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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 350 में से

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पृष्ठ 158

१३४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
है;क्योंकि यहां साध्यतावच्छेदकधर्मगुणत्व है. वह हेत्वधिकरणवृत्त्यभावीय प्रतियो-
गिताका अनवच्छेदक इसलियेहै कि-हेत्वधिकरण घटमें “गुणत्वेन गुणोनास्ति” ऐसा
अभाव नहीं कह सकते; क्योंकि घट द्रव्य है उसमें कोई न कोई गुण अवश्यहीरहेगा. एवं
यदि हेत्वधिकरणवृत्त्यभाव नीलगुणाभाव पीतगुणाभावभी लेंगे तो अभावीय प्रति-
योगिता नीलपीतगुणनिष्ठा होगी. उस प्रतियोगिताके अवच्छेदक धर्म नीलगुणत्व
पीतगुणत्वादि होंगे. अनवच्छेदक साध्यतावच्छेदक शुद्धगुणत्व होगा इसीरीतिसे
लक्षण संगत है.एवं लक्षणका स्वरूप ऐसा हुआ कि-( हेत्वधिकरणवृत्त्यभावीय प्रति-
योगिता ) का ( अनवच्छेदक ) जो ( साध्यतावच्छेदक, तदवच्छिन्नसाध्य) के साथ
( सामानाधिकरण्य ) रूपा हेतुपर व्याप्ति है ५ ।
ननु रूपत्वव्याप्यजातिमद्वान् पृथिवीत्वादित्यादौ साध्यता-
वच्छेदकारूपत्वव्याप्यजातयस्तासां च शुक्लत्वादिस्वरूपाणां
नीलघटादिवृत्त्यभावप्रतियोगितावच्छेदकत्वमस्तीत्यव्याप्तिरि-
ति चेत् । न । तत्र परम्परया रूपत्वव्याप्यजातित्वस्यैव साध्य-
तावच्छेदकत्वात् । न हि तादृशधर्मावच्छिन्नाभावः क्वापि पृथि-
व्यामस्ति । रूपत्वव्याप्यजातिमान् नास्तीति बुद्धेचापत्तेः । ६ ।
शंका-इस लक्षणकीभी 'घटो रूपत्वव्याप्यजातिमद्वान् पृथिवीत्वात्' इस स्थलमें
अव्याप्ति होगी. क्योंकि रूपत्वव्याप्य जातिवाले नीलपीतादि गुण यहां साध्य हैं
और नीलपीतादिगुणोंमें रहनेवाली नीलत्वपीतत्वादि जातियां यहां साध्यताव-
च्छेदक हैं. एवं हेत्वधिकरण रक्तश्वेतादि गुणयुक्त घटपटादिमें सप्तविध रूपमेंसे
नीलपीतादि किसीन किसी एक रूपका अभावभी पासकतेहैं. अभावीय प्रतियोगिता
नीलपीतादि गुणनिष्ठा होगी और प्रतियोगिताकी अवच्छेदक नीलत्व पीतत्वादि
जातियां होंगी. एवं नीलत्व पीतत्वादि जातियोंको अभावीय प्रतियोगिताका अनव-
च्छेदक साध्यतावच्छेदकरूप धर्म न होनेसे अव्याप्ति हुई.समाधान-ऐसे स्थलों-
में हम ' स्वाश्रयसमवाय ' रूप परंपरासम्बन्धसे रूपत्वव्याप्यजातियोंमें रहनेवाले
' जातित्वधर्म ' हीको साध्यतावच्छेदक मानते हैं. 'स्व' शब्दसे यहां रूपत्वव्याप्य
जातित्वका ग्रहण है, उसका 'आश्रय' रूपत्व व्याप्य नीलत्वपीतत्वादिजातियां हैं उन
जातियोंका नीलपीतादिगुणोंमें समवायहै.आगेनीलपीतादिगुण द्रव्यमें समवायसम्बन्ध
से साध्य हैं. एवं रूपत्वव्याप्यजातित्वरूप धर्म 'स्वाश्रयसमवाय'सम्बन्धसे नीलपीता-
दिगुणोंमें रहकर साध्यतावच्छेदक हो सकताहै. एवं हेत्वधिकरणद्रव्यवृत्त्यभाव