न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १३७
हेतुतावच्छेदक विशिष्टाधिकरणता लेतेहैं तो अव्याप्तिरूप दोष नहीं; क्योंकि यद्यपि
गुणकर्मान्यत्वविशिष्टसत्ता शुद्धसत्तासे जुदी नहीं तथापि गुणकर्मान्यत्वविशिष्टसत्ता-
त्वेन विशिष्टसत्ता भिन्न है,उसका अधिकरण केवल द्रव्य है,उसमें द्रव्यत्वरूप साध्यका
अभाव नहीं पासकते किन्तु घटादिका अभाव लेकर लक्षण संगत करनेसे अव्या-
प्तिरूप दोष नहीं है ८।
एवं हेतुतावच्छेदकसम्बन्धेन हेत्वधिकरणं बोध्यम् । तेन समवा-
येन धूमाधिकरणतदवयवनिष्ठाभावप्रतियोगित्वेऽपि वह्नेर्नाव्या-
प्तिः । ९ ।
भाषा-एवं प्रकृतलक्षणमें हेतुका अधिकरणभी हेतुतावच्छेदक सम्बन्धसे जानना
योग्य है. अन्यथा " वह्निमान् धूमात् " इस स्थलमें अव्याप्ति होगी; क्योंकि सम-
वायसम्बन्धसे धूमरूप हेतुके अधिकरण धूमके अवयवभी हैं; उनमें वर्तनेवाले अभाव-
का प्रतियोगी वह्निरूप साध्यभी है, प्रतियोगितावच्छेदक वह्नित्वधर्म होगा, एवं 'वह्नि-
त्व' धर्मको अनवच्छेदक साध्यतावच्छेदक न होनेसे अव्याप्ति हुई परन्तु यदि हेतुकी
हेतुतावच्छेदक सम्बन्धसे स्वाधिकरणमें विवक्षा करें तो हेत्वधिकरण पर्वतही होगा;
क्योंकि हेतुतावच्छेदक सम्बन्ध यहां संयोग है और संयोगेन धूम पर्वतहीमें रहता है,
अपने अवयवोंमें नहीं रहता. एवं पर्वतमें वह्निका अभाव लक्षणघटक नहीं होसकता,
क्योंकि पर्वतमें वह्निभी संयोगेन रहता है; किन्तु घटाद्यभाव लक्षणघटक होगा. एवं
अभावीय प्रतियोगितावच्छेदक 'घटत्वादि' धर्म होंगे; अनवच्छेदक साध्यतावच्छेदक
' वह्नित्वरूप ' धर्म होगा तदवच्छिन्न वह्निरूप साध्यके साथ धूमरूप हेतुका सामा-
नाधिकरण्यही व्याप्ति है याते पूर्वोक्त अव्याप्तिरूप दोष नहीं. एवं लक्षणका स्वरूप
ऐसा हुआ कि-(हेतुतावच्छेदकसम्बन्धावच्छिन्नहेतुतावच्छेदकावच्छिन्नहेत्वधिकरण-
वृत्त्यभावीयप्रतियोगितानवच्छेदकं यत् साध्यतावच्छेदकं तदवच्छिन्नसाध्यसामाना-
धिकरण्यं व्याप्तिः ) ९ ।
अभावश्च प्रतियोगिव्यधिकरणो बोध्यः । तेन कपिसंयोग्येतद्वृक्ष-
त्वादित्यत्र मूलावच्छेदेनैतद्वृक्षवृत्तिकपिसंयोगाभावप्रतियोगित्वे
ऽपि कपिसंयोगस्य नाव्याप्तिः ।
भाषा-इस प्रकृत लक्षणघटित जो हेत्वधिकरणवृत्त्यभाव है वह अभाव प्रतियोगी
व्यधिकरण होना चाहिये अर्थात् अभाव तथा अभावका प्रतियोगी दोनों एकाधिकर-
णमें नहीं रहने चाहिये. अन्यथा "वृक्षः कपिसंयोगवान् एतद्वृक्षत्वात्" इस स्थलमें
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