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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. १०९
विशेषणता' सम्बन्धसे ग्रहण होता है; ऐसेही घटादिके अभावमें गो पटादिका अभाव
उसका संयुक्त 'विशेषण विशेषणता' सम्बन्धसे प्रत्यक्ष होता है.
एवमन्यदप्यूह्यम् । तथापि विशेषणतात्वरूपेणैकैव सा गण्यते,
अन्यथा षोढा सन्निकर्ष इति प्राचां प्रवादो व्याहन्येतेति ।
भाषा-इसी तरह अभावप्रत्यक्षमें स्थलानुसार और सम्बन्धोंकीभी कल्पना कर-
लेनी. इसरीतिसे विशेषणता यद्यपि अनेकप्रकारकी है तथापि विशेषणतात्वरूपधर्मसे
वह विशेषणता एकही है. ( अन्यथा ) यदि विशेषणता अधिक मानलीजाय तो
“सन्निकर्ष छःही प्रकारका है”यह कथन प्राचीन आचार्योंका असंगत होगा-इति ।
यदि स्यादुपलभ्येतेत्येवं यत्र प्रसज्यते ॥ ६२ ॥
भाषा-यदि यहां वस्तु होय तो उसका उपलाभ होना चाहिये. इस रीतिसे जहां
प्रसक्ति होसकती है वहां अभावका प्रत्यक्ष विशेषणतासम्बन्धसे होता है ॥ ६२ ॥
यदि स्यादुपलभ्येतेति । अभावप्रत्यक्षे योग्यानुपलब्धिः कार-
णम् । तथाहि । भूतलादौ घटादिज्ञाने जाते घटाभावादिकं न
ज्ञायते, तेनाभावोपलम्भे प्रतियोग्युपलम्भाभावः कारणम् । तत्र
योग्यताऽप्यपेक्षिता ।
भाषा--यहां अभावके साक्षात्कारमें योग्यानुपलब्धिको कारणता है; वही दिखला-
तेहैं कि-भूतलादि अधिकरणोंमें घटादिकोंके भ्रम होनेसे घटादिकोंके अभावका
ज्ञान नहीं होता; इसलिये अभावमात्रकी उपलब्धिमें तत्तत्प्रतियोग्युपलम्भाभावको
कारणता अवश्य माननी चाहिये. ( तत्र ) उस प्रतियोग्युपलम्भाभावमें योग्यताभी
अपेक्षित है.
सा च प्रतियोगिसत्त्वप्रसअनप्रसञ्जितप्रतियोगिकत्वरूपा । तद-
र्थश्च प्रतियोगिनो घटादेः सत्त्वप्रसक्त्या प्रसञ्जित उपलम्भरूपः
प्रतियोगी यस्य स उपलम्भाभावोऽभादप्रत्यक्षे हेतुः ।
भाषा-वह योग्यता प्रतियोगिके सत्त्वापादनसे आपादित प्रतियोगिकत्वरूपा है,
अर्थात् घटादि प्रतियोगियोंकी प्रसक्तिद्वारा जिसके प्रतियोगिका उपलम्भरूपसे
आपादन होसके वह उपलम्भाभाव अभावप्रत्यक्षमें हेतु है. [ तात्पर्य यह कि-प्रतियो-
गिके उपलम्भके आरोपका जहां सम्भव होसके वहां तत्प्रतियोगिक अभावका
प्रत्यक्ष होताहै, अन्यथा नहीं. ऐसा कहनेसे जलीय परमाणुओंमें पृथिवीत्वाभावके

११० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
प्रत्यक्षकी प्रसक्तिभी वारण हुई; क्योंकि वहां प्रतियोग्युपलम्भके आरोपका सम्भव
नहीं है. आरोपका प्रकार यह है कि "जलीयपरमाणुषु यदि पृथिवीत्वं स्यात् तर्ह्युप-
लभ्येत" इसरीतिसे पृथिवीत्वके आरोपसे पृथिवीत्वके उपलम्भकों आरोप जलपर-
माणुओंमें होसकता नहीं क्योंकि आश्रयप्रत्यक्ष प्रयुक्तजातिका प्रत्यक्ष होताहै; यह
नियमहै. इसलिये जैसे जलीय परमाणुमें जलत्वजातिका प्रत्यक्ष नहीं होता वैसेही
आरोपित पृथिवीत्वके उपलम्भके आरोपकाभी सम्भव नहीं है. इसलिये जलीय
परमाणुओंमें पृथिवीत्वाभाव नहीं है. ] इससे यही सिद्ध हुआ कि-जिस अधिकरणमें
जिस अभावके प्रतियोगिके आरोपसे उपलम्भका आरोप होसके उस अधिकरणमें
वह अभाव प्रत्यक्ष होताहै.
तथाहि। यत्रालोकसंयोगादिकं वर्तते तत्र यद्यत्र घटः स्यात्तर्हि
उपलभ्येतेत्यापादयितुं शक्यते तत्र घटाभावादिप्रत्यक्षं भवति,
अन्धकारे तु नापादयितुं शक्यत इति न घटाभावादेरन्धकारे चा-
क्षुषं प्रत्यक्षम्, स्पार्शनप्रत्यक्षं तु भवत्येव, आलोकसंयोगं वि-
नापि स्पार्शनप्रत्यक्षस्यापादयितुं शक्यत्वात् ।
भाषा-(तथाहि)वही दिखलातेहैं कि-जहां आरोपित विषय स्थलमें प्रकाशसंयो-
गादि सामग्री विद्यमान होय वहां "यदि अत्र घटः स्यात् तर्हि उपलभ्येत" ऐसा
आपादन कर सकते हैं; ऐसे स्थलमें घटाभावादिकोंका प्रत्यक्षभी होसकताहै.
अन्धकारस्थलमें ऐसा आपादन कर नहीं सकते इसलिये अन्धकारमें घटाभावादिका
चाक्षुषसाक्षात्कार नहीं होसकता; परन्तु घटादिका (स्पार्शन ) त्वाचसाक्षात्कार
अन्धकारमेंभी होसकताहै; क्योंकि प्रकाशसंयोगसे विनाभी "यदि अत्र घटः स्यात्
तर्हि स्पर्शन उपलभ्येत" ऐसा आपादन कर सकतेंहैं.
गुरुत्वादिकं यदयोग्यं तदभावस्तु न प्रत्यक्षः, तत्र गुरुत्वादि-
प्रत्यक्षस्यापादयितुमशक्यत्वात् ।
भाषा-गुरुत्वधर्म अधर्म आदि जो सर्वथा प्रत्यक्षके अयोग्यपदार्थ हैं, उनका
अभावभी प्रत्यक्ष नहीं होता; क्योंकि "घटे यदि गुरुत्वं स्यात् तर्हि उपलभ्येत" ऐसा
आपादन यहां होय नहीं सकता; कारण यह कि-गुरुत्वधर्म सर्वथाही प्रत्यक्षके
योग्य नहीं किन्तु (तोलनी) तकड़ीके ऊपर नीचे होनेसे अनुमेय है. ऐसेही
"मयि धर्मो यदि स्यात् अधर्मो वा स्यात् तर्हि उपलभ्येत" ऐसा धर्माधर्मका
आपादनभी नहीं होसकता क्योंकि धर्माधर्म सर्वथा प्रत्यक्षके योग्य नहीं किन्तु

