न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
यदि तु तत्पुरुषीयगृह्यमाणव्याप्यतावच्छेदकप्रकारकं तत्पुरु-
षीयपक्षधर्मताज्ञानं तत्पुरुषीयानुमितौ हेतुरित्युच्यते । तदा
ऽनन्तकार्यकारणभावः ।
मीमांसक-दूसरे पुरुषके व्याप्तिज्ञानसे तथा दूसरे पुरुषके पक्षधर्मताज्ञानसे
दूसरेको अनुमिति नहीं होय सकती इसलिये जिस पुरुषको व्याप्तिज्ञान हुआहै तथा
जिस पुरुषको व्याप्यतावच्छेदक प्रकारक पक्षधर्मताज्ञान हुआहै वह ज्ञान उसी पुरु-
षके अनुमितिज्ञानमें हेतु होसकताहै.नैयायिक-ऐसा कहनेसे आपको प्रतिपुरुषभे-
दसे अनन्त कार्यकारणभावकी कल्पना करनेमें महागौरव होगा.
मन्मते तु समवायेन व्याप्तिप्रकारकपक्षधर्मताज्ञानं समवायेना-
नुमिति जनयतीति नानन्तकार्यकारणभावः ।
मीमांसक-प्रतिपुरुषभेदसे कार्यकारणभेदकी कल्पना तो आपकेभी तुल्यही
है. नैयायिक-मेरे मतमें तो समवायसम्बन्धसे व्याप्तिप्रकारक पक्षधर्मता ज्ञान
जहां होय वहां समवायसम्बन्धसे अनुमितिज्ञानको उत्पन्न करता है. इसलिये प्रति-
पुरुषभेदसे अनन्त कार्यकारणभावरूप दोष मेरे मतमें नहीं है.
यदि तु व्याप्तिप्रकारकं ज्ञानं पक्षधर्मताज्ञानं च स्वतन्त्रं कारण-
मित्युच्यते, तदा कार्यकारणभावद्वयम्, ।
मीमांसक-हमारे मतमें “वह्निव्याप्यः” इत्याकारक व्याप्तिप्रकारक ज्ञानको
(स्वतंत्र) जुदा कारणता है और “धूमवान् पर्वतः” इत्याकारक पक्षधर्मता ज्ञानको जुदा
कारणता है; ऐसा कहनेसे तत्तत्पुरुषीयत्वके निवेशकरनेकाभी कुछ काम नहीं
क्योंकि मैत्रआत्मामें अनुमितिज्ञानके स्वतंत्र हेतुभूत व्याप्तिज्ञानका अभाव होनेसे
चैत्रके व्याप्तिज्ञानकालमें उस व्याप्तिज्ञानसे शून्य मैत्रको अनुमित्यापत्ति होही नहीं
सकती; इसलिये गौरवभी नहींहै. नैयायिक-ऐसा माननेसेभी व्याप्तिप्रकारक पक्षधर्म-
ताज्ञानत्वेन कारणता है या पक्षधर्मताविषयक व्याप्तिप्रकारक ज्ञानत्वेन कारणता है ?
इस प्रकार विशेष्य विशेषणभावके विपर्यास करनेसे कार्यकारणभावद्वय सिद्ध होगा.
वह्निव्याप्यो धूमः, आलोकवान् पर्वतः, इति ज्ञानादप्यनुमितिः
स्यादिति । इत्थं च यत्र ज्ञानद्वयं तत्रापि विशिष्टज्ञानं कल्प-
नीयं फलमुखगौरवस्यादोषत्वादिति ।
मीमांसक-इस प्रकारका कार्यकारणभावद्वय तो विनिगमनाविरहसे आपकोभी
माननाही होगा. नैयायिक-यह कार्यकारणभावद्वय तो हमभी मानतेहैं; परन्तु