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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 153, कुल 350 में से

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पृष्ठ 153

परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १२९
रूप हेतुको वृत्तित्वही है; वृत्तित्वाभाव नहीं; याते अव्याप्तिरूप दोष हुआ और 'साध्य-
वत्त्व ' रूप धर्मावच्छिन्नके देनेसे साध्यवाले यावत् अधिकरणोंका ग्रहण होसकता है
उनसे भिन्न जल हृदादिही मिलेंगे उनमें वृत्तित्वाभाव धूमरूप हेतुमेंभी सिद्ध है,
याते अव्याप्तिरूप दोष नहीं. एवं लक्षणका स्वरूप ऐसा हुआ कि-( साध्यतावच्छे-
दक सम्बन्धावच्छिन्न ) जो साध्यवत् तादृश ( साध्यवत्त्वावच्छिन्न प्रतियोगिताक )
जो भेद, तादृश ( भेदाधिकरणनिरूपित वृत्तित्वाभाव ) ही हेतुनिष्ठ व्याप्ति है ४ ।
येन सम्बन्धेन हेतुस्तेनैव सम्बन्धेन साध्यवदन्यवृत्तित्वं बोध्यम्।
तेन साध्यवदन्यस्मिन् धूमावयवे धूमस्य समवायसम्बन्धेन
सत्त्वेऽपि न क्षतिः ।५।
भाषा-प्रकृतमें जिस सम्बन्धसे हेतुकी विवक्षा करी होय, साध्यवद् भिन्नाधिकर-
ण में वृत्तित्वभी उस हेतुको उसी सम्बन्धसे विचारणा उचित है; अन्यथा फिर 'वह्नि
मान् धूमात्' इसी स्थलमें अव्याप्ति होगी; क्योंकि वृत्तितामें हेतुतावच्छेदक सम्ब-
न्धका निवेश न करनेसे साध्यवत्त्वावच्छिन्न प्रतियोगिताक भेदाधिकरण धूमरूप
हेतुके अवयवभी होसकते हैं; उनमें धूमरूप हेतु समवायसम्बन्धसे वृत्तिही है. अवृ-
त्ति नहीं याते अव्याप्तिरूप दोष हुआ; और यदि साध्यवद् भेदाधिकरणनिरूपित
वृत्तितामें हेतुतावच्छेदक सम्बन्धका निवेश करें तो प्रकृतमें हेतुतावच्छेदक सम्बन्ध
संयोग है परन्तु संयोगसम्बन्धसे धूमरूप हेतु न अपने अवयवोंमें रहता है और
न जलह्रदादिमें रहताहै; किंतु स्वसाध्यवह्निके साथ पर्वतादिहीमें रहता है. इसलिये
अव्याप्तिरूप दोष नहीं. एवं लक्षणका स्वरूप ऐसा हुआ कि-( साध्यतावच्छेदक
सम्बन्धावच्छिन्न साध्यवत्त्वावच्छिन्नप्रतियोगिताक ) जो भेद तादृश ( भेदाधिकरण
निरूपिता ) जो ( हेतुतावच्छेदक सम्बन्धावच्छिन्ना ) वृत्तिता तादृश ( वृत्तित्वाभाव)
ही हेतुनिष्ठ व्याप्ति है । ५।
साध्यवदन्यावृत्तित्वं च साध्यवदन्यवृत्तित्वत्वावच्छिन्नप्रतियो-
गिताकाभावः, तेन धूमवान् वन्हेरित्यात्र साध्यवदन्यजलह्रदादिवृ-
त्तित्वाभावेऽपिनातिव्याप्तिः । ६।
भाषा-यहां हेतुनिष्ठ साध्यवद् भेदाधिकरणसे अवृत्तिताभी साध्यवद् भेदाधिकरणत्वा-
वच्छिन्नाधिकरणसे अपेक्षित है. अन्यथा साध्यवद् भेदाधिकरण यावत् नहीं लेंगे तो
'धूमवान् वन्हेः' इसी स्थलमें अतिव्याप्ति होगी; क्योंकि भेदाधिकरणत्वावच्छिन्न अ-
धिकरणका ग्रहण न करनेसे साध्यवत् पर्वतादिसे भिन्न जलह्रद है. उसमें वह्निरूप हेतु
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