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. १११
सुखदुःखादिके भोगसे अनुमेय हैं; परन्तु जिस अधिकरणमें जिस अभावके प्रतियो-
गिका आपादन होसकता है उस अधिकरणमें उस अभावका प्रत्यक्ष अवश्य
होता है.
वायौ रूपाभावः, पाषाणे सौरभाभावः, गुडे तिक्ताभावः, व-
ह्नाव्नुष्णत्वाभावः, श्रोत्रे शब्दाभावः, आत्मनि सुखाभावः।
एवमादयस्तत्तदिन्द्रियैर्गृह्यन्ते तत्तत्प्रत्यक्षरस्यापादयितुं श-
क्यत्वात् ।
भाषा-जैसे ( १ ) “वायौ यदि रूपं स्यात्तर्हि चक्षुषा उपलभ्येत” ऐसा
आपादन कर सकतेहैं; क्योंकि जहां जहां महत्त्वपरिमाण विशिष्ट उद्भूतरूप है वहां२
अवश्य प्रत्यक्ष होताही है, यह वार्त्ता घटादिकोंमें प्रसिद्ध है और वायुमें स्पार्शन
प्रत्यक्ष होनेसे महत्त्वपरिमाण तो विद्यमानही है परन्तु रूप नहीं है; इसलिये रूपा-
भावका चाक्षुष प्रत्यक्ष होसकताहै. ( २ ) एवं “पाषाणे यदि सौरभं स्यात् तर्हि
उपलभ्येत” ऐसा आपादन करसकतेहैं; क्योंकि पुष्पादिकोंमें जहां जहां गन्ध है
उसका घ्राण इन्द्रियद्वारा सर्वत्र ग्रहण होताहै. पाषाणमेंभी यदि गन्ध
होता तो उसका घ्राणेन्द्रियद्वारा ग्रहण अवश्य होता; इसलिये पाषाणमें
गन्धाभावका घ्राणज प्रत्यक्ष होवैहै. ( ३ ) एवं गुड़े तिक्ताभावका रासन प्रत्यक्ष
होता है क्योंकि “गुड़े यदि तिक्तरसः स्यात् तर्हि रसनेन्द्रियेणोपलभ्येत
नास्त्यतो नैवोपलभ्यते” इस रीतिसे गुड़में तिक्तरसके आरोपसे सरनजन्य
तिक्तरसोपलम्भका आरोप होसकता है, अन्य इन्द्रियजन्य उपलम्भका आरोप हो-
सकता नहीं इसलिये रसाभावका प्रत्यक्ष रसनाइन्द्रियजन्यही होवै है अन्यथा नहीं.
( ४ ) एवं अग्निमें अनुष्णस्पर्शाभावका त्वाच प्रत्यक्ष होताहै; क्योंकि “अग्नौ यदि
अनुष्णस्पर्शः स्यात् तर्हि त्वगिन्द्रियेणोपलभ्येत” इस रीतिसे अग्निमें अनुष्ण स्पर्शके
आरोपसे त्वक्जन्य उपलम्भका आरोप होताहै; इसलिये स्पर्शाभावका प्रत्यक्ष केवल
त्वगिन्द्रियजन्य है अन्यथा नहीं. ( ५ ) एवं श्रोत्रमें शब्दाभावका श्रोत्रज प्रत्यक्ष
होताहै; क्योंकि “श्रोत्रे यदि शब्दः स्यात् तर्हि उपलभ्येत” इसरीतिसे श्रोत्रमें
शब्दके आरोपसे श्रोत्रजन्य उपलम्भका आरोप होसकताहै; इसलिये शब्दाभावका
प्रत्यक्ष केवल श्रोत्रइन्द्रिय जन्य है, अन्यथा नहीं. (६) एवं आत्मामें सुखादि अभाव
का प्रत्यक्ष मानसही होताहै क्योंकि “स्वात्मनि यदि सुखं स्यात् तर्हि मनसोपल-
भ्येत” इसरीतिसे आत्मामें सुखके आरोपसे उसके मानस उपलम्भका आरोप होस-
कताहै इसलिये सुखादिके अभावका केवल मानस प्रत्यक्ष होताहै अन्यथा नहीं. ऐसे२

११२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
औरभी अनेकों अभाव पूर्वोक्तरीतिसे तिस तिस इन्द्रियसे ग्रहण होते हैं;
क्योंकि पूर्वोक्त रीतिसे तिस तिस अभावके प्रत्यक्षका आपादन करसकतेहैं.
संसर्गाभावप्रत्यक्षे प्रतियोगिनो योग्यता । अन्योन्याभावप्रत्यक्षे
त्वाधिकरणयोग्यताऽपेक्षिता, अतः स्तम्भादौ पिशाचादिभेदो
ऽपि चक्षुषा गृह्यत एव ॥ ६२ ॥
भाषा-पूर्वोक्तरीतिसे अभाव चार प्रकारका है. उनमें तीन तो ‘संसर्गाभाव’
इस एकही नामसे ग्रहण होतेहैं और चौथे भेदका ‘अन्योन्याभाव’ शब्दसेभी ग्रहण
होताहै उनमें संसर्गाभाव वाचि प्रथम तीन अभावके प्रत्यक्षमें तो बहुलतासे प्रति
योगिकी योग्यता अपेक्षित है अर्थात् यत्प्रतियोगिक संसर्गाभावका साक्षात्कार अपे-
क्षित होय वह प्रतियोगी किसीन किसी इन्द्रियसे अवश्य प्रत्यक्षके योग्य होना
चाहिये और एवं अन्योन्याभाव प्रत्यक्षमें अधिकरणकी योग्यता अपेक्षित है.
इसीसे स्तम्भादिकोंमें पिशाचादिका भेदभी “स्तम्भः पिशाचो न” इत्यादि प्रतीति-
योंद्वारा नेत्रोंसे ग्रहण होताहै--इति ॥ ६२ ॥
एवं प्रत्यक्षं लौकिकालौकिकभेदेन द्विविधं, तत्र लौकिकप्रत्यक्षे
षोढा सन्निकर्षो वर्णितः । अलौकिकसन्निकर्षानिदानीं वदति,
अलौकिक इति-
भाषा-पूर्वोक्त प्रत्यक्षज्ञान, लौकिक, तथा अलौकिक भेदसे दो प्रकारका है. उनमें
लौकिक प्रत्यक्षमें तो छः प्रकारके सन्निकर्ष पूर्व कह चुकेहैं. अब आगे ‘अलौ-
किकस्तु’ इत्यादि ग्रन्थसे अलौकिक सन्निकर्षोंको कहते हैं-
अलौकिकस्तु व्यापारस्त्रिविधः परिकीर्तितः ।
व्यापारः संनिकर्षः ।
भाषा-अलौकिक प्रत्यक्षमें ( व्यापार ) सन्निकर्ष तीन प्रकारका कहा है.
सामान्यलक्षणो ज्ञानलक्षणो योगजस्तथा ॥ ६३ ॥
भाषा-उनमें प्रथम सामान्यलक्षणारूप है; दूसरा ज्ञानलक्षणारूप है, और तीसरा
योगजधर्मरूप है ॥ ६३ ॥
सामान्यलक्षणेति । सामान्यं लक्षणं यस्या इत्यर्थः । तत्र लक्षण-

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ११३
पदेन यदि स्वरूपमुच्यते तदा सामान्यस्वरूपा प्रत्यासत्तिरि-
त्यर्थो लभ्यते । तच्चेन्द्रियसम्बद्धविशेष्यकज्ञाने प्रकारीभूतं
बोध्यम् ।
भाषा-यहां ‘ सामान्य ’ नाम घटत्वादि जातिका है और ‘ लक्षण ’ शब्दसे
यदि स्वरूपका ग्रहण कियाजाय तो “ सामान्यं लक्षणं यस्य ” इत्याकारक बहुव्रीहि
समाससे सामान्यस्वरूपप्रत्यासत्तिरूप अर्थका लाभ होताहै. ‘प्रत्यासत्ति’ नाम सम्बन्ध-
का है. (तच्च) वह सामान्यस्वरूप सम्बन्ध इन्द्रियसम्बद्ध विशेष्यक जो “अयं घटः”
इत्याकारक ज्ञान उसमें प्रकारीभूत जानना चाहिये अर्थात् पुरोवर्ति घटमें नेत्रसंयोगके
पश्चात् ‘अयं घटः’ इत्याकारक साक्षात्कार होताहै. इस साक्षात्कारका कारणीभूत सम्बन्ध
संयोगरूप लौकिक है. यह ज्ञान घट-घटत्व दोनोंको विषय करैहै. उनमें घटकों
विशेष्यविधया तथा घटत्वको प्रकारविधया विषय करैहै; इसलिये ‘इन्द्रियसम्बद्धं
विशेष्यं यस्य तदिन्द्रियसम्बद्धविशेष्यकं ज्ञानम्’ इसमें जो प्रकारविधया भान हो
वही सामान्यसम्बन्धका स्वरूप है. ऐसे घटत्वादि हैं.
तथाहि । यतेन्द्रियसंयुक्तो धूमादिस्तद्विशेष्यकं धूम इति ज्ञानं
जातं तत्र ज्ञाने धूमत्वं प्रकारो धूमत्वेन च सन्निकर्षेण धूमः इत्येवं
रूपं सकलधूमविषयकं ज्ञानं जायते । अत्र यदिन्द्रियसम्बद्ध-
मित्येवोच्यते तदा धूलीपटले धूमत्वभ्रमानन्तरं सकलधूमविष-
यकं ज्ञानं न स्यात्, तत्र धूमत्वेन सहेन्द्रियसम्बन्धाभावात् ।
भाषा-(तथाहि) वही दिखलाते हैं कि-जहां धूमादि विशेष्य पदार्थोंके साथ ने-
त्रादि इन्द्रियोंका सम्बन्ध हुआहै वहां धूमादि विशेष्यक ‘धूमः’ इत्याकारक ज्ञान
होता है. उस ज्ञानमें धूमत्वका प्रकारविधया भान है; वह ( धूमत्व ) ही अलौकिक
सन्निकर्ष है; उस धूमत्वरूप सन्निकर्षसे ‘धूमः’ इत्याकारक सकलधूमविषयक ज्ञान
उत्पन्न होता है; क्योंकि इस ज्ञानमें प्रकार जो धूमत्व वह सभी धूमोंमें एकही है. इस
लिये पुरोवर्ति धूमज्ञानकालमें नेत्रइन्द्रियका ‘स्वजन्यज्ञानप्रकारीभूत धूमत्ववत्ता’
सम्बन्ध सकल धूमनमें होता है. इस सम्बन्धसे नेत्रइन्द्रियजन्य यावत् धूमका प्र-
त्यक्ष द्वितीयक्षणमें होता है. इस प्रत्यक्षका विषय पुरोवर्ति धूमभी होसकता है,
क्योंकि ज्ञानप्रकारीभूत धूमत्ववत्ता जैसे और धूमोंमें है वैसे पुरोवर्ति धूममेंभी है.
इसलिये पुरोवर्ति धूमादि पदार्थोंमें प्रथमक्षणमें लौकिक और द्वितीयक्षणमें अलौकिक
यह दो ज्ञान मानने उचितहैं. शंका-यहां इन्द्रियसम्बद्ध विशेष्यकज्ञानमें प्रकारीभूत
धर्मको सामान्यलक्षणप्रत्यासत्ति न मानकर लाघवसे केवल प्रकारत्वेन इनेद्रय-
८

