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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 156, कुल 350 में से

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पृष्ठ 156

१३२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
भाषा-हेतुमात्रिनिष्ठ जो (विरह) अभाव उस अभावका अप्रतियोगि जो साध्य
तादृश साध्यके साथ हेतुका एकाधिकरणत्वही हेतुके शिरपर वह्तिनिरूपित
व्याप्ति है ॥ ६९ ॥
हेतुमति निष्ठा वृत्तिर्यस्य स तथा विरहोऽभावस्तथा च हेत्वधि-
करणवृत्तियोंऽभावस्तदप्रतियोगिना साध्येन सह हेतोः सामा-
नाधिकरण्यं व्याप्तिरुच्यत इत्यर्थः । १ ।
भाषा-अर्थात् हेतुवाले पक्षमें (निष्ठा) वृत्ति होवे जिसकी एवंभूत जो अभाव
ऐसा अर्थ करनेसे हेत्वधिकरणमें वर्तनेवाला जो अभाव उस अभावका अप्रतियोगि
जो साध्य उस साध्यके साथ हेतुका जो एकाधिकरणवृत्तित्व, वही हेतुके शिरपर
व्याप्ति है. इस लक्षणकी पूर्वोक्त “सत्तावान् जातेः” इस स्थलमें अव्याप्ति नहीं है;
क्योंकि यहां जातिरूप हेतुके अधिकरण द्रव्य गुण कर्म तीन हैं; उनमें उन पदा-
र्थोंहीका अभाव रहेगा जो पदार्थ उनमें नहीं रहेंगे ऐसे घटपटादि हैं. और जो पदार्थ
उनमें रहेगा उसका अभाव नहीं कहसकते ऐसा पदार्थ सत्ता है; जिनका अभाव
रहेगा वही पदार्थ उस अभावके प्रतियोगी कहे जावेंगे. हेतुअधिकरणमें घटपटादि-
का अभाव है; इसलिये घटपटादि अभावके प्रतियोगी हैं सत्ताका अभाव नहीं;
इसलिये सत्ता उस अभावका अप्रतियोगि है, वही साध्यभी है. एतादृश अप्रतियोगि
साध्यके साथ जातिरूप हेतुका एकाधिकरणवृत्तित्व है याते लक्षण संगत है. इसा
रीतिसे “वह्निमान् धूमात्”इत्यादि पूर्वोक्त सब स्थलोंमें लक्षणसमन्वय जानलेना १।
अत्र यद्यपि वह्निमान् धूमादित्यादौ हेत्वधिकरणपर्वतादिवृत्त्य-
भावप्रतियोगित्वं तत्तद्वह्नयादेरस्तीत्यव्याप्तिः । २ ।
शंका-यह लक्षणभी “वह्निमान् धूमात्” इस स्थलमें अव्याप्त है क्योंकि हेतु
अधिकरण पर्वतादिमें महानसीय वह्निका अभाव तथा महानसमें चत्वरीयवह्निका
अभाव तथा चत्वरमें गोष्ठीय वह्निका अभाव; एवं गोष्ठमें पर्वतीय वह्निका
अभाव पासकतेहैं; उस अभावका अप्रतियोगि वह्निरूप साध्य नहीं हुआ किन्तु
प्रतियोगीही हुआ है. इसलिये इस लक्षणकी यहां अव्याप्ति है २ ।
न च समानाधिकरणवह्निधूमयोरेव व्याप्तिरिति वाच्यम् । ३ ।
सिद्धान्ती-हमारे इस लक्षणका भाव यह है कि ‘तद्वेत्वधिकरणवृत्ति’ जो
अत्यन्ताभाव उस ‘अत्यन्ताभाव’ का ‘अप्रतियोगि’ जो ‘तत् साध्य’ तादृश साध्यके
‘सामानाधिकरण्य’ रूप व्याप्ति है अर्थात् पर्वतीय धूमके साथ पर्वतीय वह्निके