न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
पृष्ठ 151, कुल 350 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १२७
आपके मतमें “वह्निव्याप्यो धूमः” तथा “आलोकवान् पर्वतः” इत्याकारक
ज्ञानद्वयसेभी अनुमितिज्ञान होना चाहिये; क्योंकि आपकी पूर्व कही रीतिसे व्याप्ति-
प्रकारक ज्ञान तथा पक्षधर्मता ज्ञान कारणरूपेण विद्यमान है; परन्तु ऐसे स्थलमें
अनुमितिका होना अनुभवसिद्ध नहीं. मीमांसक-आपके मतमेंभी पूर्वोक्त ज्ञान-
द्वयसे अनुमिति क्यों नहीं होती ? नैयायिक-हमारे मतमें तो व्याप्तिप्रकारतानि-
रूपित हेतुप्रकारता निरूपित जो पक्षनिष्ठ विशेष्यताशालि ज्ञान तादृश ज्ञानत्वेन
ज्ञानको अनुमितिज्ञानके प्रति हेतुता विवक्षित है, इसलिये “ वह्निव्याप्यो धूमः,
आलोकवान् पर्वतः” इत्याकारक ज्ञानसे अथवा “धूमो वह्निव्याप्यः, धूमवान् पर्वतः”
इत्याकारक ज्ञानसे अनुमितिकी आपत्ति नहीं होसकती; क्योंकि इन दोनों स्थलोंमें
व्याप्तिप्रकारतानिरूपित धूमनिष्ठ विशेष्यताका पर्वतविशेष्यतानिरूपित प्रकारतारूपेण
भान नहीं है; इसलिये जिस स्थलमें ज्ञानद्वय है वहांभी परामर्शात्मक विशिष्ट
ज्ञानकी कल्पना अवश्य करनी चाहिये. फलमुखगौरव दोषके वास्ते नहीं होता
अर्थात् कार्यकारणभावग्रहरूप फलके ( मुख ) अधीन होनेवाला गौरवज्ञान दोष-
कर नहीं है.
व्याप्यो नाम व्याप्त्याश्रयः, तत्र का व्याप्तिरित्यत आह,
व्याप्तिरिति-
भाषा-व्याप्य पक्ष उभयवैशिष्ट्यावगाहि परामर्शात्मक ज्ञान स्वसिद्धिमें व्याप्ति
ज्ञानकी अपेक्षा करता है, इसलिये 'प्रकृतसिद्धयर्थचिन्तन'रूपउपोद्घातसङ्गतिसे परामर्श
के अनन्तर व्याप्तिस्वरूप निरूपणार्थ टीकाकार कहते हैं कि-‘व्याप्य’ नाम व्याप्तिके
आश्रयका है परन्तु व्याप्य घटकीभूत व्याप्ति कैसी है, इसपर मूलकार कहता है-
व्याप्तिः साध्यवदन्यस्मिन्नसम्बन्ध उदाहृतः ॥ ६८ ॥
भाषा-साध्यवालेसे भिन्नाधिकरणमें हेतुका सम्बन्ध न होनाही हेतुनिष्ठ व्याप्ति
है अर्थात् व्याप्तिविशिष्ट हेतुका साध्यवद् भेदाधिकरणमें नियमसे वृत्तित्वाभाव
होना चाहिये ॥ ६८ ॥
साध्यवदन्येति । वह्निमान् धूमादित्यादौ साध्यो वह्निः
साध्यवान्महानसादिस्तदन्यो जलह्रदादिस्तदवृत्तित्वं धूमस्ये-
ति लक्षणसमन्वयः । १ ।
भाषा-“वह्निमान् धूमात्” इत्यादिस्थलमें साध्य वह्नि है, साध्यवाले महानसादि
हैं; साध्यवालोंसे भिन्नाधिकरण जल हृदआदि हैं; उनसे अवृत्तित्वधूमरूप हेतुमें है
इसलिये यह व्याप्तिका लक्षण संगत है १ ।