छेदक सम्बन्धावच्छिन्न साध्यवत्त्वावच्छिन्नप्रतियोगितका)
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. १३१
जो भेद तादृश (भेदाधिकरणतावच्छिन्न भेदाधिकरणनिरूपित) जो (हेतुतावच्छेदक
सम्बन्धावच्छिन्ना) वृत्तिता तादृश (वृत्तितानवच्छेदक जो) (हेतुतावच्छेदकधर्म)
तादृश (धर्मवत्त्व) ही हेतुनिष्ठ व्याप्ति है ॥ ६८ ॥
ननु केवलान्वयिनि ज्ञेयत्वादौ साध्ये साध्यवदन्यस्याप्रसिद्धत्वा-
दव्याप्तिः, किंच सत्तावान् जातेरित्यादौ साध्यवदन्यस्मिन्
सामान्यादौ हेतुतावच्छेदकसम्बन्धेन समवायेन वृत्तेरप्रसिद्धत्वा-
दव्याप्तिश्चात आह, अथ वेति-
शंका-पूर्वोक्त समग्रलक्षणकी 'वाच्यं वाच्यत्ववत् ज्ञेयत्वात्' इत्यादि केवलान्वयि
हेतुक स्थलमें अव्याप्ति होगी क्योंकि 'वाच्य' नाम "अस्माच्छब्दादयमर्थो बोद्धव्यः"
इत्याकारक ईश्वरीय इच्छाविषयभूत पदार्थोंका है और 'ज्ञेय' नाम ईश्वरके ज्ञानके
विषय होनेवाले पदार्थोंका है. ईश्वरीय ज्ञानकी तथा इच्छाकी विषयता पदार्थमात्रमें
रहती है; इसीसे वाच्य तथा ज्ञेय पदार्थमात्रको कह सकते हैं और उनमें रहनेवाले
वाच्यत्व तथा ज्ञेयत्व आदिधर्मभी पदार्थमात्रमें रहसकते हैं इसरीतिसे यावत् पदा-
र्थको वाच्यत्वधर्मवाला होनेसे वाच्यत्ववद् भेदाधिकरण कोई पदार्थ नहीं; भेदाधिक-
रणके अप्रसिद्ध होनेसे उसमें वृत्तिता अप्रसिद्धा.वृत्तिताके अप्रसिद्ध होनेसे हेतुनिष्ठ अवृ-
त्तिवभी अप्रसिद्ध हुआ इसरीतिसे लक्षणकी अव्याप्ति हुई और यहां यदि ऐसा कहें
कि केवलान्वयि ज्ञानकालमें साध्यसंशयरूप पक्षताके अभाव होनेसे यहां अनुमितिकी
योग्यताही नहीं और यदि केवलान्वयिक ज्ञान नहीं हुआ तो भ्रमात्मक व्याप्तिज्ञानसे
अनुमिति होही सकती है. इसलिये 'वाच्यंवाच्यत्ववत् ज्ञेयत्वात्' इस स्थलमें लक्षणकी
अव्याप्ति कहनी योग्य नहीं तो 'सत्तावान् जातेः' इस स्थलमें पूर्वोक्त लक्षणकी
अव्याप्ति पूर्णरूपसे है क्योंकि यहां साध्यवाले द्रव्य, गुण, कर्म्म, तीन हैं; और
साध्यवद् भेदाधिकरण सामान्याविशेषादि हैं उनमें हेतुतावच्छेदक समवायसम्बन्धसे
यदि किसीको वृत्तित्त्व होवे तो वृत्तित्वाभाव जातिरूप हेतुपर आवे. परन्तु उनमें
समवायसम्बन्धावच्छिन्ना वृत्तिता अप्रसिद्ध है; इसलिये पूर्वोक्त लक्षणकी उस स्थलमें
अव्याप्ति है समाधान-मूलकार 'अथवा' इत्यादि ग्रन्थसे एतद् लक्षसाधारण
अनुगत लक्षणान्तर करतेहैं-
अथवा हेतुमन्निष्ठविरहाप्रतियोगिना ॥
साध्येन हेतोरैकाधिकरण्यं व्याप्तिरुच्यते ॥६९॥
१३२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
भाषा-हेतुमात्रिनिष्ठ जो (विरह) अभाव उस अभावका अप्रतियोगि जो साध्य
तादृश साध्यके साथ हेतुका एकाधिकरणत्वही हेतुके शिरपर वह्तिनिरूपित
व्याप्ति है ॥ ६९ ॥
हेतुमति निष्ठा वृत्तिर्यस्य स तथा विरहोऽभावस्तथा च हेत्वधि-
करणवृत्तियोंऽभावस्तदप्रतियोगिना साध्येन सह हेतोः सामा-
नाधिकरण्यं व्याप्तिरुच्यत इत्यर्थः । १ ।
भाषा-अर्थात् हेतुवाले पक्षमें (निष्ठा) वृत्ति होवे जिसकी एवंभूत जो अभाव
ऐसा अर्थ करनेसे हेत्वधिकरणमें वर्तनेवाला जो अभाव उस अभावका अप्रतियोगि
जो साध्य उस साध्यके साथ हेतुका जो एकाधिकरणवृत्तित्व, वही हेतुके शिरपर
व्याप्ति है. इस लक्षणकी पूर्वोक्त “सत्तावान् जातेः” इस स्थलमें अव्याप्ति नहीं है;
क्योंकि यहां जातिरूप हेतुके अधिकरण द्रव्य गुण कर्म तीन हैं; उनमें उन पदा-
र्थोंहीका अभाव रहेगा जो पदार्थ उनमें नहीं रहेंगे ऐसे घटपटादि हैं. और जो पदार्थ
उनमें रहेगा उसका अभाव नहीं कहसकते ऐसा पदार्थ सत्ता है; जिनका अभाव
रहेगा वही पदार्थ उस अभावके प्रतियोगी कहे जावेंगे. हेतुअधिकरणमें घटपटादि-