११४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
सम्बद्धहीको प्रत्यासत्ति मानें तो क्या दोष है ? धूमचक्षुःसंयोगकालमें धूमत्वभी प्र-
कारत्वेन इन्द्रियसम्बद्ध है याते कुछ दोष नहीं. समाधान-ऐसा कहनेसे जहां
( धूलीपटल ) वायुवरोलेका धूमत्वेन ज्ञान हुआ है वहां निर्वाह नहीं होय सकेगा
क्योंकि ऐसे स्थलमें प्रकारता सम्बन्धसे इन्द्रियसम्बद्ध धूलीपटलत्व है, धूमत्व नहीं;
परन्तु ज्ञान तो यहांभी सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्तिसे सकल धूमविषयक होता
है सो धूमत्वको इन्द्रियसम्बद्ध नहीं होनेसे नहीं हुआ चाहिये.
मन्मते त्विन्द्रियसम्बद्धं धूलीपटलं, तद्विशेष्यकं धूम इति ज्ञानं
तत्र प्रकारीभूतं धूमत्वं प्रत्यासत्तिः। इन्द्रियसम्बन्धश्च लौकिको
ग्राह्यः, इदं च बहिरिन्द्रियस्थले, मानसस्थले तु ज्ञानप्रकारीभूतं
सामान्यमात्रं प्रत्यासत्तिः । अतः शब्दादिना यत्किञ्चित्पिशा-
चाद्युपस्थितौ मानसः सकलपिशाचादिबोध उपपद्यते ।
भाषा-और मेरे मतमें तो निर्वाह होसकता है; क्योंकि हमने तो लम्बायमान
इन्द्रियसम्बद्धविशेष्यक ज्ञानमें 'प्रकारीभूतधर्म' को प्रत्यासत्ति माना है. यहां इन्द्रिय
सम्बद्ध धूलीपटल है उसी धूलीपटलमें धूलीपटल विशेष्यक धूमत्व प्रकारक 'धूमः'
इत्याकारक ज्ञान हुआ है. उसमें प्रकाररूपसे भासमान धूमत्वही सामान्यलक्षणा
प्रत्यासत्ति है. पुरोवर्ति पदार्थमें इन्द्रियका सम्बन्ध लौकिक ग्रहण करना उचित है;
परन्तु यह पूर्व कथन बाह्य इन्द्रियस्थलमें है, मानस प्रत्यक्षस्थलमें तो ज्ञानप्रकारीभूत
सामान्य मात्र प्रत्यासत्ति कहनेसे निर्वाह होसकताहै.इसी प्रत्यासत्तिसे सर्वथा प्रत्यक्षा-
योग्य पिशाचादिका शाब्दज्ञान हुए पीछे "सर्वे पिशाचाः पिशाचत्ववन्तः" इत्याकारक
सकल पिशाचादिविषयक मानस बोध उत्पन्न होता है क्योंकि पूर्वोक्त रीतिसे ज्ञान
शब्दसे पिशाचादि विषयक शाब्दज्ञानभी लेसकते हैं;उसमें प्रकारीभूत जो पिशाचत्व-
रूप सामान्य वही 'मनोजन्य ज्ञानप्रकारीभूत पिशाचत्ववत्ता'सम्बन्धसे सकल पिशाच
विषयक अलौकिक ज्ञानका जनक है.
परंतु समानानां भावः सामान्यं, तच्च क्वचिन्नित्यं धूमत्वादि, क्व-
चिच्चानित्यं घटादि, यथैको घटः संयोगेन भूतले समवायेन क-
पाले वा ज्ञातस्तदनन्तरं सर्वेषामेव तद्वतां भूतलादीनां
कपालादीनां वा ज्ञानं भवति तत्रेदं बोध्यम् । परन्तु सामान्यं
येन सम्बन्धेन ज्ञायते तेन सम्बन्धेनाधिकरणानां प्रत्यासत्तिः ।

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ११५
भाषा-(परन्तु) यहां (समानानां) तुल्यपदार्थोंका (भावः) प्रकारीभूतधर्म
'सामान्य' शब्दका अर्थ है. वह किसी जगहमें नित्य है, जैसे धूमत्व घटत्व पटत्वादि;
और किसी जगहमें अनित्यभी है, जैसे घटपटादि. जिस स्थलमें एकही घटका संयोग
सम्बन्धसे भूतलमें और समवायसम्बन्धसे कपालोंमें भान हुआहै वहां (तदनन्तरं)
उस लौकिकज्ञानके पश्चात् द्वितीयक्षणमें 'सर्वाणि भूतलादीनि संयोगेन घटवंति'
एवं सर्वे कपालाः समवायेन घटवन्तः' इत्याकारक यावत् उस घटवाले संयोगसम्ब-
न्धसे भूतलादिकोंका तथा समवायसम्बन्धसे कपालोंका ज्ञान होता है. (तत्रेदं बो-
ध्यम्) वहां ऐसे स्थलमें ज्ञायमान अनित्य सामान्यही प्रत्यासत्ति जाननी उचित है;
(परन्तु) उसमेंभी इतना और अधिक जानना चाहिये कि वह सामान्य जिस स-
म्बन्धसे अपने अधिकरणमें ज्ञात हुआ है उसीही सम्बन्धसे उस सदृश
अधिकरणोंकी अलौकिक प्रत्यासत्ति होती है. अन्यथा यदि ऐसा नहीं
माने तो समवायसम्बन्धसे ज्ञान प्रकारीभूत घटत्वादि सामान्य प्रत्यासत्तिसे
कालाकाशादि पदार्थोंके ज्ञानकी आपत्तिभी अलौकिक प्रत्यासत्तिसे होसकती है.
किंतु यत्र तद्घटनाशानन्तरं तद्धटवतः स्मरणं जातं तत्र सामा-
न्यलक्षणया सर्वेषां तद्धटवतां भानं न स्यात्, सामान्यस्य त-
दानीमभावात् । किंचेन्द्रियसम्बद्धविशेष्यकं 'घटः' इति ज्ञानं
यत्र जातं तत्र परदिन इन्द्रियसम्बन्धंविनापि तादृशज्ञानप्रकारी-
भूतसामान्यस्य सत्त्वात्तादृशज्ञानं कुतो न जायते ।
भाषा-किन्तु एवंच जिस स्थलमें (तद्घट) विशेषणरूपेण दृष्ट घटके नाशके
अनन्तर उसी घटवाले स्थलका "तद्भूतलं घटवदासीत्"इत्याकारक स्मरण हुआ है
वहां सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्तिसे उसी सम्बन्धसे उस घटवाले यावत् अधिकरणोंका
बोध नहीं हुआ चाहिये; क्योंकि सामान्यरूपसे भासमान घटका उस कालमें अभाव
है. और वही अधिकरणोंके साथ ज्ञानका सम्बन्ध है; उसके न होनेसे उसके अधिकर-
णोंका ज्ञानभी स्वयंही नहीं होगा. (किञ्च) औरभी दोष है. जहां इन्द्रियसम्बद्ध
विशेष्यक 'घटः' इत्याकारक ज्ञान उत्पन्न हुआ है वहां अग्रिम दिनमें इन्द्रियसम्ब-
न्धसे विनाभी तादृश 'घटः' इत्याकारक ज्ञान प्रकारीभूत घटत्वरूप सामान्य विद्य-
मान है तादृश सामान्यलक्षणा प्रत्यसत्तिद्वारा "सर्वे घटा घटत्ववतः"इत्याकारक ज्ञान-
अग्रिम दिनमें क्यों नहीं होता?(अर्थात् ज्ञानकी सामग्री विद्यमान है तो ज्ञान अवश्य
होनाचाहिये )

