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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 350 में से

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पृष्ठ 148

१२४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
निति ज्ञानं वा । अनुमितिस्तु पक्षे व्याप्य इति ज्ञानात् पक्षे सा-
ध्यमित्याकारिका, पक्षो व्याप्यवानिति ज्ञानात् पक्षः साध्यवा-
नित्याकारिका । द्विविधादपि परामर्शात् पक्षः साध्यवानित्येवा-
नुमितिरित्यन्ये ।
भाषा—साध्यनिरूपित व्याप्तिविशिष्ट हेतुका पक्षके साथ वैशिष्ट्यावगाहि ज्ञान अनु-
मितिका जनक है; उसीका नाम 'परामर्श' है. उसी परामर्शज्ञानके विशेषणविशेष्यभावके
विपर्याससे दो स्वरूप हैं; उनमें एक तो पक्षप्रकारक व्याप्तिविशिष्टविशेष्यक 'व्याप्यः
पक्षे' इत्याकारक ज्ञान है और दूसरा व्याप्तिविशिष्ट प्रकारक पक्षविशेष्यक "पक्षो
व्याप्यवान्" इत्याकारक ज्ञान है. एवं कारणीभूत परामर्शके आकारमें भेद होनेसे
अनुमितिके आकारमेंभी भेद होता है अर्थात् प्रथम परामर्शसे पक्षप्रकारक साध्य
विशेष्यक "पक्षे साध्यं" इत्याकारक अनुमिति ज्ञान होताहै और द्वितीय परामर्शसे
साध्यप्रकारक पक्षविशेष्यक "पक्षः साध्यवान्" इत्याकारक अनुमितिज्ञान होताहै और
कई एक नवीन नैयायिक ऐसा मानतेहैं कि—पूर्वोक्त पक्षविशेष्यक तथा व्याप्तिविशि-
ष्टविशेष्यक उभयविध परामर्शसे साध्यप्रकारक पक्षविशेष्यक 'पक्षः साध्यवान्' इत्या
कारक एकही अनुमिति होती है—इति। पूर्वोक्त रीतिसे लिङ्गदर्शन व्याप्तिस्मरण औ-
र परामर्श इन तीनोंज्ञानोंके पश्चात् अनुमिति ज्ञानकी उत्पत्ति मानी है. उनमें पराम-
र्श ज्ञानको अस्वीकार करता हुआ मीमांसक कहताहै.
ननु वह्निव्याप्यधूमवान् पर्वत इति ज्ञानं विनाऽपि यत्र पर्वतो
धूमवानिति प्रत्यक्षं ततो धूमो वह्निव्याप्य इति स्मरणं भवति,
तत्र ज्ञानद्वयादेवानुमितिदर्शनात्, व्याप्तिविशिष्टवैशिष्ट्यावगा-
हि ज्ञानं सर्वत्र न कारणं किंतु व्याप्यतावच्छेदकप्रकारकपक्ष-
धर्मताज्ञानत्वेनैव कारणत्वमावश्यकत्वात्, विशिष्टवैशिष्ट्य-
ज्ञानकल्पने गौरवाच्चेति चेत् । न ।
शंका—जिस स्थलमें "पर्वतो धूमवान्" इत्याकारक प्रत्यक्ष हुआ ह तथा उसके पी-
छे "धूमो वह्निनिरूपितव्याप्त्याश्रयः" इत्याकारक जहां स्मरण हुआ है वहां इन ज्ञानद्वयसे
भी अनुमितिदेखनेमें आतीहै; इसलिये "वह्निव्याप्यधूमवानयं पर्वत:' इत्याकारक विशिष्ट-
वैशिष्ट्यावगाहि ज्ञानको अनुमितित्वावच्छिन्न यावत् अनुमितिके प्रति कारण नहीं
कहसकते, किन्तु व्याप्यतावच्छेदक 'धूमत्व' प्रकारक जो "पर्वतो धूमवान्" इत्याका-