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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 147, कुल 350 में से

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पृष्ठ 147

परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १२३
है" इत्याकारक ज्ञान होता है. इसी ज्ञानको शास्त्रमें परामर्शात्मक ज्ञान कहते हैं,
इस ज्ञानके पीछे "पर्वतो वह्निमान्" ऐसा ज्ञान होता है यही ज्ञान अनुमितिरूप है.
अत्र प्राचीना व्याप्यत्वेन ज्ञायमानं धूमादिकं लिङ्गमनुमितिक-
रणमिति वदन्ति, तद्दूषयति, ज्ञायमानमिति-
भाषा-यहां प्राचीन नैयायिक लोग व्याप्ति आश्रयत्वेन ज्ञातहुए धूमादि हेतुओं-
को अनुमितिकी करणता कहतेहैं और लिङ्गपरामर्शको मध्यमें व्यापार मानतेहैं; उ-
सको 'ज्ञायमान' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार दूषित करतेहैं-

  • ज्ञायमानं लिङ्गं तु करणं न हि ।
    अनागतादिलिङ्गेन न स्यादनुमितिस्तदा ॥ ६७ ॥
    भाषा-ज्ञातहुआ हेतु अनुमितिका करण नहीं होसकता, यदि ऐसा होय तो अती-
    तानागत हेतुओंसे अनुमिति ज्ञान नहीं हुआ चाहिये ॥ ६७ ॥
    लिङ्गस्यानुमित्यकरणत्वे युक्तिमाह । अनागतादीति ।
    यद्यनुमितौ लिङ्गं करणं स्यात् तदाऽनागतेन विनष्टेन वा लिङ्गे-
    नानुमितिर्न स्यात्, अनुमितिकरणस्य लिङ्गस्य तदानीमभावात्-
    इति ॥ ६७ ॥
    भाषा-लिङ्गको करण न होनेमें युक्ति यह है कि-यदि अनुमितिके प्रति लिंगको
    करणता होय तो "इयं यज्ञशाला वह्निमती भविष्यति भाविधूमात्" एवं "इयं यज्ञशाल
    वह्निमत्य्यासीत् भूतधूमात्" इत्यादि अनागत तथा विनष्ट हेतुओंसे अनुमिति नहीं होनी
    चाहिये, क्योंकि अनुमिति कारणीभूत हेतु उस कालमें विद्यमान नहींहै. शंका-परा-
    मर्शरूप व्यापार सम्बन्धसे स्वातीतानागत कालमेंभी हेतु विद्यमान है याते कुछ
    दोष नहीं. समाधान-अतीतानागत लिङ्गको परामर्शकी जनकताही सिद्ध नहीं; इस
    लिये परामर्श अतीतानागत लिङ्गका व्यापार नहीं बन सकता-इति ॥ ६७ ॥
    व्याप्यस्य पक्षवृत्तित्वधीः परामर्श उच्यते ।
    भाषा-साध्यनिरूपित व्याप्तिआश्रयहेतुको पक्षवृत्तित्वावगाहनी बुद्धिका नाम 'प-
    रामर्श' है.
    व्याप्यस्येति।व्याप्तिविशिष्टस्य पक्षेण सह वैशिष्ट्यावगाहि ज्ञान-
    मनुमितिजनकम्, तच्च व्याप्यः पक्ष इति ज्ञानं पक्षो व्याप्यवा-