११६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
तस्मात् सामान्यज्ञानं प्रत्यासत्तिर्न तु सामान्यमित्याह, आ-
सत्तिरित्यादि-
भाषा-इसलिये सामान्यप्रत्यासत्ति नहीं बन सकती; किन्तु सामान्यका ज्ञानही
प्रत्यासत्ति माननी उचित है. इसीवार्ताको मूलकार 'आसत्तिराश्रयाणां' इत्यादि
ग्रन्थसे कहतेहैं-
आसत्तिराश्रयाणां तु सामान्यज्ञानमिष्यते ।
आसत्तिः प्रत्यासत्तिरित्यर्थः ।
भाषा-घटादि अधिकरणोंकी (आसत्ति) प्रत्यासत्ति तो सामान्यविषयक ज्ञानको
मानना उचित है.
तथा च सामान्यलक्षणेत्यत्र लक्षणशब्दस्य विषयोऽर्थः । तेन
सामान्यविषयकं ज्ञानं प्रत्यासत्तिरित्यर्थो लभ्यते ॥ ६३ ॥
भाषा-(तथाच) जब ऐसे माना तो पूर्वकारिकाकथित “सामान्यलक्षणा” इस
संज्ञानिष्ठ 'लक्षण' शब्दका अर्थ 'विषय' है. पूर्वोक्त रीतिसे स्वरूप नहीं अर्थात्
“सामान्यं लक्षणं विषयो यस्य” ऐसा समास करनेसे सामान्यविषयक ज्ञानही प्रत्या-
सत्ति है. यही अर्थ लाभ होताहै ॥ ६३ ॥
ननु चक्षुःसंयोगादिकं विनाऽपि सामान्यज्ञानं यत्र वर्त्तते तत्र
सकलघटादीनां चाक्षुषादिप्रत्यक्षं स्यादत आह, तदिन्द्रियजेति-
शंका-जिस स्थलमें नेत्रसंयोगादिकसे विनाभी घटत्वादि सामान्यविषयक
ज्ञान विद्यमान है वहां सकल घटादिविषयोंका चाक्षुषप्रत्यक्ष होना चाहिये; क्योंकि
प्रत्यक्ष कारणीभूत 'सामान्यज्ञानप्रत्यासत्तिरूपा' सामग्री वहां विद्यमान है.
समाधान-ऐसे स्थलमें जिस सामग्रीकी न्यूनता है उसीको 'तदिन्द्रियज' इत्यादि
ग्रन्थसे मूलकारकहतेहैं-
तदिन्द्रियजतद्धर्मबोधसामग्र्यपेक्ष्यते ॥ ६४ ॥
भाषा-(तत) नेत्रादि इन्द्रियजन्य जो (तत) घटत्वादि धर्मिकबोध उस बोधकी
सामग्रीभी अपेक्षित है ॥ ६४ ॥
अस्यार्थः- यदा बहिरिन्द्रियेण सामान्यलक्षणया ज्ञानं जननीयं
तदा यत्किञ्चिद्धर्मिणि तत्सामान्यस्य तदिन्द्रियजन्यज्ञानसाम-

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ११७

द्यपेक्षिता,सा च सामग्री चक्षुःसंयोगालोकसंयोगादिकम्। तेना-
न्धकारादौ चक्षुरादिना तादृशं ज्ञानं न जायते ॥ ६४ ॥
भाषा-अर्थात् जिस कालमें नेत्रादि बाह्य इन्द्रियोंसे सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति-
द्वारा ज्ञान उत्पन्न होता है, उस कालमें (यत्किञ्चित् ) घटादि धर्म्मीमें ' घटत्वादि '
सामान्यविषयक नेत्रादि इन्द्रियजन्य ज्ञानकी सामग्रीभी अपेक्षित है; वह सामग्री
नेत्रसंयोग, आलोकसंयोग, उद्भूतरूप, महत्त्वपरिमाणादि यथायोग्य तिस २ इन्द्रिय-
प्रत्यक्ष स्थलमें जाननी योग्य है. ऐसा माननेसे अन्धकारादिकोंमें नेत्रादिद्वारा
घटत्वादिधर्म्मविशिष्ट धर्मीका ज्ञान नहीं होय सकता; इसलिये वहां सामान्यल-
क्षणा प्रत्यासत्तिभी नहीं बन सकती ॥ ६४ ॥
ननु ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्तिर्यदि ज्ञानरूपा सामान्यलक्षणापि
ज्ञानरूपा तदा तयोर्भेदो न स्यादत आह, विषयीति-
शंका-ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति यदि ज्ञानस्वरूपा है और सामान्यलक्षणाभी पूर्वो-
क्तरीतिसे ज्ञानस्वरूपाही है तौ फिर उन दोनोंका परस्पर भेद नहीं होना चाहिये.
समाधान--उनके भेदहीको 'विषयी यस्य' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार स्वयं
कहते हैं-
विषयी यस्य तस्यैव व्यापारो ज्ञानलक्षणः ।
व्याख्या-यस्य सौरभादेः, विषयी--ज्ञानं, तस्यैव सौरभादेः, व्यापारः सन्निकर्षः,
ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्तिर्भवतीत्यर्थः ।
भाषा--अर्थात् अलौकिक सन्निकर्षसे यद्विषयक ज्ञान हुआ है उसीके सम्बन्ध-
विशेषका नाम ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति है.
[ 'सुरभि चन्दनं ' इत्याकारक चाक्षुष ज्ञान सौरभमें चन्दनमें चन्दनत्व इन
तीनोंको विषय करताहै. उनमें चन्दन चन्दनत्वका तो यथाक्रम नेत्रसंयोग तथा नेत्रसंयु-
क्तसमवाय सम्बन्धसे लौकिकप्रत्यक्ष हो सकता है; परन्तु सौरभांशमें साक्षात्कारज-
नक लौकिकसम्बन्ध दुर्घट है; क्योंकि सौरभांश चाक्षुषज्ञानका अविषय है और
सौरभांशको विषय करनेवाले घ्राणेन्द्रियका उस कालमें सम्बन्धही
नहीं किन्तु पूर्वगृहीत सौरभका स्मरण किंवा पूर्वगृहीत सौरभके आत्मामें
संस्कारमात्रका सम्भव होसकताहै इसलिये ' सुरभिचन्दनं ' इत्याकारक ज्ञानस्थलमें
सौरभानुयोगिक नेत्रप्रतियोगिक कोई एक सम्बन्ध अवश्य कहना चाहिये. वह
सम्बन्ध साक्षात् तो बनही नहींसकता, किन्तु ' नेत्रसंयुक्त मनःसंयुक्त आत्मसमवेत

११८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
ज्ञानरूप' किंवा 'नेत्रसंयुक्त मनःसंयुक्तात्मसमवेत संस्काररूप' परम्परा सम्बन्ध
बन सकताहै. इसी परंपरासम्बन्धहीका नाम 'ज्ञानलक्षणाप्रत्यासत्ति' है. जिस कालमें
नेत्रोंका चन्दनसे संयोग होताहै उसीकालमें “एकसम्बन्धि ज्ञानमपरसम्बन्धिसमारकं”
इस न्यायसे सौरभका स्मरण किंवा पूर्वानुभवजन्य संस्कार उद्बुद्ध होय कर “सुरभि
चन्दनं” इत्याकारक चाक्षुषज्ञान होताहै; यह ज्ञान चन्दनांशमें तो लौकिक है और
सौरभांशमें पूर्वोक्तसम्बन्धसे अलौकिक है.]
सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्तिर्हि तदाश्रयस्य ज्ञानं जनयति, ज्ञानल-
क्षणा प्रत्यासत्तिस्तु यद्विषयकं ज्ञानं तस्यैव प्रत्यासत्तिरिति। अ-
त्रायमर्थः। प्रत्यक्षे सन्निकर्षं विना भानं न सम्भवति, तथाच
सामान्यलक्षणां विना धूमत्वेन सकलधूमानां वह्नित्वेन सकलव-
ह्नीनां च भानं कथं भवेत्, तदर्थं सामान्यलक्षणा स्वीक्रियते।
भाषा-सामान्यलक्षणाप्रत्यासत्तिका और ज्ञानलक्षणाप्रत्यासत्तिका परस्पर इतना
भेद है कि घटत्वादिधर्मविशिष्ट एक धर्मीका लौकिक साक्षात्कार हुए उसी धर्मके
आश्रय देशांतरीय कालान्तरीय यावत् धर्मीका ज्ञान सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्तिद्वारा
होताहै, ज्ञानलक्षणाप्रत्यासत्ति तो जिस सौरभादिका अलौकिक भान हुआ है उसीके साथ
सम्बन्धविशेषका नाम है. यहां यह अभिप्राय है कि-प्रत्यक्षयोग्य पदार्थोंकी नेत्रादि
इन्द्रियोंके सन्निकर्षसे बिना प्रतीति नहीं होसकती तो फिर सामान्यलक्षणाके न स्वी-
कार करनेसे धूमत्वेन सकल धूमोंका और वह्नित्वेन सकल वह्नियोंका
ज्ञान कैसे होगा ? इसलिये यावत् वह्नि धूमज्ञानार्थ सामान्य लक्षणका
स्वीकरण है.
नच सकलवह्निधूमभानाभावे का क्षतिरिति वाच्यम्। प्रत्य-
क्षधूमे वह्निसम्बन्धस्य गृहीतत्वादन्यधूमस्य चानुपस्थितत्वा-
द्धूमो वह्निव्याप्यो न वेति संशयानुपपत्तेः। मन्मते तु सामान्य-
लक्षणया सकलधूमोपस्थितौ कालान्तरीयदेशान्तरीयधूमे वह्नि-
व्याप्यत्वसन्देहः संभवति ।
शंका-सकलवह्नि धूमविषयक ज्ञान न होनेसे हानि क्या है? समाधान-महान-
सीय प्रत्यक्षधूममें तो वह्निके साथ 'सहवृत्तित्व' रूप सम्बन्ध नेत्रइन्द्रियसे ग्रहण
हुआ है और देशान्तर कालान्तरमें होनेवाले धूमकी किसीतरहसे उपस्थिति नहींहै;

