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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 154, कुल 350 में से

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पृष्ठ 154

अवृत्तिभी है अलक्षअसद्धेतुमें लक्षण संगत हुआ याते अतिव्याप्तिरूप दोष हुआ
और यदि भेदाधिकरणतावच्छिन्नाधिकरणका ग्रहण करें तो साध्यवद् भेदाधिकरण
जैसे जलह्रद है वैसे तप्त लोहापिण्डभी होसकताहै. उसमें वह्निरूप हेतुकी वृत्तित्व
ही है, वृत्तित्वाभाव नहीं; याते अतिव्याप्तिरूप दोष नहीं. एवं लक्षणका स्वरूप ऐसा
हुआ कि-( साध्यतावच्छेदक सम्बन्धावच्छिन्न साध्यवत्त्वावच्छिन्न प्रतियोगिक ) जो
भेद तादृश ( भेदाधिकरणतावच्छिन्न भेदाधिकरणनिरूपित )जो(हेतुतावच्छेदकसम्ब-
न्धावच्छिन्ना) वृत्तिता तादृश ( वृत्तिताकाभाव ) ही हेतुनिष्ठ व्याप्ति है ॥ ६ ॥
अत्र यद्यपि द्रव्यं गुणकर्मान्यत्वविशिष्टसत्तादित्यादौ विशिष्ट-
सत्तायाः शुद्धसत्तायाश्चैक्यात् साध्यवदन्यस्मिन् गुणादाव-
वृत्तित्वं नास्ति । तथापि हेतुतावच्छेदकरूपेणावृत्तित्वं
वाच्यम् । हेतुतावच्छेदकं तादृशवृत्तानवच्छेदकमिति
फलितोऽर्थः ॥ ६८ ॥
भाषा-यहां साध्यवद् भेदाधिकरणमें हेतुको हेतुतावच्छेदकरूपसे अवृत्तित्व होना
चाहिये. तात्पर्य यह कि, हेतुतावच्छेदक धर्म तादृश साध्यवद् भेदाधिकरणनिरूपित
वृत्तिताका अनवच्छेदक होना चाहिये.यदि ऐसा नहीं कहें तो"द्रव्यंद्रव्यत्ववत् गुणक-
र्मान्यत्वविशिष्टसत्त्वात् " इस स्थलमें अव्याप्ति होगी; क्योंकि ' विशिष्ट पदार्थ शुद्धसे
जुदा नहीं होता ' यह युक्तियुक्त अनुभव है .एवं गुणकर्मभेदविशिष्ट सत्ता जो कि
केवल द्रव्यमें ही रहती है और शुद्धसत्ता जो कि द्रव्य गुण कर्म तीनोंमें रहती
है उन दोनोंका परस्पर भेदभी नहीं कहसकते.ऐसे साध्यवत् जो द्रव्य तत्प्रतियोगि-
क भेदाधिकरण गुणकर्मादि उनमें वृत्तित्ताही है. विशिष्टसत्ताकी वृत्तित्वाभाव नहीं
याते अव्याप्ति हुई; और यदि हेतुतावच्छेदक धर्मको साध्यवद् भेदाधिकरणनि-
रूपित वृत्तिताका अनवच्छेदक मानें तो अव्याप्तिरूप दोष नहीं क्योंकि प्रकृतमें
हेतुतावच्छेदकधर्म ' गुणकर्मान्यत्वविशिष्टसत्तात्व ' है. यह धर्म साध्यवद् भेदाधि,
करणनिरूपित वृत्तिताका अनवच्छेदक इस रीतिसे है कि यद्यपि गुणकर्मभेदविशिष्ट
सत्ता तथा शुद्धसत्ताको एक होनेसे हेतु अधिकरणगुणकर्मभी हो सकतेहैं तथापि
गुणकर्मान्यत्वविशिष्टसत्तात्वेन विशिष्टसत्ता गुणकर्ममें नहीं रहती है किन्तु द्रव्यही-
में रहती है. ऐसे साध्यवद् भेदाधिकरण गुणकर्मादिकोंमें वृत्तिता गुणत्व कर्मत्वादि
धर्मोंकी है, वृत्तिताके अवच्छेदक गुणत्वत्वादि धर्म हैं. अनवच्छेदक गुणकर्मान्यत्व-
विशिष्टसत्तात्वरूप धर्म है याते पूर्वोक्त अव्याप्तिरूप दोष नहीं एवं लक्षणका स्वरूप
ऐसा हुआ कि-(साध्यतावच्छेदक सम्बन्धावच्छिन्न साध्यवत्त्वावच्छिन्नप्रतियोगितका)