न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरक पक्षधर्मताज्ञान तादृश ज्ञानत्वेन कारणता उभयवादी सिद्ध नियतपूर्ववृत्ति होनेसे
अवश्य माननेयोग्य है. ऐसे स्थलमें “वह्निव्याप्यधूमवानयं पर्वतः” इत्याकारक
विशिष्टवैशिष्ट्यावगाहि तृतीयज्ञानकी कल्पना करनी उपस्थिति कृत गौरवभी
है.-इति ।
व्याप्यतावच्छेदकाज्ञानेऽपि वह्निव्याप्यवानिति ज्ञानादनुमित्यु-
त्पत्तेर्लाघवाच्च व्याप्तिप्रकारकपक्षधर्मताज्ञानत्वेनैव कारणत्वम् ।
किंच धूमवान् पर्वत इति ज्ञानादनुमित्यापत्तिः, व्याप्यताव-
च्छेदकीभूतधूमत्वप्रकारकपक्षधर्मताज्ञानस्य सत्त्वात् ।
समाधान- “ अयमालोको धूमो वा ” इत्याकारक सन्देह स्थलमें
व्याप्यतावच्छेदक प्रकार ‘ धूमत्व ’ प्रकारक निर्णय न होनेसेभी “वह्न्य-
भाववदवृत्तिमानयमालोको धूमो वा ” इत्याकारक ज्ञानसे अनुमिति उत्पन्न
होती है इसलिये व्याप्यतावच्छेदक प्रकारक पक्षधर्मताज्ञानको वहां
व्यभिचारी होनेसे हरएक स्थलमें कारण नहीं मान सकते, किन्तु ‘व्याप्यतावच्छेदक
प्रकारकत्व’ की अपेक्षासे व्याप्तिप्रकारक पक्षधर्मताज्ञानत्वेन कारणता माननेमें अ-
वच्छेदक उपस्थिति अभावप्रयुक्त लाघव है. मीमांसक-आपने अवच्छेदकका लाघव
दिखलाया परन्तु पूर्वोक्त ज्ञानद्वयसे अनुमिति मानना मध्यमें परामर्शात्मक ज्ञानको
न स्वीकार करना तो हमारे मतमें परमलाघव है. नैयायिक-किञ्च व्याप्यता-
वच्छेदकादि अनवगाहि “धूमवान् पर्वतः” इत्याकारक ज्ञानसे अनुमिति होनी-
चाहिये;क्योंकि आपके कथनानुकूल यह ज्ञानभी व्याप्यतावच्छेदकी भूतधूमत्वप्रका-
रक पक्षधर्मता ज्ञानरूपही है.
न चगृह्यमाणव्याप्यतावच्छेदकप्रकारकपक्षधर्म्मताज्ञानस्य हेतु-
त्वमिति वाच्यम् । चैत्रस्य व्याप्तिग्रहे मैत्रस्य पक्षधर्मताज्ञानाद-
नुमितिः स्यादिति ।
मीमांसक-अनुमितिज्ञानके अव्यवहित पूर्व वर्तमान कालमें नेत्रादि इन्द्रियोंसे
ज्ञात हुए जो व्याप्यतावच्छेदकादि तादृश व्याप्यतावच्छेदकप्रकारक पक्षधर्मता
ज्ञानत्वेन हेतुता है इसलिये कालान्तरीय तादृश ज्ञानको लेकर दोष नहीं है. नैया-
यिक-तथापि महानसादिकोंमें चैत्रके व्याप्ति ग्रहण करनेसे और उसके भाई मैत्र-
को “पर्वतो धूमवान्” इत्याकारक व्याप्यतावच्छेदकप्रकारक पक्षधर्मता ज्ञान होनेसे
“पर्वतो वह्निमान्” इत्याकारक अनुमिति होनी चाहिये.