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ११९
याते वह्निधूमादिकोंकी व्याप्ति ज्ञानसे पूर्व “धूम वह्निद्रूपित व्याप्तिका आश्रय है
या नहीं;” इत्याकारक संशय नहीं बन सकेगा और मेरे मतमें तो सामान्यलक्ष-
णासे यावत् धूमोंकी उपस्थिति हुई है. कालान्तर देशान्तरमें होनेवाले धूममें वह्नि
निरूपित व्याप्तिआश्रयत्वका सन्देह बनसकताहै.
नच सामान्यलक्षणास्वीकारे प्रमेयत्वेन सकले प्रमेये ज्ञाते सा-
र्वज्ञ्यापत्तिरिति वाच्यम् । प्रमेयत्वेन सकले प्रमेये ज्ञातेऽपि वि-
शिष्यसकलपदार्थानामज्ञातत्वेन सार्वज्ञ्याभावात् । एवं ज्ञान-
लक्षणाया अस्वीकारे सुरभि चन्दनमिति ज्ञाने सौरभस्य भानं
कथं स्यात् ।
शंका—सामान्यलक्षणा अंगीकार करनेसे प्रमेयत्वेन सकल प्रमेयका ज्ञान हुये
पुरुषको ( सर्वज्ञ ) यावत् पदार्थविषयक ज्ञानवान् होना चाहिये. समाधान-प्रमे-
यत्वेन सकल पदार्थविषयक ज्ञान हुएभी विशेषरूपसे कालान्तर देशान्तरमें होनेवाले
पदार्थोंका ज्ञान न होनेसे यह जीव सर्वज्ञ नहीं होसकता. एवं यदि ज्ञानलक्षणाप्रत्या-
सत्तिका अंगीकार न किया जाय तो “सुरभिचन्दनं” इत्याकारक ज्ञानमें सौरभांशकी
प्रतीति कैसे होगी? क्योंकि चन्दनखण्डके चाक्षुष हुएभी उपस्थित सौरभांशके साथ
नेत्रसन्निकर्ष नहीं है.
यद्यपि सामान्यलक्षणयापि सौरभभानं सम्भवति । तथापि सौ-
रभत्वस्य भानं ज्ञानलक्षणया।एवं यत्र धूमत्वेन धूलीपटलं ज्ञातं
तत्र धूलीपटलस्यानुव्यवसाये भानं ज्ञानलक्षणया ।
भाषा—यहां ‘सुरभि चन्दनम्’ इत्यादि स्थलमें यद्यपि सौरभादिका भान सौर-
भत्वादि सामान्यलक्षणाप्रत्यासत्तिसेभी होसकताहै क्योंकि सौरभत्व प्रकारक लौकिक
प्रत्यक्ष या सौरभत्वावच्छिन्नप्रकारक लौकिक प्रत्यक्ष इन दोनोंमें किसी एक सामग्रीकी
सहकारतासे सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्तिको फलजनकता अंगीकार करीहै. प्रकृतमें
यद्यपि प्रथमसामग्रीका तो अभाव है तथापि ‘सुरभि चन्दनं’ इत्याकारक ज्ञानमें
सौरभत्वावच्छिन्न प्रकारक लौकिक प्रत्यक्षरूपा द्वितीय सामग्री विद्यमान है; याते
सामान्यलक्षणासेभी सौरभका भान बनसकताहै तथापि स्वरूपसे सौरभत्वधर्मका
भान फिरभी ज्ञानलक्षणाप्रत्यासत्तिहीसे होताहै; क्योंकि उस कालमें सौरभत्वांशमें
किसी धर्मान्तरका ग्रहण है नहीं. इसलिये सामान्यलक्षणासे सौरभत्वांशका ग्रहण
मानकर निर्वाह नहीं होसकता एवं धूमत्वधर्मपुरस्कारेण धूलीपटलमें “अयं धूमः”

इत्याकारक ज्ञान हुए पश्चात् "धूममहं जानामि" इत्याकारक अनुव्यवसायमें धूलीपटलका
भान ज्ञानलक्षणाप्रत्यासत्तिसे होता है. यहां भाव यह है कि-ज्ञानविषयक ज्ञानका
नाम 'अनुव्यवसाय' है. वह सर्वत्र मानसिक होता है. तथा स्वविषयभूत ज्ञानादिको
उनके विषय सहित विषय करे है. उसमें ज्ञानादिको तो 'स्वसंयुक्तात्मसमवेतत्व' रूप
अभ्यन्तरीय लौकिक सम्बन्धसे ही विषय करे है; परन्तु ज्ञानादिके बाह्य घटादिवि-
षयोंके साथ उसका कोई लौकिकसम्बन्ध नहीं है किन्तु 'स्वसंयुक्तात्मसमवेतज्ञानवि-
षयत्व' रूप ज्ञानलक्षण नामक अलौकिक सम्बन्धही बन सकता है. उसमेंभी घटादि
सद्विषय स्थलमें तो 'आसत्तिराश्रयाणां' इत्यादि पूर्वोक्त रीतिसे घटादि अंशमें
सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्तिरूपभी हो सकता है किन्तु केवल घटत्वांशमें अवश्य
ज्ञानलक्षणाही मानना पड़ता है; परन्तु धूमत्वेन धूलीपटलादि भ्रमस्थलमें तो
उभयांशमें ज्ञानलक्षणाही सम्बन्ध है; क्योंकि वहां धूमत्व धर्म्म धूलीपटलमें
वस्तुतः नहीं है इसलिये तदाश्रयत्वेन धूलीपटलका ज्ञानभी सामान्यलक्षणाप्रत्यास-
त्तिसे नहीं हो सकता किन्तु पूर्वोक्तसम्बन्धसे ज्ञानलक्षणाहीसे हो सकता है. यहां
पूर्वोक्त उभय सम्बन्धमें 'स्व' शब्दसे मनका ग्रहण है.
योगजो द्विविधः प्रोक्तो युक्तयुञ्जानभेदतः ॥ ६५॥
भाषा-युक्त युञ्जान योगीके भेदसे योगजधर्म दो प्रकारका है॥ ६५ ॥
योगज इति । योगाभ्यासजनितो धर्मविशेषः श्रुतिपुराणादि-
प्रमाणक इत्यर्थः । युक्तेति । युक्तयुञ्जानरूपयोगिद्वैविध्याद्धर्म-
स्यापि द्वैविध्यमिति भावः ॥ ६५ ॥
भाषा-युक्त युञ्जान रूप योगीके भेदसे योगाभ्यासजनित श्रुतिपुराणादि प्रति-
पाद्य योगजधर्माविशेषभी दो प्रकारका है ॥ ६५ ॥
युक्तस्य सर्वदा भानं चिन्तासहकृतोऽपरः ।
भाषा-उनमें युक्त योगीको सर्वकालमें यावत् वस्तुका भान रहता है और युं-
जान योगीको चिंतन करनेसे तत् २ पदार्थका साक्षात्कार होता है.
युक्तस्येति।योगाभ्यासवशीकृतमानसः समाधिसमासादितविवि-
धसिद्धिर्युक्त इत्युच्यते।अयमेव विशिष्टयोगवत्त्वाद् वियुक्त इत्य-
प्युच्यते । सर्वदेति । चिन्तासहकारं विनाऽपीत्यर्थः । भानं सर्व-
विषयाणां प्रत्यक्षम् । अपरो युञ्जानो विषयव्यावृत्तमानसः ।