का अभाव है; इसलिये घटपटादि अभावके प्रतियोगी हैं सत्ताका अभाव नहीं;
इसलिये सत्ता उस अभावका अप्रतियोगि है, वही साध्यभी है. एतादृश अप्रतियोगि
साध्यके साथ जातिरूप हेतुका एकाधिकरणवृत्तित्व है याते लक्षण संगत है. इसा
रीतिसे “वह्निमान् धूमात्”इत्यादि पूर्वोक्त सब स्थलोंमें लक्षणसमन्वय जानलेना १।
अत्र यद्यपि वह्निमान् धूमादित्यादौ हेत्वधिकरणपर्वतादिवृत्त्य-
भावप्रतियोगित्वं तत्तद्वह्नयादेरस्तीत्यव्याप्तिः । २ ।
शंका-यह लक्षणभी “वह्निमान् धूमात्” इस स्थलमें अव्याप्त है क्योंकि हेतु
अधिकरण पर्वतादिमें महानसीय वह्निका अभाव तथा महानसमें चत्वरीयवह्निका
अभाव तथा चत्वरमें गोष्ठीय वह्निका अभाव; एवं गोष्ठमें पर्वतीय वह्निका
अभाव पासकतेहैं; उस अभावका अप्रतियोगि वह्निरूप साध्य नहीं हुआ किन्तु
प्रतियोगीही हुआ है. इसलिये इस लक्षणकी यहां अव्याप्ति है २ ।
न च समानाधिकरणवह्निधूमयोरेव व्याप्तिरिति वाच्यम् । ३ ।
सिद्धान्ती-हमारे इस लक्षणका भाव यह है कि ‘तद्वेत्वधिकरणवृत्ति’ जो
अत्यन्ताभाव उस ‘अत्यन्ताभाव’ का ‘अप्रतियोगि’ जो ‘तत् साध्य’ तादृश साध्यके
‘सामानाधिकरण्य’ रूप व्याप्ति है अर्थात् पर्वतीय धूमके साथ पर्वतीय वह्निके
परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १३३
व्याप्ति है एवं महानसीय धूमके साथ महानसीय वह्निकी व्याप्ति है. एवं हेतु
अधिकरण पर्वतादिमें महानसीयादि वह्निका अभाव लेनेसेभी अभावका प्रतियोगी
महानसीय वह्नि होगी. अप्रतियोगि पर्वतीयवन्हिके साथ पर्वतीय धूमका सामाना-
धिकरण्य है यान्ते अव्याप्तिरूप दोष नहीं.
तद्वह्नचादेरप्युभयाभावसत्त्वादेकसत्त्वेऽपि द्वयं नास्तीति प्रतीतेः।४।
शंका-तथापि ‘वन्हिमान् धूमात्’ इस स्थलमें अव्याप्तिका वारण नहीं
होयसकता; क्योंकि ‘एकसत्त्वेपि द्वयं नास्ति’ इस प्रतीतिसे एकवस्तुसत्त्व स्थलमें
वस्तुद्वयका अभाव कह सकतेहैं. जैसे घटवत्स्थलमें “घटपटौ न स्तः” यह कह
सकतेहैं; वैसेही “पर्वते पर्वतीयवह्निसत्त्वेऽपि वह्निघटद्वयं नास्ति” यह कह सकते हैं.
इस अभावका पर्वतीय वह्निभी प्रतियोगी है,अप्रतियोगि साध्यके न होनेसे अव्याप्तिरूप
दोष तादवस्थ्य रहा. समा०-इस दोषके वारणार्थ यह कहसकते हैं कि-हेत्वधिक-
रणवृत्त्यभावीय प्रतियोगिता व्यासज्यवृत्तिधर्मानवच्छिन्ना होनी चाहिये. उभय
व्यक्ति वृत्तिधर्मका नाम व्यासज्यवृत्तिधर्म है. प्रकृतमें हेत्वधिकरणमें “वह्निघट-
द्वयं नास्ति” इत्याकारक अभावकी प्रतियोगिता व्यासज्यवृत्तिधर्मानवच्छिन्ना नहीं
है; किन्तु वह्नि घट उभयमें रहनेवाला जो वह्नि घट उभयत्वरूप व्यासज्यवृत्तिधर्म
तदवच्छिन्नाही है;इसलिये वह्निघट उभयका अभाव लेकर लक्षण दूषितकरना उचित
नहीं किंतु शुद्ध घटाभाव लेकर लक्षण संगत होसकता है.एवं लक्षणका स्वरूप ऐसा
हुआ कि-(हेत्वधिकरणवृत्ति) जो(व्यासज्यवृत्तिधर्मानवच्छिन्न प्रतियोगिताकात्यन्ता-
भाव ) उस अभावका ( अप्रतियोगि ) जो ( साध्य ) तादृश साध्यके साथ हेतुका
सामानाधिकरण्य ) ही व्याप्ति है ४ ।
गुणवान् द्रव्यत्वादित्यादावव्याप्तिश्च । तथापि प्रतियोगितानव-
च्छेदकं यत् साध्यतावच्छेदकं तदवच्छिन्नसाध्यसामानाधिक-
रण्यं व्याप्तिरिति वाच्यम् । ५ ।
शंका-तथापि इस लक्षणकी “घटो गुणवान् द्रव्यत्वात्”इस स्थलमें अव्याप्ति है;
क्योंकि हेत्वधिकरण रक्तघटमें पीतगुणका अभाव एवं पीतघटमें श्वेतगुणका अभाव लेस-
कते हैं. उस अभावका प्रतियोगी गुणरूप साध्यही है, इसलिये अप्रतियोगि साध्यके
साथ सामानाधिकरण्यरूप व्याप्तिका लक्षण यहां अव्याप्त है.समा०-तथापि ‘साध्य
हेत्वधिकरणवृत्त्यभावका अप्रतियोगि होना चाहिये’ ऐसा अब हम नहीं कहते किन्तु
