न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ११३
पदेन यदि स्वरूपमुच्यते तदा सामान्यस्वरूपा प्रत्यासत्तिरि-
त्यर्थो लभ्यते । तच्चेन्द्रियसम्बद्धविशेष्यकज्ञाने प्रकारीभूतं
बोध्यम् ।
भाषा-यहां ‘ सामान्य ’ नाम घटत्वादि जातिका है और ‘ लक्षण ’ शब्दसे
यदि स्वरूपका ग्रहण कियाजाय तो “ सामान्यं लक्षणं यस्य ” इत्याकारक बहुव्रीहि
समाससे सामान्यस्वरूपप्रत्यासत्तिरूप अर्थका लाभ होताहै. ‘प्रत्यासत्ति’ नाम सम्बन्ध-
का है. (तच्च) वह सामान्यस्वरूप सम्बन्ध इन्द्रियसम्बद्ध विशेष्यक जो “अयं घटः”
इत्याकारक ज्ञान उसमें प्रकारीभूत जानना चाहिये अर्थात् पुरोवर्ति घटमें नेत्रसंयोगके
पश्चात् ‘अयं घटः’ इत्याकारक साक्षात्कार होताहै. इस साक्षात्कारका कारणीभूत सम्बन्ध
संयोगरूप लौकिक है. यह ज्ञान घट-घटत्व दोनोंको विषय करैहै. उनमें घटकों
विशेष्यविधया तथा घटत्वको प्रकारविधया विषय करैहै; इसलिये ‘इन्द्रियसम्बद्धं
विशेष्यं यस्य तदिन्द्रियसम्बद्धविशेष्यकं ज्ञानम्’ इसमें जो प्रकारविधया भान हो
वही सामान्यसम्बन्धका स्वरूप है. ऐसे घटत्वादि हैं.
तथाहि । यतेन्द्रियसंयुक्तो धूमादिस्तद्विशेष्यकं धूम इति ज्ञानं
जातं तत्र ज्ञाने धूमत्वं प्रकारो धूमत्वेन च सन्निकर्षेण धूमः इत्येवं
रूपं सकलधूमविषयकं ज्ञानं जायते । अत्र यदिन्द्रियसम्बद्ध-
मित्येवोच्यते तदा धूलीपटले धूमत्वभ्रमानन्तरं सकलधूमविष-
यकं ज्ञानं न स्यात्, तत्र धूमत्वेन सहेन्द्रियसम्बन्धाभावात् ।
भाषा-(तथाहि) वही दिखलाते हैं कि-जहां धूमादि विशेष्य पदार्थोंके साथ ने-
त्रादि इन्द्रियोंका सम्बन्ध हुआहै वहां धूमादि विशेष्यक ‘धूमः’ इत्याकारक ज्ञान
होता है. उस ज्ञानमें धूमत्वका प्रकारविधया भान है; वह ( धूमत्व ) ही अलौकिक
सन्निकर्ष है; उस धूमत्वरूप सन्निकर्षसे ‘धूमः’ इत्याकारक सकलधूमविषयक ज्ञान
उत्पन्न होता है; क्योंकि इस ज्ञानमें प्रकार जो धूमत्व वह सभी धूमोंमें एकही है. इस
लिये पुरोवर्ति धूमज्ञानकालमें नेत्रइन्द्रियका ‘स्वजन्यज्ञानप्रकारीभूत धूमत्ववत्ता’
सम्बन्ध सकल धूमनमें होता है. इस सम्बन्धसे नेत्रइन्द्रियजन्य यावत् धूमका प्र-
त्यक्ष द्वितीयक्षणमें होता है. इस प्रत्यक्षका विषय पुरोवर्ति धूमभी होसकता है,
क्योंकि ज्ञानप्रकारीभूत धूमत्ववत्ता जैसे और धूमोंमें है वैसे पुरोवर्ति धूममेंभी है.
इसलिये पुरोवर्ति धूमादि पदार्थोंमें प्रथमक्षणमें लौकिक और द्वितीयक्षणमें अलौकिक
यह दो ज्ञान मानने उचितहैं. शंका-यहां इन्द्रियसम्बद्ध विशेष्यकज्ञानमें प्रकारीभूत
धर्मको सामान्यलक्षणप्रत्यासत्ति न मानकर लाघवसे केवल प्रकारत्वेन इनेद्रय-
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