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. १२१
चिन्ता ध्यानं, मनसस्तदेकाग्रीकरणं, तत्सहकारात् स्थूलसूक्ष्मा-
व्यवहितविप्रकृष्टानर्थान् प्रत्यक्षीकरोतीत्यर्थः ।
इति श्रीविश्वनाथपञ्चाननभट्टाचार्यविरचितायां सिद्धान्त-
मुक्तावल्यां प्रत्यक्षखण्डम् ॥ १ ॥
भाषा-चित्तवृत्तिनिरोधरूप योगाभ्याससे मनको वशीभूत करनेवाला तथा स-
म्प्रज्ञात असम्प्रज्ञात समाधिद्वारा अणिमादि अनेक प्रकारकी सिद्धियोंके सम्पादन
करनेवाला पुरुष युक्तयोगी कहाजाता है. विशेष योगयुक्त होनेसे इसीको शास्त्रमें वि-
युक्तभी कहतेहैं.इस युक्त योगीको सर्व विषय विषयक साक्षात्कार चिंताकी सहकारता-
से विनाभी होता है और विषयासंलग्नमानस जो द्वितीय युंजानयोगी है उसको तद्
विषयाकार चित्तके एकाग्र करनेसे आकाश परमाण्वादि देशान्तरीय कालान्तरीय
यावत् पदार्थोंका साक्षात्कार होता है-इति शम् ।
इति श्रीगोविंदसिंहसाधुकृते आर्य्यभाषाविभूषितन्यायसिद्धान्त
मुक्तावलीप्रकाशे प्रत्यक्षः परिच्छेदः ॥ १ ॥

अथानुमानपरिच्छेदः २.
भाषाकारकृतमंगलाचरणम् ।
यन्नामसिंहैकसुकीर्तनेन भूयोऽन्तरायाश्च शृगालयन्ति ॥
पद्मेक्षणः पावनपादपद्मः पायात्सदा श्रीगुरुनानको नः ॥ १ ॥
अनुमिति व्युत्पादयति, व्यापारस्त्विति-
भाषा-अनुमान प्रमाण बहुवादिसम्मत है इसलिये हेतु हेतुमद्भावसङ्गतिसे प्र-
त्यक्षनिरूपणानन्तर 'व्यापारस्तु परामर्शः' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार अनुमान प्रमाणका
निरूपण करतेहैं-
व्यापारस्तु परामर्शः करणं व्याप्तिधीर्भवेत् ॥६६॥
अनुमायां -
भाषा-अनुमित्यात्मक ज्ञानमें व्याप्तिज्ञानको कारणता है और परामर्शात्मक ज्ञान
मध्यमें व्यापार है.
अनुमायामनुमितौ व्याप्तिज्ञानं करणं, परामर्शो व्यापारः।तथा-
हि । येन पुरुषेण महानसादौ धूमे वह्नेर्व्याप्तिर्गृहीता पश्चात्स
एव पुरुषः क्वचित् पर्वतादविच्छिन्नमूलां धूमलेखां पश्यति,
तदनन्तरं धूमो वह्निव्याप्य इत्येवं रूपं व्याप्तिस्मरणं तस्य भव-
ति, पश्चाच्च वह्निव्याप्यधूमवानयमिति ज्ञानं भवति स एव
परामर्श इत्युच्यते । तदनन्तरं पर्वतो वह्निमानिति ज्ञानं जायते,
तदेवानुमितिः।
भाषा-अनुमितिज्ञानके प्रति व्याप्ति ज्ञानको करणता और परामर्श व्यापार
इस रीतिसे है कि-जिस पुरुषने महानसादिस्थलोंमें “यत्र२धूमस्तत्र२ वह्निः” इत्या-
कारक 'सहचर्यनियमरूपाव्याप्ति' वह्नि निरूपित धूमहेतु विषयक अनेक वार ग्रहण
करी है. फिर पीछे दैवात् वही पुरुष किसी पर्वतादिके समीप जायकर ऊपरनीचेतक
एकरस सरल लम्बायमान धूम शिखाको देखकर पीछे महानसादिमें गृहीत व्याप्ति-
को स्मरण करता है कि "धूम वह्निनिरूपित व्याप्तिका आश्रय है” इत्याकारक व्याप्ति
स्मरणके पीछे उसी पुरुषको "वह्निनिरूपित व्याप्तिका आश्रय जो धूम उसवाला यह

परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १२३
है" इत्याकारक ज्ञान होता है. इसी ज्ञानको शास्त्रमें परामर्शात्मक ज्ञान कहते हैं,
इस ज्ञानके पीछे "पर्वतो वह्निमान्" ऐसा ज्ञान होता है यही ज्ञान अनुमितिरूप है.
अत्र प्राचीना व्याप्यत्वेन ज्ञायमानं धूमादिकं लिङ्गमनुमितिक-
रणमिति वदन्ति, तद्दूषयति, ज्ञायमानमिति-
भाषा-यहां प्राचीन नैयायिक लोग व्याप्ति आश्रयत्वेन ज्ञातहुए धूमादि हेतुओं-
को अनुमितिकी करणता कहतेहैं और लिङ्गपरामर्शको मध्यमें व्यापार मानतेहैं; उ-
सको 'ज्ञायमान' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार दूषित करतेहैं-

  • ज्ञायमानं लिङ्गं तु करणं न हि ।
    अनागतादिलिङ्गेन न स्यादनुमितिस्तदा ॥ ६७ ॥
    भाषा-ज्ञातहुआ हेतु अनुमितिका करण नहीं होसकता, यदि ऐसा होय तो अती-
    तानागत हेतुओंसे अनुमिति ज्ञान नहीं हुआ चाहिये ॥ ६७ ॥
    लिङ्गस्यानुमित्यकरणत्वे युक्तिमाह । अनागतादीति ।
    यद्यनुमितौ लिङ्गं करणं स्यात् तदाऽनागतेन विनष्टेन वा लिङ्गे-
    नानुमितिर्न स्यात्, अनुमितिकरणस्य लिङ्गस्य तदानीमभावात्-
    इति ॥ ६७ ॥
    भाषा-लिङ्गको करण न होनेमें युक्ति यह है कि-यदि अनुमितिके प्रति लिंगको
    करणता होय तो "इयं यज्ञशाला वह्निमती भविष्यति भाविधूमात्" एवं "इयं यज्ञशाल
    वह्निमत्य्यासीत् भूतधूमात्" इत्यादि अनागत तथा विनष्ट हेतुओंसे अनुमिति नहीं होनी
    चाहिये, क्योंकि अनुमिति कारणीभूत हेतु उस कालमें विद्यमान नहींहै. शंका-परा-
    मर्शरूप व्यापार सम्बन्धसे स्वातीतानागत कालमेंभी हेतु विद्यमान है याते कुछ
    दोष नहीं. समाधान-अतीतानागत लिङ्गको परामर्शकी जनकताही सिद्ध नहीं; इस
    लिये परामर्श अतीतानागत लिङ्गका व्यापार नहीं बन सकता-इति ॥ ६७ ॥
    व्याप्यस्य पक्षवृत्तित्वधीः परामर्श उच्यते ।
    भाषा-साध्यनिरूपित व्याप्तिआश्रयहेतुको पक्षवृत्तित्वावगाहनी बुद्धिका नाम 'प-
    रामर्श' है.
    व्याप्यस्येति।व्याप्तिविशिष्टस्य पक्षेण सह वैशिष्ट्यावगाहि ज्ञान-
    मनुमितिजनकम्, तच्च व्याप्यः पक्ष इति ज्ञानं पक्षो व्याप्यवा-

