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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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पृष्ठ 160

१३६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
अव्याप्तिरूप दोष नहीं. यहां कईएक विद्वानोंकी यहभी सम्मति है कि-साध्यसाधनके
भेदसे लक्षणभिन्न २ होसकते हैं. इसलिये परम्परासम्बन्धसे अवच्छेदक माननेका कुछ
काम नहीं किन्तु ऐसे स्थलोंके लिये लक्षणान्तर करना उचित है. एवं ऐसे स्थलोंमें ऐसा
लक्षण करना कि-(हेत्वधिकरणवृत्त्यभावीयप्रतियोगितावच्छेदकतानवच्छेदकं यत् सा-
ध्यतावच्छेदकतावच्छेदकं तदवच्छिन्नावच्छिन्नसाध्यसामानाधिकरण्यं व्याप्ति:) “अर्थात्
हेत्वधिकरणवृत्ति जो अभाव तादृश भावनिरूपितजो प्रतियोगितातादृश प्रतियोगिताका
जो अवच्छेदक उस अवच्छेदकमें रहनेवाली जो अवच्छेदकता तादृश अवच्छेदकता-
का अनवच्छेदक जो साध्यतावच्छेदकताका अवच्छेदकधर्म तद्धर्मावच्छिन्नावावच्छिन्न
साध्यसामानाधिकरण्यरूप व्याप्ति हेतुपर है.” ‘रूपत्वव्याप्यजातिमद्वान् पृथिवीत्वात्,
दण्डिमान् दण्डिसंयोगात्’ इत्यादिस्थलोंमें यह लक्षण सार्थक है. यहां पूर्वोक्तरीतिसे
हेत्वधिकरणवृत्त्यभावीय प्रतियोगितारूपत्वव्याप्यजातिमत् तत्तत् नीलपीतादिरूपपर
और तत्तत् दण्डिपर रहेगी, उस प्रतियोगिताके अवच्छेदक रूपत्वव्याप्य नीलत्वपी-
तत्त्वादिजातियां और दण्ड होगा और अभावीयप्रतियोगिताकी अवच्छेदकताका अनव-
च्छेदक तथा साध्यतावच्छेदकताका अवच्छेदक ‘ रूपत्वव्याप्यजातित्व ’ तथा
‘ दण्डत्व ’ होगे; तदवच्छिन्न ‘ रूपत्वव्याप्यजातियां ’ तथा ‘ दण्ड ’ तदवच्छिन्न
‘ नीलपीतादिगुण ’ तथा ‘ दण्डी ’ यही दोनों यथाक्रम समवायसे तथा संयोगसे
साध्य हैं. एतादृश साध्योंके साथ पृथिवीत्वरूप हेतुका तथा दण्डिसंयोगरूप हेतुका
सामानाधिकरण्यभी है; याते व्याप्तिका लक्षण संगत है ७ ।
हेत्वधिकरणं च हेतुतावच्छेदकविशिष्टाधिकरणं वाच्यम् । तेन
द्रव्यं गुणकर्मान्यत्वविशिष्टसत्त्वादित्यादौ शुद्धसत्ताधिकरण-
गुणादिनिष्ठाभावप्रतियोगित्वेऽपि द्रव्यत्वस्य नाव्याप्तिः । ८ ।
भाषा-“ हेत्वधिकरणवृत्त्यभावीयप्रतियोगितानवच्छेदकं यत् साध्यतावच्छेदकं
तदवच्छिन्नसाध्यसामानाधिकरण्यं व्याप्तिः ” इत्याकारक लक्षणमें हेत्वधिकरणभी
हेतुतावच्छेदक जो धर्म तद्धर्मविशिष्ट हेतुका अधिकरण जानना, अन्यथा “ द्रव्यं
द्रव्यत्ववत् गुणकर्मान्यत्वविशिष्टसत्तात्” इस स्थलमें अव्याप्ति होगी, क्योंकि विशिष्ट-
वस्तु शुद्धसे जुदा नहीं होती. इस अनुभवसे विशिष्टसत्ता शुद्धसत्ताको एकरूप होनेसे
उसके अधिकरण गुणकर्म्मभी हुए. तद्वृत्तिअभाव “ द्रव्यत्वं नास्ति ” इत्याकारक
अभाव एतादृश अभावीय प्रतियोगिता द्रव्यत्वरूप साध्यनिष्ठा प्रतियोगिता एतादृश
प्रतियोगिताका अवच्छेदकही ‘ द्रव्यत्वत्व’ रूप साध्यतावच्छेदकधर्म हुआ है. अनव-
च्छेदक साध्यतावच्छेदक नहीं हुआ. एवं अव्याप्ति हुई, परन्तु यदि हेत्वधिकरणता