“साध्यतावच्छेदकधर्म हेत्वधिकरणवृत्त्यभावीय प्रतियोगिताका अनवच्छेदक होना
चाहिये” ऐसा कहते हैं, एवं “गुणवान् द्रव्यत्वात्”इस स्थलमें अव्याप्तिरूप दोष नहीं
१३४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
है;क्योंकि यहां साध्यतावच्छेदकधर्मगुणत्व है. वह हेत्वधिकरणवृत्त्यभावीय प्रतियो-
गिताका अनवच्छेदक इसलियेहै कि-हेत्वधिकरण घटमें “गुणत्वेन गुणोनास्ति” ऐसा
अभाव नहीं कह सकते; क्योंकि घट द्रव्य है उसमें कोई न कोई गुण अवश्यहीरहेगा. एवं
यदि हेत्वधिकरणवृत्त्यभाव नीलगुणाभाव पीतगुणाभावभी लेंगे तो अभावीय प्रति-
योगिता नीलपीतगुणनिष्ठा होगी. उस प्रतियोगिताके अवच्छेदक धर्म नीलगुणत्व
पीतगुणत्वादि होंगे. अनवच्छेदक साध्यतावच्छेदक शुद्धगुणत्व होगा इसीरीतिसे
लक्षण संगत है.एवं लक्षणका स्वरूप ऐसा हुआ कि-( हेत्वधिकरणवृत्त्यभावीय प्रति-
योगिता ) का ( अनवच्छेदक ) जो ( साध्यतावच्छेदक, तदवच्छिन्नसाध्य) के साथ
( सामानाधिकरण्य ) रूपा हेतुपर व्याप्ति है ५ ।
ननु रूपत्वव्याप्यजातिमद्वान् पृथिवीत्वादित्यादौ साध्यता-
वच्छेदकारूपत्वव्याप्यजातयस्तासां च शुक्लत्वादिस्वरूपाणां
नीलघटादिवृत्त्यभावप्रतियोगितावच्छेदकत्वमस्तीत्यव्याप्तिरि-
ति चेत् । न । तत्र परम्परया रूपत्वव्याप्यजातित्वस्यैव साध्य-
तावच्छेदकत्वात् । न हि तादृशधर्मावच्छिन्नाभावः क्वापि पृथि-
व्यामस्ति । रूपत्वव्याप्यजातिमान् नास्तीति बुद्धेचापत्तेः । ६ ।
शंका-इस लक्षणकीभी 'घटो रूपत्वव्याप्यजातिमद्वान् पृथिवीत्वात्' इस स्थलमें
अव्याप्ति होगी. क्योंकि रूपत्वव्याप्य जातिवाले नीलपीतादि गुण यहां साध्य हैं
और नीलपीतादिगुणोंमें रहनेवाली नीलत्वपीतत्वादि जातियां यहां साध्यताव-
च्छेदक हैं. एवं हेत्वधिकरण रक्तश्वेतादि गुणयुक्त घटपटादिमें सप्तविध रूपमेंसे
नीलपीतादि किसीन किसी एक रूपका अभावभी पासकतेहैं. अभावीय प्रतियोगिता
नीलपीतादि गुणनिष्ठा होगी और प्रतियोगिताकी अवच्छेदक नीलत्व पीतत्वादि
जातियां होंगी. एवं नीलत्व पीतत्वादि जातियोंको अभावीय प्रतियोगिताका अनव-
च्छेदक साध्यतावच्छेदकरूप धर्म न होनेसे अव्याप्ति हुई.समाधान-ऐसे स्थलों-
में हम ' स्वाश्रयसमवाय ' रूप परंपरासम्बन्धसे रूपत्वव्याप्यजातियोंमें रहनेवाले
' जातित्वधर्म ' हीको साध्यतावच्छेदक मानते हैं. 'स्व' शब्दसे यहां रूपत्वव्याप्य
जातित्वका ग्रहण है, उसका 'आश्रय' रूपत्व व्याप्य नीलत्वपीतत्वादिजातियां हैं उन
जातियोंका नीलपीतादिगुणोंमें समवायहै.आगेनीलपीतादिगुण द्रव्यमें समवायसम्बन्ध
से साध्य हैं. एवं रूपत्वव्याप्यजातित्वरूप धर्म 'स्वाश्रयसमवाय'सम्बन्धसे नीलपीता-
दिगुणोंमें रहकर साध्यतावच्छेदक हो सकताहै. एवं हेत्वधिकरणद्रव्यवृत्त्यभाव
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. १३५
नीलत्वजातिमदभाव पीतत्वजातिमदभाव लेसकतेहैं. एतादृश अभावीय प्रतियोगिता
नीलपीतादिगुणोंमें रहेगी. उस प्रतियोगिताके अवच्छेदक नीलत्वपीतत्वादि धर्म होंगे
यही धर्म रूपत्वकी व्याप्यजातियां हैं. इन सबमें रहनेवाला 'रूपत्वव्याप्यजातित्वरूप-
धर्म' साध्यतावच्छेदक है. यही धर्म अभावीय प्रतियोगिताका अनवच्छेदक भी है
क्योंकि सप्तविधरूप किसीएक पृथिवीमें एक जगह कहीं नहीं रहता; इसलिये रूपत्व
व्याप्य जातिमदभाव तो हेत्वधिकरण पृथिवीमें कह सकते हैं; परन्तु रूपत्वव्याप्य
जातित्वावच्छिन्नवदभाव किसी पृथिवीमें नहीं कहसकते. तात्पर्य यह कि-ऐसा
अभाव नीरूप पृथिवीमें रहसकता है. परन्तु नीरूप पृथिवी संसारमें दुर्लभ है कोई
न कोई रूप पृथिवीमें रहताही है यदि नीरूप पृथिवीभी कोई होवे तो "रूपत्वव्या-
प्यजातिमान् नास्ति" इत्याकारक बुद्धि किसी एक घटपटादिमें होनी चाहिये;