१२४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
निति ज्ञानं वा । अनुमितिस्तु पक्षे व्याप्य इति ज्ञानात् पक्षे सा-
ध्यमित्याकारिका, पक्षो व्याप्यवानिति ज्ञानात् पक्षः साध्यवा-
नित्याकारिका । द्विविधादपि परामर्शात् पक्षः साध्यवानित्येवा-
नुमितिरित्यन्ये ।
भाषा—साध्यनिरूपित व्याप्तिविशिष्ट हेतुका पक्षके साथ वैशिष्ट्यावगाहि ज्ञान अनु-
मितिका जनक है; उसीका नाम 'परामर्श' है. उसी परामर्शज्ञानके विशेषणविशेष्यभावके
विपर्याससे दो स्वरूप हैं; उनमें एक तो पक्षप्रकारक व्याप्तिविशिष्टविशेष्यक 'व्याप्यः
पक्षे' इत्याकारक ज्ञान है और दूसरा व्याप्तिविशिष्ट प्रकारक पक्षविशेष्यक "पक्षो
व्याप्यवान्" इत्याकारक ज्ञान है. एवं कारणीभूत परामर्शके आकारमें भेद होनेसे
अनुमितिके आकारमेंभी भेद होता है अर्थात् प्रथम परामर्शसे पक्षप्रकारक साध्य
विशेष्यक "पक्षे साध्यं" इत्याकारक अनुमिति ज्ञान होताहै और द्वितीय परामर्शसे
साध्यप्रकारक पक्षविशेष्यक "पक्षः साध्यवान्" इत्याकारक अनुमितिज्ञान होताहै और
कई एक नवीन नैयायिक ऐसा मानतेहैं कि—पूर्वोक्त पक्षविशेष्यक तथा व्याप्तिविशि-
ष्टविशेष्यक उभयविध परामर्शसे साध्यप्रकारक पक्षविशेष्यक 'पक्षः साध्यवान्' इत्या
कारक एकही अनुमिति होती है—इति। पूर्वोक्त रीतिसे लिङ्गदर्शन व्याप्तिस्मरण औ-
र परामर्श इन तीनोंज्ञानोंके पश्चात् अनुमिति ज्ञानकी उत्पत्ति मानी है. उनमें पराम-
र्श ज्ञानको अस्वीकार करता हुआ मीमांसक कहताहै.
ननु वह्निव्याप्यधूमवान् पर्वत इति ज्ञानं विनाऽपि यत्र पर्वतो
धूमवानिति प्रत्यक्षं ततो धूमो वह्निव्याप्य इति स्मरणं भवति,
तत्र ज्ञानद्वयादेवानुमितिदर्शनात्, व्याप्तिविशिष्टवैशिष्ट्यावगा-
हि ज्ञानं सर्वत्र न कारणं किंतु व्याप्यतावच्छेदकप्रकारकपक्ष-
धर्मताज्ञानत्वेनैव कारणत्वमावश्यकत्वात्, विशिष्टवैशिष्ट्य-
ज्ञानकल्पने गौरवाच्चेति चेत् । न ।
शंका—जिस स्थलमें "पर्वतो धूमवान्" इत्याकारक प्रत्यक्ष हुआ ह तथा उसके पी-
छे "धूमो वह्निनिरूपितव्याप्त्याश्रयः" इत्याकारक जहां स्मरण हुआ है वहां इन ज्ञानद्वयसे
भी अनुमितिदेखनेमें आतीहै; इसलिये "वह्निव्याप्यधूमवानयं पर्वत:' इत्याकारक विशिष्ट-
वैशिष्ट्यावगाहि ज्ञानको अनुमितित्वावच्छिन्न यावत् अनुमितिके प्रति कारण नहीं
कहसकते, किन्तु व्याप्यतावच्छेदक 'धूमत्व' प्रकारक जो "पर्वतो धूमवान्" इत्याका-

रक पक्षधर्मताज्ञान तादृश ज्ञानत्वेन कारणता उभयवादी सिद्ध नियतपूर्ववृत्ति होनेसे
अवश्य माननेयोग्य है. ऐसे स्थलमें “वह्निव्याप्यधूमवानयं पर्वतः” इत्याकारक
विशिष्टवैशिष्ट्यावगाहि तृतीयज्ञानकी कल्पना करनी उपस्थिति कृत गौरवभी
है.-इति ।
व्याप्यतावच्छेदकाज्ञानेऽपि वह्निव्याप्यवानिति ज्ञानादनुमित्यु-
त्पत्तेर्लाघवाच्च व्याप्तिप्रकारकपक्षधर्मताज्ञानत्वेनैव कारणत्वम् ।
किंच धूमवान् पर्वत इति ज्ञानादनुमित्यापत्तिः, व्याप्यताव-
च्छेदकीभूतधूमत्वप्रकारकपक्षधर्मताज्ञानस्य सत्त्वात् ।
समाधान- “ अयमालोको धूमो वा ” इत्याकारक सन्देह स्थलमें
व्याप्यतावच्छेदक प्रकार ‘ धूमत्व ’ प्रकारक निर्णय न होनेसेभी “वह्न्य-
भाववदवृत्तिमानयमालोको धूमो वा ” इत्याकारक ज्ञानसे अनुमिति उत्पन्न
होती है इसलिये व्याप्यतावच्छेदक प्रकारक पक्षधर्मताज्ञानको वहां
व्यभिचारी होनेसे हरएक स्थलमें कारण नहीं मान सकते, किन्तु ‘व्याप्यतावच्छेदक
प्रकारकत्व’ की अपेक्षासे व्याप्तिप्रकारक पक्षधर्मताज्ञानत्वेन कारणता माननेमें अ-
वच्छेदक उपस्थिति अभावप्रयुक्त लाघव है. मीमांसक-आपने अवच्छेदकका लाघव
दिखलाया परन्तु पूर्वोक्त ज्ञानद्वयसे अनुमिति मानना मध्यमें परामर्शात्मक ज्ञानको
न स्वीकार करना तो हमारे मतमें परमलाघव है. नैयायिक-किञ्च व्याप्यता-
वच्छेदकादि अनवगाहि “धूमवान् पर्वतः” इत्याकारक ज्ञानसे अनुमिति होनी-
चाहिये;क्योंकि आपके कथनानुकूल यह ज्ञानभी व्याप्यतावच्छेदकी भूतधूमत्वप्रका-
रक पक्षधर्मता ज्ञानरूपही है.
न चगृह्यमाणव्याप्यतावच्छेदकप्रकारकपक्षधर्म्मताज्ञानस्य हेतु-
त्वमिति वाच्यम् । चैत्रस्य व्याप्तिग्रहे मैत्रस्य पक्षधर्मताज्ञानाद-
नुमितिः स्यादिति ।
मीमांसक-अनुमितिज्ञानके अव्यवहित पूर्व वर्तमान कालमें नेत्रादि इन्द्रियोंसे
ज्ञात हुए जो व्याप्यतावच्छेदकादि तादृश व्याप्यतावच्छेदकप्रकारक पक्षधर्मता
ज्ञानत्वेन हेतुता है इसलिये कालान्तरीय तादृश ज्ञानको लेकर दोष नहीं है. नैया-
यिक-तथापि महानसादिकोंमें चैत्रके व्याप्ति ग्रहण करनेसे और उसके भाई मैत्र-
को “पर्वतो धूमवान्” इत्याकारक व्याप्यतावच्छेदकप्रकारक पक्षधर्मता ज्ञान होनेसे
“पर्वतो वह्निमान्” इत्याकारक अनुमिति होनी चाहिये.

१२६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
यदि तु तत्पुरुषीयगृह्यमाणव्याप्यतावच्छेदकप्रकारकं तत्पुरु-
षीयपक्षधर्मताज्ञानं तत्पुरुषीयानुमितौ हेतुरित्युच्यते । तदा
ऽनन्तकार्यकारणभावः ।
मीमांसक-दूसरे पुरुषके व्याप्तिज्ञानसे तथा दूसरे पुरुषके पक्षधर्मताज्ञानसे
दूसरेको अनुमिति नहीं होय सकती इसलिये जिस पुरुषको व्याप्तिज्ञान हुआहै तथा
जिस पुरुषको व्याप्यतावच्छेदक प्रकारक पक्षधर्मताज्ञान हुआहै वह ज्ञान उसी पुरु-
षके अनुमितिज्ञानमें हेतु होसकताहै.नैयायिक-ऐसा कहनेसे आपको प्रतिपुरुषभे-
दसे अनन्त कार्यकारणभावकी कल्पना करनेमें महागौरव होगा.
मन्मते तु समवायेन व्याप्तिप्रकारकपक्षधर्मताज्ञानं समवायेना-
नुमिति जनयतीति नानन्तकार्यकारणभावः ।
मीमांसक-प्रतिपुरुषभेदसे कार्यकारणभेदकी कल्पना तो आपकेभी तुल्यही
है. नैयायिक-मेरे मतमें तो समवायसम्बन्धसे व्याप्तिप्रकारक पक्षधर्मता ज्ञान
जहां होय वहां समवायसम्बन्धसे अनुमितिज्ञानको उत्पन्न करता है. इसलिये प्रति-
पुरुषभेदसे अनन्त कार्यकारणभावरूप दोष मेरे मतमें नहीं है.
यदि तु व्याप्तिप्रकारकं ज्ञानं पक्षधर्मताज्ञानं च स्वतन्त्रं कारण-
मित्य‍ुच्यते, तदा कार्यकारणभावद्वयम्, ।
मीमांसक-हमारे मतमें “वह्निव्याप्यः” इत्याकारक व्याप्तिप्रकारक ज्ञानको
(स्वतंत्र) जुदा कारणता है और “धूमवान् पर्वतः” इत्याकारक पक्षधर्मता ज्ञानको जुदा
कारणता है; ऐसा कहनेसे तत्तत्पुरुषीयत्वके निवेशकरनेकाभी कुछ काम नहीं
क्योंकि मैत्रआत्मामें अनुमितिज्ञानके स्वतंत्र हेतुभूत व्याप्तिज्ञानका अभाव होनेसे
चैत्रके व्याप्तिज्ञानकालमें उस व्याप्तिज्ञानसे शून्य मैत्रको अनुमित्यापत्ति होही नहीं
सकती; इसलिये गौरवभी नहींहै. नैयायिक-ऐसा माननेसेभी व्याप्तिप्रकारक पक्षधर्म-
ताज्ञानत्वेन कारणता है या पक्षधर्मताविषयक व्याप्तिप्रकारक ज्ञानत्वेन कारणता है ?
इस प्रकार विशेष्य विशेषणभावके विपर्यास करनेसे कार्यकारणभावद्वय सिद्ध होगा.
वह्निव्याप्यो धूमः, आलोकवान् पर्वतः, इति ज्ञानादप्यनुमितिः
स्यादिति । इत्थं च यत्र ज्ञानद्वयं तत्रापि विशिष्टज्ञानं कल्प-
नीयं फलमुखगौरवस्यादोषत्वादिति ।
मीमांसक-इस प्रकारका कार्यकारणभावद्वय तो विनिगमनाविरहसे आपकोभी
माननाही होगा. नैयायिक-यह कार्यकारणभावद्वय तो हमभी मानतेहैं; परन्तु

