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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 159, कुल 350 में से

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पृष्ठ 159

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. १३५

नीलत्वजातिमदभाव पीतत्वजातिमदभाव लेसकतेहैं. एतादृश अभावीय प्रतियोगिता
नीलपीतादिगुणोंमें रहेगी. उस प्रतियोगिताके अवच्छेदक नीलत्वपीतत्वादि धर्म होंगे
यही धर्म रूपत्वकी व्याप्यजातियां हैं. इन सबमें रहनेवाला 'रूपत्वव्याप्यजातित्वरूप-
धर्म' साध्यतावच्छेदक है. यही धर्म अभावीय प्रतियोगिताका अनवच्छेदक भी है
क्योंकि सप्तविधरूप किसीएक पृथिवीमें एक जगह कहीं नहीं रहता; इसलिये रूपत्व
व्याप्य जातिमदभाव तो हेत्वधिकरण पृथिवीमें कह सकते हैं; परन्तु रूपत्वव्याप्य
जातित्वावच्छिन्नवदभाव किसी पृथिवीमें नहीं कहसकते. तात्पर्य यह कि-ऐसा
अभाव नीरूप पृथिवीमें रहसकता है. परन्तु नीरूप पृथिवी संसारमें दुर्लभ है कोई
न कोई रूप पृथिवीमें रहताही है यदि नीरूप पृथिवीभी कोई होवे तो "रूपत्वव्या-
प्यजातिमान् नास्ति" इत्याकारक बुद्धि किसी एक घटपटादिमें होनी चाहिये;
परन्तु होती तो नहीं इस रीतिसे हेत्वधिकरणवृत्त्यभावीय प्रतियोगिताका अनवच्छे-
दक तथा परंपरासम्बन्धसे साध्यतावच्छेदक 'रूपत्वव्याप्यजातित्व' रूप धर्म है याते
पूर्वोक्त अव्याप्तिरूप दोष नहीं ६ ।
एवं दण्डाद्यादौ साध्ये परम्परासम्बद्धं दण्डत्वादिकमेव साध्यता-
वच्छेदकं, तच्च प्रतियोगितानवच्छेदकमिति । साध्यादिभेदेन
व्याप्तेर्भेदात् तादृशस्थले साध्यतावच्छेदकतावच्छेदकं प्र-
तियोगितावच्छेदकतानवच्छेदकमित्येव लक्षणघटकमित्यपि
वदन्ति ७ ।
भाषा--एवं “ मठो दण्डिमान् दण्डिसंयोगात् ” इत्यादि स्थलोंमेंभी परंपरास-
म्बन्धका आश्रयण करनेसे अव्याप्तिरूप दोषवारण जानलेना. यहां यदि परंपरा
सम्बन्ध ना स्वीकार करें तो दण्डिसंयोगरूप हेतुका अधिकरण अनुयोगितासम्बन्धसे
मठ है. उस मठरूप हेत्वधिकरणमें “वृद्धदण्डी नास्ति, युवा दण्डी नास्ति, गौर-
दण्डी नास्ति, श्यामदण्डी नास्ति” इत्याकारक तत्तद्दण्डचभाव पासकतेहैं; उस
अभावकी प्रतियोगिता तत्तद्दण्डीनिष्ठ होगी और प्रतियोगिताका अवच्छेदक धर्म
दण्ड होगा वही तो साध्यतावच्छेदक था इसलिये अव्याप्ति हुई; परन्तु यदि ‘स्वस-
मवायिसंयोग’ रूप परम्परासम्बन्धसे 'दण्डत्व' रूप धर्मको साध्यतावच्छेदक मानें
तो दोष नहीं. यहां ‘स्व’ शब्दसे दण्डत्वधर्मका ग्रहण है; उसका समवायि दण्ड है;
उस दण्डका पुरुषमें संयोग है. एतादृश सम्बन्धसे दण्डत्वधर्म साध्यतावच्छेदक
हो सकता है और अभावीय प्रतियोगिताका अनवच्छेदक भी है; यान्ते पूर्वोक्तरीतिसे