परन्तु होती तो नहीं इस रीतिसे हेत्वधिकरणवृत्त्यभावीय प्रतियोगिताका अनवच्छे-
दक तथा परंपरासम्बन्धसे साध्यतावच्छेदक 'रूपत्वव्याप्यजातित्व' रूप धर्म है याते
पूर्वोक्त अव्याप्तिरूप दोष नहीं ६ ।
एवं दण्डाद्यादौ साध्ये परम्परासम्बद्धं दण्डत्वादिकमेव साध्यता-
वच्छेदकं, तच्च प्रतियोगितानवच्छेदकमिति । साध्यादिभेदेन
व्याप्तेर्भेदात् तादृशस्थले साध्यतावच्छेदकतावच्छेदकं प्र-
तियोगितावच्छेदकतानवच्छेदकमित्येव लक्षणघटकमित्यपि
वदन्ति ७ ।
भाषा--एवं “ मठो दण्डिमान् दण्डिसंयोगात् ” इत्यादि स्थलोंमेंभी परंपरास-
म्बन्धका आश्रयण करनेसे अव्याप्तिरूप दोषवारण जानलेना. यहां यदि परंपरा
सम्बन्ध ना स्वीकार करें तो दण्डिसंयोगरूप हेतुका अधिकरण अनुयोगितासम्बन्धसे
मठ है. उस मठरूप हेत्वधिकरणमें “वृद्धदण्डी नास्ति, युवा दण्डी नास्ति, गौर-
दण्डी नास्ति, श्यामदण्डी नास्ति” इत्याकारक तत्तद्दण्डचभाव पासकतेहैं; उस
अभावकी प्रतियोगिता तत्तद्दण्डीनिष्ठ होगी और प्रतियोगिताका अवच्छेदक धर्म
दण्ड होगा वही तो साध्यतावच्छेदक था इसलिये अव्याप्ति हुई; परन्तु यदि ‘स्वस-
मवायिसंयोग’ रूप परम्परासम्बन्धसे 'दण्डत्व' रूप धर्मको साध्यतावच्छेदक मानें
तो दोष नहीं. यहां ‘स्व’ शब्दसे दण्डत्वधर्मका ग्रहण है; उसका समवायि दण्ड है;
उस दण्डका पुरुषमें संयोग है. एतादृश सम्बन्धसे दण्डत्वधर्म साध्यतावच्छेदक
हो सकता है और अभावीय प्रतियोगिताका अनवच्छेदक भी है; यान्ते पूर्वोक्तरीतिसे
१३६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
अव्याप्तिरूप दोष नहीं. यहां कईएक विद्वानोंकी यहभी सम्मति है कि-साध्यसाधनके
भेदसे लक्षणभिन्न २ होसकते हैं. इसलिये परम्परासम्बन्धसे अवच्छेदक माननेका कुछ
काम नहीं किन्तु ऐसे स्थलोंके लिये लक्षणान्तर करना उचित है. एवं ऐसे स्थलोंमें ऐसा
लक्षण करना कि-(हेत्वधिकरणवृत्त्यभावीयप्रतियोगितावच्छेदकतानवच्छेदकं यत् सा-
ध्यतावच्छेदकतावच्छेदकं तदवच्छिन्नावच्छिन्नसाध्यसामानाधिकरण्यं व्याप्ति:) “अर्थात्
हेत्वधिकरणवृत्ति जो अभाव तादृश भावनिरूपितजो प्रतियोगितातादृश प्रतियोगिताका
जो अवच्छेदक उस अवच्छेदकमें रहनेवाली जो अवच्छेदकता तादृश अवच्छेदकता-
का अनवच्छेदक जो साध्यतावच्छेदकताका अवच्छेदकधर्म तद्धर्मावच्छिन्नावावच्छिन्न
साध्यसामानाधिकरण्यरूप व्याप्ति हेतुपर है.” ‘रूपत्वव्याप्यजातिमद्वान् पृथिवीत्वात्,
दण्डिमान् दण्डिसंयोगात्’ इत्यादिस्थलोंमें यह लक्षण सार्थक है. यहां पूर्वोक्तरीतिसे
हेत्वधिकरणवृत्त्यभावीय प्रतियोगितारूपत्वव्याप्यजातिमत् तत्तत् नीलपीतादिरूपपर
और तत्तत् दण्डिपर रहेगी, उस प्रतियोगिताके अवच्छेदक रूपत्वव्याप्य नीलत्वपी-
तत्त्वादिजातियां और दण्ड होगा और अभावीयप्रतियोगिताकी अवच्छेदकताका अनव-
च्छेदक तथा साध्यतावच्छेदकताका अवच्छेदक ‘ रूपत्वव्याप्यजातित्व ’ तथा
‘ दण्डत्व ’ होगे; तदवच्छिन्न ‘ रूपत्वव्याप्यजातियां ’ तथा ‘ दण्ड ’ तदवच्छिन्न
‘ नीलपीतादिगुण ’ तथा ‘ दण्डी ’ यही दोनों यथाक्रम समवायसे तथा संयोगसे
साध्य हैं. एतादृश साध्योंके साथ पृथिवीत्वरूप हेतुका तथा दण्डिसंयोगरूप हेतुका
सामानाधिकरण्यभी है; याते व्याप्तिका लक्षण संगत है ७ ।
हेत्वधिकरणं च हेतुतावच्छेदकविशिष्टाधिकरणं वाच्यम् । तेन
द्रव्यं गुणकर्मान्यत्वविशिष्टसत्त्वादित्यादौ शुद्धसत्ताधिकरण-
गुणादिनिष्ठाभावप्रतियोगित्वेऽपि द्रव्यत्वस्य नाव्याप्तिः । ८ ।
भाषा-“ हेत्वधिकरणवृत्त्यभावीयप्रतियोगितानवच्छेदकं यत् साध्यतावच्छेदकं
तदवच्छिन्नसाध्यसामानाधिकरण्यं व्याप्तिः ” इत्याकारक लक्षणमें हेत्वधिकरणभी