परिच्छेदः २ ] भाषाटीकासमेता. १२७
आपके मतमें “वह्निव्याप्यो धूमः” तथा “आलोकवान् पर्वतः” इत्याकारक
ज्ञानद्वयसेभी अनुमितिज्ञान होना चाहिये; क्योंकि आपकी पूर्व कही रीतिसे व्याप्ति-
प्रकारक ज्ञान तथा पक्षधर्मता ज्ञान कारणरूपेण विद्यमान है; परन्तु ऐसे स्थलमें
अनुमितिका होना अनुभवसिद्ध नहीं. मीमांसक-आपके मतमेंभी पूर्वोक्त ज्ञान-
द्वयसे अनुमिति क्यों नहीं होती ? नैयायिक-हमारे मतमें तो व्याप्तिप्रकारतानि-
रूपित हेतुप्रकारता निरूपित जो पक्षनिष्ठ विशेष्यताशालि ज्ञान तादृश ज्ञानत्वेन
ज्ञानको अनुमितिज्ञानके प्रति हेतुता विवक्षित है, इसलिये “ वह्निव्याप्यो धूमः,
आलोकवान् पर्वतः” इत्याकारक ज्ञानसे अथवा “धूमो वह्निव्याप्यः, धूमवान् पर्वतः”
इत्याकारक ज्ञानसे अनुमितिकी आपत्ति नहीं होसकती; क्योंकि इन दोनों स्थलोंमें
व्याप्तिप्रकारतानिरूपित धूमनिष्ठ विशेष्यताका पर्वतविशेष्यतानिरूपित प्रकारतारूपेण
भान नहीं है; इसलिये जिस स्थलमें ज्ञानद्वय है वहांभी परामर्शात्मक विशिष्ट
ज्ञानकी कल्पना अवश्य करनी चाहिये. फलमुखगौरव दोषके वास्ते नहीं होता
अर्थात् कार्यकारणभावग्रहरूप फलके ( मुख ) अधीन होनेवाला गौरवज्ञान दोष-
कर नहीं है.
व्याप्यो नाम व्याप्त्याश्रयः, तत्र का व्याप्तिरित्यत आह,
व्याप्तिरिति-
भाषा-व्याप्य पक्ष उभयवैशिष्ट्यावगाहि परामर्शात्मक ज्ञान स्वसिद्धिमें व्याप्ति
ज्ञानकी अपेक्षा करता है, इसलिये 'प्रकृतसिद्धयर्थचिन्तन'रूपउपोद्घातसङ्गतिसे परामर्श
के अनन्तर व्याप्तिस्वरूप निरूपणार्थ टीकाकार कहते हैं कि-‘व्याप्य’ नाम व्याप्तिके
आश्रयका है परन्तु व्याप्य घटकीभूत व्याप्ति कैसी है, इसपर मूलकार कहता है-
व्याप्तिः साध्यवदन्यस्मिन्नसम्बन्ध उदाहृतः ॥ ६८ ॥
भाषा-साध्यवालेसे भिन्नाधिकरणमें हेतुका सम्बन्ध न होनाही हेतुनिष्ठ व्याप्ति
है अर्थात् व्याप्तिविशिष्ट हेतुका साध्यवद् भेदाधिकरणमें नियमसे वृत्तित्वाभाव
होना चाहिये ॥ ६८ ॥
साध्यवदन्येति । वह्निमान् धूमादित्यादौ साध्यो वह्निः
साध्यवान्महानसादिस्तदन्यो जलह्रदादिस्तदवृत्तित्वं धूमस्ये-
ति लक्षणसमन्वयः । १ ।
भाषा-“वह्निमान् धूमात्” इत्यादिस्थलमें साध्य वह्नि है, साध्यवाले महानसादि
हैं; साध्यवालोंसे भिन्नाधिकरण जल हृदआदि हैं; उनसे अवृत्तित्वधूमरूप हेतुमें है
इसलिये यह व्याप्तिका लक्षण संगत है १ ।

१२८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ अनुमान-
धूमवान् वह्नेरित्यादौ साध्यवदन्यस्मिन्नयःपिण्डादौ वह्नेः सत्त्वा-
न्नातिव्याप्तिः । २ ।
भाषा-और 'धूमवान् वह्नेः' इत्यादि असद्धेतुओंमें यह लक्षण अतिव्याप्तिग्र-
स्तभी नहीं है, क्योंकि ऐसे स्थलमें साध्य धूम है, साध्यवाले महानसादि हैं, उनसे
भिन्नाधिकरण तप्तलोहपिण्डादिकोंमें वह्निरूप हेतुको वृत्तित्वही है किंतु अवृत्तित्व
नहीं इसलिये दोष नहीं २ ।
अत्र येन सम्बन्धेन साध्यं तेनैव सम्बन्धेन साध्यवान् बोध्यः ।
अन्यथा समवायसम्बन्धेन वह्निमान् वह्नेरवयवस्तदन्यो महान-
सादिस्तत्र धूमस्य विद्यमानत्वादव्याप्तिप्रसङ्गात् । ३ ।
भाषा-यहां लक्षणमें जिस सम्बन्धसे साध्यकी विवक्षा की होय उसी सम्बन्धसे
साध्यवालेकोभी जानना उचित है. ( अन्यथा ) जिस किसी एक सम्बन्धसे साध्यव-
त्त्वकी विवक्षा करेंगे तो पूर्वोक्त लक्षणकी 'वह्निमान् धूमात्' इसी स्थलमें अव्याप्ति
होगी; क्योंकि समवायसम्बन्धसे वह्निरूप साध्यवाले वह्निके अवयव हैं; उन अवय-
वोंसे भिन्नाधिकरण पर्वत महानसादि हैं; उन अधिकरणोंमें धूमरूप हेतुको वृत्तित्वही है,
वृत्तित्वाभाव नहीं याते लक्षणमें अव्याप्तिरूप दोष हुआ परन्तु साध्य साध्यवान्
दोनोंमें यदि एकही संयोगसम्बन्धकी विवक्षा होय तो पूर्वोक्त रीतिसे लक्षण सङ्गत
है. एवं लक्षणका स्वरूप ऐसा हुआ कि ( साध्यतावच्छेदकसम्बन्धावच्छिन्न ) जो
साध्यवत् तादृश ( साध्यवत् प्रतियोगिताक ) जो भेद तादृश ( भेदाधिकरणनिरूपित
वृत्तित्वाभाव ) ही हेतुनिष्ठ व्याप्ति है ३ ।
साध्यवदन्यश्च साध्यवत्त्वावच्छिन्नप्रतियोगिताकभेदवान् बो-
ध्यः । तेन यत्किञ्चिद्वह्निमान् महानसादिस्तद्भिन्ने पर्वतादौ
धूमस्य सत्त्वेऽपि न क्षतिः । ४ ।
भाषा-साध्यवदन्य शब्दसेभी यावत्साध्यवालोंमें रहनेवाला जो 'साध्यवत्त्व'
रूप धर्म तद्धर्मावच्छिन्न प्रतियोगिताक भेदवाले जानने चाहिये. ( अन्यथा ) यदि
साध्यवत्त्वधर्मसे यावत् साध्याधिकरणका ग्रहण नहीं करें तो "वह्निमान् धूमात् "
इसी स्थलमें फिर अव्याप्ति होगी; क्योंकि 'यत् किञ्चित्' शब्दसे कोई एक वह्निका
अधिकरण पर्वत या महानसादि हैं; उनसे भिन्न दूसरे पर्वत गोष्ठादि हैं; उनमें धूम-
१ यदि संस्कृतमात्र लक्षण याद करना होय तो केवल इन कोष्ठोंके भीतरके हिस्सोंको
आपसमें मिलाय कर बांचो.