न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
धूमवान् वह्नेरित्यादौ साध्यवदन्यस्मिन्नयःपिण्डादौ वह्नेः सत्त्वा-
न्नातिव्याप्तिः । २ ।
भाषा-और 'धूमवान् वह्नेः' इत्यादि असद्धेतुओंमें यह लक्षण अतिव्याप्तिग्र-
स्तभी नहीं है, क्योंकि ऐसे स्थलमें साध्य धूम है, साध्यवाले महानसादि हैं, उनसे
भिन्नाधिकरण तप्तलोहपिण्डादिकोंमें वह्निरूप हेतुको वृत्तित्वही है किंतु अवृत्तित्व
नहीं इसलिये दोष नहीं २ ।
अत्र येन सम्बन्धेन साध्यं तेनैव सम्बन्धेन साध्यवान् बोध्यः ।
अन्यथा समवायसम्बन्धेन वह्निमान् वह्नेरवयवस्तदन्यो महान-
सादिस्तत्र धूमस्य विद्यमानत्वादव्याप्तिप्रसङ्गात् । ३ ।
भाषा-यहां लक्षणमें जिस सम्बन्धसे साध्यकी विवक्षा की होय उसी सम्बन्धसे
साध्यवालेकोभी जानना उचित है. ( अन्यथा ) जिस किसी एक सम्बन्धसे साध्यव-
त्त्वकी विवक्षा करेंगे तो पूर्वोक्त लक्षणकी 'वह्निमान् धूमात्' इसी स्थलमें अव्याप्ति
होगी; क्योंकि समवायसम्बन्धसे वह्निरूप साध्यवाले वह्निके अवयव हैं; उन अवय-
वोंसे भिन्नाधिकरण पर्वत महानसादि हैं; उन अधिकरणोंमें धूमरूप हेतुको वृत्तित्वही है,
वृत्तित्वाभाव नहीं याते लक्षणमें अव्याप्तिरूप दोष हुआ परन्तु साध्य साध्यवान्
दोनोंमें यदि एकही संयोगसम्बन्धकी विवक्षा होय तो पूर्वोक्त रीतिसे लक्षण सङ्गत
है. एवं लक्षणका स्वरूप ऐसा हुआ कि ( साध्यतावच्छेदकसम्बन्धावच्छिन्न ) जो
साध्यवत् तादृश ( साध्यवत् प्रतियोगिताक ) जो भेद तादृश ( भेदाधिकरणनिरूपित
वृत्तित्वाभाव ) ही हेतुनिष्ठ व्याप्ति है ३ ।
साध्यवदन्यश्च साध्यवत्त्वावच्छिन्नप्रतियोगिताकभेदवान् बो-
ध्यः । तेन यत्किञ्चिद्वह्निमान् महानसादिस्तद्भिन्ने पर्वतादौ
धूमस्य सत्त्वेऽपि न क्षतिः । ४ ।
भाषा-साध्यवदन्य शब्दसेभी यावत्साध्यवालोंमें रहनेवाला जो 'साध्यवत्त्व'
रूप धर्म तद्धर्मावच्छिन्न प्रतियोगिताक भेदवाले जानने चाहिये. ( अन्यथा ) यदि
साध्यवत्त्वधर्मसे यावत् साध्याधिकरणका ग्रहण नहीं करें तो "वह्निमान् धूमात् "
इसी स्थलमें फिर अव्याप्ति होगी; क्योंकि 'यत् किञ्चित्' शब्दसे कोई एक वह्निका
अधिकरण पर्वत या महानसादि हैं; उनसे भिन्न दूसरे पर्वत गोष्ठादि हैं; उनमें धूम-
१ यदि संस्कृतमात्र लक्षण याद करना होय तो केवल इन कोष्ठोंके भीतरके हिस्सोंको
आपसमें मिलाय कर बांचो.