न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
पृष्ठ 157, कुल 350 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १३३
व्याप्ति है एवं महानसीय धूमके साथ महानसीय वह्निकी व्याप्ति है. एवं हेतु
अधिकरण पर्वतादिमें महानसीयादि वह्निका अभाव लेनेसेभी अभावका प्रतियोगी
महानसीय वह्नि होगी. अप्रतियोगि पर्वतीयवन्हिके साथ पर्वतीय धूमका सामाना-
धिकरण्य है यान्ते अव्याप्तिरूप दोष नहीं.
तद्वह्नचादेरप्युभयाभावसत्त्वादेकसत्त्वेऽपि द्वयं नास्तीति प्रतीतेः।४।
शंका-तथापि ‘वन्हिमान् धूमात्’ इस स्थलमें अव्याप्तिका वारण नहीं
होयसकता; क्योंकि ‘एकसत्त्वेपि द्वयं नास्ति’ इस प्रतीतिसे एकवस्तुसत्त्व स्थलमें
वस्तुद्वयका अभाव कह सकतेहैं. जैसे घटवत्स्थलमें “घटपटौ न स्तः” यह कह
सकतेहैं; वैसेही “पर्वते पर्वतीयवह्निसत्त्वेऽपि वह्निघटद्वयं नास्ति” यह कह सकते हैं.
इस अभावका पर्वतीय वह्निभी प्रतियोगी है,अप्रतियोगि साध्यके न होनेसे अव्याप्तिरूप
दोष तादवस्थ्य रहा. समा०-इस दोषके वारणार्थ यह कहसकते हैं कि-हेत्वधिक-
रणवृत्त्यभावीय प्रतियोगिता व्यासज्यवृत्तिधर्मानवच्छिन्ना होनी चाहिये. उभय
व्यक्ति वृत्तिधर्मका नाम व्यासज्यवृत्तिधर्म है. प्रकृतमें हेत्वधिकरणमें “वह्निघट-
द्वयं नास्ति” इत्याकारक अभावकी प्रतियोगिता व्यासज्यवृत्तिधर्मानवच्छिन्ना नहीं
है; किन्तु वह्नि घट उभयमें रहनेवाला जो वह्नि घट उभयत्वरूप व्यासज्यवृत्तिधर्म
तदवच्छिन्नाही है;इसलिये वह्निघट उभयका अभाव लेकर लक्षण दूषितकरना उचित
नहीं किंतु शुद्ध घटाभाव लेकर लक्षण संगत होसकता है.एवं लक्षणका स्वरूप ऐसा
हुआ कि-(हेत्वधिकरणवृत्ति) जो(व्यासज्यवृत्तिधर्मानवच्छिन्न प्रतियोगिताकात्यन्ता-
भाव ) उस अभावका ( अप्रतियोगि ) जो ( साध्य ) तादृश साध्यके साथ हेतुका
सामानाधिकरण्य ) ही व्याप्ति है ४ ।
गुणवान् द्रव्यत्वादित्यादावव्याप्तिश्च । तथापि प्रतियोगितानव-
च्छेदकं यत् साध्यतावच्छेदकं तदवच्छिन्नसाध्यसामानाधिक-
रण्यं व्याप्तिरिति वाच्यम् । ५ ।
शंका-तथापि इस लक्षणकी “घटो गुणवान् द्रव्यत्वात्”इस स्थलमें अव्याप्ति है;
क्योंकि हेत्वधिकरण रक्तघटमें पीतगुणका अभाव एवं पीतघटमें श्वेतगुणका अभाव लेस-
कते हैं. उस अभावका प्रतियोगी गुणरूप साध्यही है, इसलिये अप्रतियोगि साध्यके
साथ सामानाधिकरण्यरूप व्याप्तिका लक्षण यहां अव्याप्त है.समा०-तथापि ‘साध्य
हेत्वधिकरणवृत्त्यभावका अप्रतियोगि होना चाहिये’ ऐसा अब हम नहीं कहते किन्तु
“साध्यतावच्छेदकधर्म हेत्वधिकरणवृत्त्यभावीय प्रतियोगिताका अनवच्छेदक होना
चाहिये” ऐसा कहते हैं, एवं “गुणवान् द्रव्यत्वात्”इस स्थलमें अव्याप्तिरूप दोष नहीं