हेतुतावच्छेदक जो धर्म तद्धर्मविशिष्ट हेतुका अधिकरण जानना, अन्यथा “ द्रव्यं
द्रव्यत्ववत् गुणकर्मान्यत्वविशिष्टसत्तात्” इस स्थलमें अव्याप्ति होगी, क्योंकि विशिष्ट-
वस्तु शुद्धसे जुदा नहीं होती. इस अनुभवसे विशिष्टसत्ता शुद्धसत्ताको एकरूप होनेसे
उसके अधिकरण गुणकर्म्मभी हुए. तद्वृत्तिअभाव “ द्रव्यत्वं नास्ति ” इत्याकारक
अभाव एतादृश अभावीय प्रतियोगिता द्रव्यत्वरूप साध्यनिष्ठा प्रतियोगिता एतादृश
प्रतियोगिताका अवच्छेदकही ‘ द्रव्यत्वत्व’ रूप साध्यतावच्छेदकधर्म हुआ है. अनव-
च्छेदक साध्यतावच्छेदक नहीं हुआ. एवं अव्याप्ति हुई, परन्तु यदि हेत्वधिकरणता
रिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १३७
हेतुतावच्छेदक विशिष्टाधिकरणता लेतेहैं तो अव्याप्तिरूप दोष नहीं; क्योंकि यद्यपि
गुणकर्मान्यत्वविशिष्टसत्ता शुद्धसत्तासे जुदी नहीं तथापि गुणकर्मान्यत्वविशिष्टसत्ता-
त्वेन विशिष्टसत्ता भिन्न है,उसका अधिकरण केवल द्रव्य है,उसमें द्रव्यत्वरूप साध्यका
अभाव नहीं पासकते किन्तु घटादिका अभाव लेकर लक्षण संगत करनेसे अव्या-
प्तिरूप दोष नहीं है ८।
एवं हेतुतावच्छेदकसम्बन्धेन हेत्वधिकरणं बोध्यम् । तेन समवा-
येन धूमाधिकरणतदवयवनिष्ठाभावप्रतियोगित्वेऽपि वह्नेर्नाव्या-
प्तिः । ९ ।
भाषा-एवं प्रकृतलक्षणमें हेतुका अधिकरणभी हेतुतावच्छेदक सम्बन्धसे जानना
योग्य है. अन्यथा " वह्निमान् धूमात् " इस स्थलमें अव्याप्ति होगी; क्योंकि सम-
वायसम्बन्धसे धूमरूप हेतुके अधिकरण धूमके अवयवभी हैं; उनमें वर्तनेवाले अभाव-
का प्रतियोगी वह्निरूप साध्यभी है, प्रतियोगितावच्छेदक वह्नित्वधर्म होगा, एवं 'वह्नि-
त्व' धर्मको अनवच्छेदक साध्यतावच्छेदक न होनेसे अव्याप्ति हुई परन्तु यदि हेतुकी
हेतुतावच्छेदक सम्बन्धसे स्वाधिकरणमें विवक्षा करें तो हेत्वधिकरण पर्वतही होगा;
क्योंकि हेतुतावच्छेदक सम्बन्ध यहां संयोग है और संयोगेन धूम पर्वतहीमें रहता है,
अपने अवयवोंमें नहीं रहता. एवं पर्वतमें वह्निका अभाव लक्षणघटक नहीं होसकता,
क्योंकि पर्वतमें वह्निभी संयोगेन रहता है; किन्तु घटाद्यभाव लक्षणघटक होगा. एवं
अभावीय प्रतियोगितावच्छेदक 'घटत्वादि' धर्म होंगे; अनवच्छेदक साध्यतावच्छेदक
' वह्नित्वरूप ' धर्म होगा तदवच्छिन्न वह्निरूप साध्यके साथ धूमरूप हेतुका सामा-
नाधिकरण्यही व्याप्ति है याते पूर्वोक्त अव्याप्तिरूप दोष नहीं. एवं लक्षणका स्वरूप
ऐसा हुआ कि-(हेतुतावच्छेदकसम्बन्धावच्छिन्नहेतुतावच्छेदकावच्छिन्नहेत्वधिकरण-
वृत्त्यभावीयप्रतियोगितानवच्छेदकं यत् साध्यतावच्छेदकं तदवच्छिन्नसाध्यसामाना-
धिकरण्यं व्याप्तिः ) ९ ।
अभावश्च प्रतियोगिव्यधिकरणो बोध्यः । तेन कपिसंयोग्येतद्वृक्ष-
त्वादित्यत्र मूलावच्छेदेनैतद्वृक्षवृत्तिकपिसंयोगाभावप्रतियोगित्वे
ऽपि कपिसंयोगस्य नाव्याप्तिः ।
भाषा-इस प्रकृत लक्षणघटित जो हेत्वधिकरणवृत्त्यभाव है वह अभाव प्रतियोगी
व्यधिकरण होना चाहिये अर्थात् अभाव तथा अभावका प्रतियोगी दोनों एकाधिकर-
णमें नहीं रहने चाहिये. अन्यथा "वृक्षः कपिसंयोगवान् एतद्वृक्षत्वात्" इस स्थलमें
१०
Here is the line-by-line transcription of the text from the image into Markdown:
१३८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
अव्याप्ति होगी; क्योंकि यहां हेतुतावच्छेदकीभूत स्वरूपसम्बन्धावच्छिन्न एतद्वृक्षत्व-
त्वावच्छिन्न एतद्वृक्षत्वका अधिकरण 'एतद्वृक्ष' है. एतादृश हेत्वधिकरणमें वर्तमान
जो अभाव "मूलावरछेदेन कपिसंयोगो नास्ति" इत्याकारकाभाव एतादृश अभावीय
प्रतियोगिताका अवच्छेदकही 'कपिसंयोगत्व' रूप साध्यतावच्छेदक धर्म है, अनवच्छेदक
