न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ११९
याते वह्निधूमादिकोंकी व्याप्ति ज्ञानसे पूर्व “धूम वह्निद्रूपित व्याप्तिका आश्रय है
या नहीं;” इत्याकारक संशय नहीं बन सकेगा और मेरे मतमें तो सामान्यलक्ष-
णासे यावत् धूमोंकी उपस्थिति हुई है. कालान्तर देशान्तरमें होनेवाले धूममें वह्नि
निरूपित व्याप्तिआश्रयत्वका सन्देह बनसकताहै.
नच सामान्यलक्षणास्वीकारे प्रमेयत्वेन सकले प्रमेये ज्ञाते सा-
र्वज्ञ्यापत्तिरिति वाच्यम् । प्रमेयत्वेन सकले प्रमेये ज्ञातेऽपि वि-
शिष्यसकलपदार्थानामज्ञातत्वेन सार्वज्ञ्याभावात् । एवं ज्ञान-
लक्षणाया अस्वीकारे सुरभि चन्दनमिति ज्ञाने सौरभस्य भानं
कथं स्यात् ।
शंका—सामान्यलक्षणा अंगीकार करनेसे प्रमेयत्वेन सकल प्रमेयका ज्ञान हुये
पुरुषको ( सर्वज्ञ ) यावत् पदार्थविषयक ज्ञानवान् होना चाहिये. समाधान-प्रमे-
यत्वेन सकल पदार्थविषयक ज्ञान हुएभी विशेषरूपसे कालान्तर देशान्तरमें होनेवाले
पदार्थोंका ज्ञान न होनेसे यह जीव सर्वज्ञ नहीं होसकता. एवं यदि ज्ञानलक्षणाप्रत्या-
सत्तिका अंगीकार न किया जाय तो “सुरभिचन्दनं” इत्याकारक ज्ञानमें सौरभांशकी
प्रतीति कैसे होगी? क्योंकि चन्दनखण्डके चाक्षुष हुएभी उपस्थित सौरभांशके साथ
नेत्रसन्निकर्ष नहीं है.
यद्यपि सामान्यलक्षणयापि सौरभभानं सम्भवति । तथापि सौ-
रभत्वस्य भानं ज्ञानलक्षणया।एवं यत्र धूमत्वेन धूलीपटलं ज्ञातं
तत्र धूलीपटलस्यानुव्यवसाये भानं ज्ञानलक्षणया ।
भाषा—यहां ‘सुरभि चन्दनम्’ इत्यादि स्थलमें यद्यपि सौरभादिका भान सौर-
भत्वादि सामान्यलक्षणाप्रत्यासत्तिसेभी होसकताहै क्योंकि सौरभत्व प्रकारक लौकिक
प्रत्यक्ष या सौरभत्वावच्छिन्नप्रकारक लौकिक प्रत्यक्ष इन दोनोंमें किसी एक सामग्रीकी
सहकारतासे सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्तिको फलजनकता अंगीकार करीहै. प्रकृतमें
यद्यपि प्रथमसामग्रीका तो अभाव है तथापि ‘सुरभि चन्दनं’ इत्याकारक ज्ञानमें
सौरभत्वावच्छिन्न प्रकारक लौकिक प्रत्यक्षरूपा द्वितीय सामग्री विद्यमान है; याते
सामान्यलक्षणासेभी सौरभका भान बनसकताहै तथापि स्वरूपसे सौरभत्वधर्मका
भान फिरभी ज्ञानलक्षणाप्रत्यासत्तिहीसे होताहै; क्योंकि उस कालमें सौरभत्वांशमें
किसी धर्मान्तरका ग्रहण है नहीं. इसलिये सामान्यलक्षणासे सौरभत्वांशका ग्रहण
मानकर निर्वाह नहीं होसकता एवं धूमत्वधर्मपुरस्कारेण धूलीपटलमें “अयं धूमः”