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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 155, कुल 350 में से

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पृष्ठ 155

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. १३१
जो भेद तादृश (भेदाधिकरणतावच्छिन्न भेदाधिकरणनिरूपित) जो (हेतुतावच्छेदक
सम्बन्धावच्छिन्ना) वृत्तिता तादृश (वृत्तितानवच्छेदक जो) (हेतुतावच्छेदकधर्म)
तादृश (धर्मवत्त्व) ही हेतुनिष्ठ व्याप्ति है ॥ ६८ ॥
ननु केवलान्वयिनि ज्ञेयत्वादौ साध्ये साध्यवदन्यस्याप्रसिद्धत्वा-
दव्याप्तिः, किंच सत्तावान् जातेरित्यादौ साध्यवदन्यस्मिन्
सामान्यादौ हेतुतावच्छेदकसम्बन्धेन समवायेन वृत्तेरप्रसिद्धत्वा-
दव्याप्तिश्चात आह, अथ वेति-
शंका-पूर्वोक्त समग्रलक्षणकी 'वाच्यं वाच्यत्ववत् ज्ञेयत्वात्' इत्यादि केवलान्वयि
हेतुक स्थलमें अव्याप्ति होगी क्योंकि 'वाच्य' नाम "अस्माच्छब्दादयमर्थो बोद्धव्यः"
इत्याकारक ईश्वरीय इच्छाविषयभूत पदार्थोंका है और 'ज्ञेय' नाम ईश्वरके ज्ञानके
विषय होनेवाले पदार्थोंका है. ईश्वरीय ज्ञानकी तथा इच्छाकी विषयता पदार्थमात्रमें
रहती है; इसीसे वाच्य तथा ज्ञेय पदार्थमात्रको कह सकते हैं और उनमें रहनेवाले
वाच्यत्व तथा ज्ञेयत्व आदिधर्मभी पदार्थमात्रमें रहसकते हैं इसरीतिसे यावत् पदा-
र्थको वाच्यत्वधर्मवाला होनेसे वाच्यत्ववद् भेदाधिकरण कोई पदार्थ नहीं; भेदाधिक-
रणके अप्रसिद्ध होनेसे उसमें वृत्तिता अप्रसिद्धा.वृत्तिताके अप्रसिद्ध होनेसे हेतुनिष्ठ अवृ-
त्तिवभी अप्रसिद्ध हुआ इसरीतिसे लक्षणकी अव्याप्ति हुई और यहां यदि ऐसा कहें
कि केवलान्वयि ज्ञानकालमें साध्यसंशयरूप पक्षताके अभाव होनेसे यहां अनुमितिकी
योग्यताही नहीं और यदि केवलान्वयिक ज्ञान नहीं हुआ तो भ्रमात्मक व्याप्तिज्ञानसे
अनुमिति होही सकती है. इसलिये 'वाच्यंवाच्यत्ववत् ज्ञेयत्वात्' इस स्थलमें लक्षणकी
अव्याप्ति कहनी योग्य नहीं तो 'सत्तावान् जातेः' इस स्थलमें पूर्वोक्त लक्षणकी
अव्याप्ति पूर्णरूपसे है क्योंकि यहां साध्यवाले द्रव्य, गुण, कर्म्म, तीन हैं; और
साध्यवद् भेदाधिकरण सामान्याविशेषादि हैं उनमें हेतुतावच्छेदक समवायसम्बन्धसे
यदि किसीको वृत्तित्त्व होवे तो वृत्तित्वाभाव जातिरूप हेतुपर आवे. परन्तु उनमें
समवायसम्बन्धावच्छिन्ना वृत्तिता अप्रसिद्ध है; इसलिये पूर्वोक्त लक्षणकी उस स्थलमें
अव्याप्ति है समाधान-मूलकार 'अथवा' इत्यादि ग्रन्थसे एतद् लक्षसाधारण
अनुगत लक्षणान्तर करतेहैं-
अथवा हेतुमन्निष्ठविरहाप्रतियोगिना ॥
साध्येन हेतोरैकाधिकरण्यं व्याप्तिरुच्यते ॥६९॥