नहीं है, याते अव्याप्ति हुई; परन्तु यदि हेत्वधिकरणवृत्त्यभाव में प्रतियोगिव्यधिकरणकी
विवक्षा करें तो दोष नहीं है; क्योंकि ऐसा कहनेसे कपिसंयोगरूप साध्याभाव
प्रतियोगिव्यधिकरण न होनेसे लक्षणघटक नहीं है, किन्तु घटाद्यभाव प्रतियोगिव्यधि-
करण होनेसे लक्षणघटक है. एवं अभावीय प्रतियोगितावच्छेदक घटत्वादि
अनवच्छेदक साध्यतावच्छेदक कपिसंयोगत्वरूप धर्म हुआ; याते अव्याप्तिरूप दोष
नहीं है.
न च प्रतियोगिव्यधिकरणत्वं यदि प्रतियोग्यनधिकरणवृत्तित्वं
तदातथैवाव्याप्तिः प्रतियोगिनः कपिसंयोगस्यानधिकरणे गुणादौ
वर्त्तते योऽभावस्तस्यैव वृक्षेऽपि मूलावच्छेदेन सत्त्वात् ! यदि तु
प्रतियोग्यधिकरणारृत्तित्वं तदा संयोगी सत्त्वादित्यादावतिव्या-
प्तिः। सत्त्वाधिकरणे गुणादौ यः संयोगाभावस्तस्य प्रतियोग्यधि-
करणद्रव्यवृत्तित्वादिति वाच्यम् ।
शंका-आपने कहा कि-'लक्षणघटक अभाव प्रतियोगिव्यधिकरण होना चाहिये'
सो इस कथनका क्या भाव है? यदि ऐसा कहो कि-लक्षणघटक अभाव सर्वदा
'अपने प्रतियोगिके अधिकरणसे भिन्नाधिकरणमें रहना चाहिये' तब तो "वृक्षः
कपिसंयोगवान् एतद्वृक्षत्वात्" इसी स्थलमें फिर अव्याप्तिरूप दोष तादवस्थ्य है;
क्योंकि यहां भी हम 'प्रतियोगि' शब्दसे कपिसंयोगरूप साध्यही ग्रहण करसकते हैं.
उसके अधिकरण वृक्षादि हैं; अनधिकरण गुणकर्मादि हैं; उन गुणकर्मादिकोंमें वर्तने-
वाला जो कपिसंयोगाभाव वही मूलावच्छेदेन वृक्षमें भी रह सकता है; क्योंकि बहुत-
विद्वान् लोग अधिकरणभेदसे अभावभेदका अंगीकार नहीं करते अर्थात् अनेक अधि-
करणोंमें एकही अभाव रहसकता है. एवं गुणकर्मवृत्ति तथा मूलावच्छेदेन वृक्षवृत्ति
कपिसंयोगाभावका प्रतियोगी कपिसंयोग है. अभावीय प्रतियोगिताका अवच्छेदक
कपिसंयोगत्व होगा. एवं अनवच्छेदक साध्यतावच्छेदक कपिसंयोगत्वरूप धर्मके न
होनेसे अव्याप्ति हुई और यदि एतद्दोषवारणार्थ 'प्रतियोगिव्यधिकरण' इस
अंशका 'प्रतियोग्यधिकरणावृत्तित्व' अर्थ कहो अर्थात् हेत्वधिकरणवृत्त्यभाव स्वप्रति-
योग्यधिकरणमें रहनेवाला नहीं होना चाहिये. यदि ऐसा कहो तो यद्यपि 'वृक्षः क-
पिसंयोगवान् एतद्वृक्षत्वात्' इस स्थलमें तो दोष नहीं; क्योंकि संयोगमात्रका
यह स्वभाव है कि-यह वस्तुके किञ्चिदवयवावच्छेदेन उत्पन्न होताहै. इसलिये दर्शन-
कारोंने इसको 'अव्याप्यवृत्ति' माना है. जिस वस्तुकी एकही कालमें स्वाधिकर-
णमें भावाभाव उभयावगाहनी प्रतीति होजावे वह वस्तु नियमसे अव्याप्यवृत्ति होती
है; प्रकृतमें ऐसा संयोग है. एवं कपिसंयोगभी अव्याप्यवृत्ति होनेसे हेत्वधिकरणवृ-
त्त्यभावका प्रतियोगि नहीं होसकता, किन्तु घटाद्यभावही लक्षणघटक होगा. अभा-
वीय प्रतियोगिताके अवच्छेदक घटत्व पटत्वादि धर्म होंगे; अनवच्छेदक साध्यताव-
च्छेदक कपिसंयोगत्वरूप धर्म होगा. एवं पूर्वोक्तस्थलमें तो इसरीतिसे दोष नहीं;
परन्तु तथापि 'प्रतियोगिव्यधिकरण' इस अंशका 'प्रतियोग्यधिकरणवृत्तित्व' ऐसा
अर्थ करनेसे "घटः संयोगवान् सत्त्वात्" इस स्थलमें अतिव्याप्तिरूप दोष होगा;
क्योंकि यहां व्यभिचारस्थल हेत्वधिकरण गुणकर्म हैं. उनमें यद्यपि संयोगरूप-
साध्यका अभावभी पासकतेहैं तथापि संयोगरूप साध्यका अभाव पूर्वोक्त रीतिसे
लक्षणघटक नहीं होसकता; क्योंकि संयोगरूप साध्यका अभाव पूर्वोक्तरीतिसे
स्वप्रतियोग्यधिकरणावृत्ति नहीं है किन्तु अव्याप्यवृत्ति होनेसे स्वप्रतियोग्यधिकरण
वृत्तिही है; इसलिये यह अभाव लक्षणघटक नहीं होसकता. एवं यहांभी हेत्वधिक-
रणवृत्ति घटाद्यभाव लेनेसे अभावीय प्रतियोगितावच्छेदक घटत्वादि धर्म होंगे अन-
वच्छेदक साध्यतावच्छेदक संयोगत्वरूप धर्म होगा. एवं अलक्ष्यस्थलमें लक्षण
संगत होनेसे अतिव्याप्ति हुई.
