न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
पृष्ठ 162, कुल 350 में से
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१३८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
अव्याप्ति होगी; क्योंकि यहां हेतुतावच्छेदकीभूत स्वरूपसम्बन्धावच्छिन्न एतद्वृक्षत्व-
त्वावच्छिन्न एतद्वृक्षत्वका अधिकरण 'एतद्वृक्ष' है. एतादृश हेत्वधिकरणमें वर्तमान
जो अभाव "मूलावरछेदेन कपिसंयोगो नास्ति" इत्याकारकाभाव एतादृश अभावीय
प्रतियोगिताका अवच्छेदकही 'कपिसंयोगत्व' रूप साध्यतावच्छेदक धर्म है, अनवच्छेदक
नहीं है, याते अव्याप्ति हुई; परन्तु यदि हेत्वधिकरणवृत्त्यभाव में प्रतियोगिव्यधिकरणकी
विवक्षा करें तो दोष नहीं है; क्योंकि ऐसा कहनेसे कपिसंयोगरूप साध्याभाव
प्रतियोगिव्यधिकरण न होनेसे लक्षणघटक नहीं है, किन्तु घटाद्यभाव प्रतियोगिव्यधि-
करण होनेसे लक्षणघटक है. एवं अभावीय प्रतियोगितावच्छेदक घटत्वादि
अनवच्छेदक साध्यतावच्छेदक कपिसंयोगत्वरूप धर्म हुआ; याते अव्याप्तिरूप दोष
नहीं है.
न च प्रतियोगिव्यधिकरणत्वं यदि प्रतियोग्यनधिकरणवृत्तित्वं
तदातथैवाव्याप्तिः प्रतियोगिनः कपिसंयोगस्यानधिकरणे गुणादौ
वर्त्तते योऽभावस्तस्यैव वृक्षेऽपि मूलावच्छेदेन सत्त्वात् ! यदि तु
प्रतियोग्यधिकरणारृत्तित्वं तदा संयोगी सत्त्वादित्यादावतिव्या-
प्तिः। सत्त्वाधिकरणे गुणादौ यः संयोगाभावस्तस्य प्रतियोग्यधि-
करणद्रव्यवृत्तित्वादिति वाच्यम् ।
शंका-आपने कहा कि-'लक्षणघटक अभाव प्रतियोगिव्यधिकरण होना चाहिये'
सो इस कथनका क्या भाव है? यदि ऐसा कहो कि-लक्षणघटक अभाव सर्वदा
'अपने प्रतियोगिके अधिकरणसे भिन्नाधिकरणमें रहना चाहिये' तब तो "वृक्षः
कपिसंयोगवान् एतद्वृक्षत्वात्" इसी स्थलमें फिर अव्याप्तिरूप दोष तादवस्थ्य है;
क्योंकि यहां भी हम 'प्रतियोगि' शब्दसे कपिसंयोगरूप साध्यही ग्रहण करसकते हैं.
उसके अधिकरण वृक्षादि हैं; अनधिकरण गुणकर्मादि हैं; उन गुणकर्मादिकोंमें वर्तने-
वाला जो कपिसंयोगाभाव वही मूलावच्छेदेन वृक्षमें भी रह सकता है; क्योंकि बहुत-
विद्वान् लोग अधिकरणभेदसे अभावभेदका अंगीकार नहीं करते अर्थात् अनेक अधि-
करणोंमें एकही अभाव रहसकता है. एवं गुणकर्मवृत्ति तथा मूलावच्छेदेन वृक्षवृत्ति
कपिसंयोगाभावका प्रतियोगी कपिसंयोग है. अभावीय प्रतियोगिताका अवच्छेदक
कपिसंयोगत्व होगा. एवं अनवच्छेदक साध्यतावच्छेदक कपिसंयोगत्वरूप धर्मके न
होनेसे अव्याप्ति हुई और यदि एतद्दोषवारणार्थ 'प्रतियोगिव्यधिकरण' इस
अंशका 'प्रतियोग्यधिकरणावृत्तित्व' अर्थ कहो अर्थात् हेत्वधिकरणवृत्त्यभाव स्वप्रति-