हेत्वधिकरणे प्रतियोग्यनधिकरणवृत्तित्वविशिष्टस्य विवक्षित-
त्वात्। स्वप्रतियोग्यनधिकरणीभूतहेत्वधिकरणवृत्त्यभाव इति
निष्कर्षः। १०।
समाधान-हेत्वधिकरणवृत्त्यभावके विशेषणीभूत 'प्रतियोगिव्यधिकरण'
अंशका अर्थ हम पूर्वोक्त रीतिसे नहीं करते; किन्तु 'प्रतियोगिव्यधिकरण' कथनसे
प्रतियोग्यनधिकरणवृत्तित्व विशिष्ट अभावकी हेत्वधिकरणमें विवक्षा करते हैं अर्थात्
इसका भाव यह है कि-हेत्वधिकरण वृत्त्यभाव अपने प्रतियोगिके अनधिकरणीभूत
हेत्वधिकरणमें वर्तनेवाला होना चाहिये. ऐसा अर्थ करनेसे पूर्वोक्त उभयस्थलमें
दोष नहीं क्योंकि “वृक्षः कपिसंयोगवान् एतद्वृक्षत्वात्” यहां अपने प्रतियोगिका
अनधिकरणीभूत हेत्वधिकरण वृत्त्यभाव कपिसंयोगाभाव तो होही नहीं सकता. यद्यपि
कपिसंयोगाभावभी मूलावच्छेदेन वृक्षमें रहताहै तथापि वह अभाव अपने प्रतियोगिके
१४० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
अनधिकरणीभूत हेत्वधिकरणमें नहीं है किन्तु अपने प्रतियोगीके अधिकरणीभूत हे-
त्वधिकरणहीमें रहताहै. इसलिये कपिसंयोगाभावको लक्षणघटक न होनेसे घटाद्यभा-
व लेकर लक्षण संगत करनेसे अव्याप्तिरूप दोष नहीं है. एवं " घटः संयोगवान्
सत्त्वात् " इस स्थलमें सत्तारूप हेत्वधिकरण गुणकर्ममें संयोगरूप साध्यका अभाव
अपने प्रतियोगीके अनाधिकरणीभूत हेत्वधिकरणमें रहता है; इसलिये लक्षणघटक है.
एवं तादृशाभावीय प्रतियोगितावच्छेदकही साध्यतावच्छेदक संयोगत्वरूप धर्म होगा.
अनवच्छेदक न होनेसे लक्षण संगत नहीं है याते अतिव्याप्तिरूप दोषभी नहीं है.
एवं लक्षणस्वरूप ऐसा हुआ कि (स्वप्रतियोग्यनधिकरणीभूत) जो (हेतुतावच्छेदकसम्ब-
न्धावच्छिन्नहेतुतावच्छेदकावच्छिन्नहेत्वधिकरण) तादृशहेत्वधिकरण(वृत्ति) जो अभाव तादृ-
श (अभावीयप्रतियोगितानवच्छेदकं यत् साध्यतावच्छेदकं तदवच्छिन्नसाध्यसामाना-
धिकरण्यं व्याप्तिः ) १० ।
प्रतियोग्यनधिकरणं प्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्नानधिकरणं
बोध्यम्। तेन विशिष्टसत्तावान् जातेरित्यादौ जात्याधिकरणगुणा-
देर्विशिष्टसत्ताभावप्रतियोगिसत्ताधिकरणत्वेऽपि न क्षतिः । ११।
भाषा-इस लक्षणमें प्रतियोग्यनधिकरणीभूत हेत्वधिकरण प्रतियोगितावच्छेदका-
वच्छिन्नका अनधिकरण जानना, अन्यथा "घटो विशिष्टसत्तावान् जातेः" इस स्थलमें
अतिव्याप्ति होगी; क्योंकि यहां जातिरूप हेतुका व्यभिचारस्थल गुणकर्म हैं. उस
हेत्वधिकरण गुणकर्ममें विशिष्टसत्ताभाव तो पा नहीं सकते; क्योंकि " विशिष्टवस्तु
शुद्धवस्तुसे अतिरिक्त नहीं होती " इस न्यायसे विशिष्टसत्ताभावका प्रतियोगी शुद्ध
सत्ताभी होसकती है. उस शुद्धसत्ताका अभाव हेत्वधिकरण गुणकर्मोंमें नहीं है; एवं
साध्याभावको लक्षणघटक न होनेसे घटाभाव लेकर लक्षण संगत करनेसे अतिव्याप्ति
होगी.परन्तु यदि प्रतियोगीका अनधिकरण हेत्वधिकरण प्रतियोगितावच्छेदक धर्माव-
च्छिन्नका अनधिकरण कहतेहैं तो हेत्वधिकरण गुणकर्ममेंविशिष्टसत्तात्वेन विशिष्टसत्ताका
अभाव पासक्तेहैं. उस अभावका प्रतियोगी विशिष्टसत्ता होगी.प्रतियोगितावच्छेदक धर्म
विशिष्टसत्तात्व होगा.अनवच्छेदक साध्यतावच्छेदकधर्मके न होनेसे अतिव्याप्तिरूप दोष
नहीं है. एवं लक्षणका स्वरूप ऐसा हुआ कि-( प्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्न प्रति-
योग्यनधिकरणीभूत ) जो ( हेतुतावच्छेदकसम्बन्धावच्छिन्नहेतुतावच्छेदकावच्छिन्नहे-
त्वधिकरण )तादृश हेत्वधिकरण(वृत्ति)जो अभाव ( तादृशाभावीयप्रतियोगितानवच्छे-
दकं यत् साध्यतावच्छेदकं तदवच्छिन्नसाध्यसामानाधिकरण्यं व्याप्तिः) । ११।
एवं साध्यतावच्छेदकसम्बन्धेन प्रतियोग्यनधिकरणत्वं बोध्यम्।
परिच्छेदः२ ] भाषाटीकासमेता १४१
तेन ज्ञानवान् द्रव्यत्वादित्यादौ द्रव्यत्वाधिकरणघटादेर्विषय-
तासम्बन्धेन ज्ञानाधिकरणत्वेऽपि न क्षतिः । १२ ।
भाषा-एवं हेत्वधिकरणमें प्रतियोग्यनधिकरणताभी साध्यतावच्छेदकसम्बन्धसे
विवक्षित है. अन्यथा "आत्मा ज्ञानवान् द्रव्यत्वात्" इस समवायेन साध्यहेतुक
स्थलमें अतिव्याप्ति होगी; क्योंकि यहां द्रव्यत्वरूप हेतुका व्यभिचारस्थल घटादिक
हैं. उन हेत्वधिकरणघटादिकोंमें ज्ञानरूप साध्यका अभाव तो नहीं पा
सकते; क्योंकि ज्ञानरूप साध्य विषयतासम्बन्धसे यावत् घटपटादि
विषयोंमें विद्यमान है; किंतु उदासीन घटादिका अभाव लक्षणघटक
हो सकता है. एवं अभावीय प्रतियोगिताके अवच्छेदक घटत्वादि धर्म
होंगे. अनवच्छेदक साध्यतावच्छेदक ज्ञानत्व धर्म होगा. तदवच्छिन्न साध्यके
साथ द्रव्यत्वरूप हेतुका सामानाधिकरण्यरूप व्याप्तिका लक्षण संगत होनेसे अति-
व्याप्तिरूप दोष हुआ परन्तु यदि साध्यतावच्छेदक सम्बन्धसे प्रतियोग्यनधिकरणी-
भूत हेत्वधिकरण कहें तो यहां साध्यतावच्छेदक सम्बन्धसमवाय है. समवायसम्ब-
न्धसे ज्ञानाधिकरण आत्माही है; घटादिक नहीं. एवं द्रव्यत्वरूप हेत्वधिकरण
घटादिकोंमें समवायसम्बन्धावच्छिन्न प्रतियोगिताक ज्ञानरूप साध्याभावभी लक्षण
घटक हो सकताहै. तादृशाभावीय प्रतियोगितावच्छेदकही ज्ञानस्वरूप साध्यतावच्छे-
दक धर्म होगा. अनवच्छेदक साध्यतावच्छेदक न होनेसे अतिव्याप्तिरूप दोष
नहीं है १२ ।
इत्थं च वह्निमान् धूमादित्यादौ धूमाधिकरणे समवायेन वह्नि-
विरहसत्त्वेऽपि न क्षतिः । १३ ।
भाषा-एवं प्रतियोग्यनधिकरणमें साध्यतावच्छेदक सम्बन्धका निवेश करनेसे
"पर्वतो वह्निमान् धूमात्" इस स्थलमें अव्याप्तिरूप दोषभी नहीं है. अन्यथा
हेत्वधिकरण पर्वतमें समवायसम्बन्धावच्छिन्न प्रतियोगिताकवह्निरूप साध्यका अभाव
ही पासकते हैं. तादृशाभावीय प्रतियोगितावच्छेदक वह्नित्वधर्म होगा. अनवच्छेदक
साध्यतावच्छेदकके न होनेसे लक्षण संगत नहीं है. एवं अव्याप्ति दोष हुआ; परन्तु
यदि प्रतियोग्यनधिकरणमें साध्यतावच्छेदक सम्बन्धकी विवक्षा करतेहैं तो साध्य-
तावच्छेदक संयोगसम्बन्धसे हेत्वधिकरण पर्वतादिमें वह्निरूप साध्यका अभाव नहीं
पासकते क्योंकि वह्नि वहां संयोगेन रहता है. किन्तु घटाद्यभाव लक्षणघटक होगा.
अभावीयप्रतियोगितावच्छेदक घटत्वादि धर्म होंगे. अनवच्छेदक साध्यतावच्छेदक
वह्नित्वधर्म होगा. एवं लक्षण संगत होनेसे अव्याप्तिरूप दोष नहीं है. एवं लक्षणका