न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
सम्बद्धहीको प्रत्यासत्ति मानें तो क्या दोष है ? धूमचक्षुःसंयोगकालमें धूमत्वभी प्र-
कारत्वेन इन्द्रियसम्बद्ध है याते कुछ दोष नहीं. समाधान-ऐसा कहनेसे जहां
( धूलीपटल ) वायुवरोलेका धूमत्वेन ज्ञान हुआ है वहां निर्वाह नहीं होय सकेगा
क्योंकि ऐसे स्थलमें प्रकारता सम्बन्धसे इन्द्रियसम्बद्ध धूलीपटलत्व है, धूमत्व नहीं;
परन्तु ज्ञान तो यहांभी सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्तिसे सकल धूमविषयक होता
है सो धूमत्वको इन्द्रियसम्बद्ध नहीं होनेसे नहीं हुआ चाहिये.
मन्मते त्विन्द्रियसम्बद्धं धूलीपटलं, तद्विशेष्यकं धूम इति ज्ञानं
तत्र प्रकारीभूतं धूमत्वं प्रत्यासत्तिः। इन्द्रियसम्बन्धश्च लौकिको
ग्राह्यः, इदं च बहिरिन्द्रियस्थले, मानसस्थले तु ज्ञानप्रकारीभूतं
सामान्यमात्रं प्रत्यासत्तिः । अतः शब्दादिना यत्किञ्चित्पिशा-
चाद्युपस्थितौ मानसः सकलपिशाचादिबोध उपपद्यते ।
भाषा-और मेरे मतमें तो निर्वाह होसकता है; क्योंकि हमने तो लम्बायमान
इन्द्रियसम्बद्धविशेष्यक ज्ञानमें 'प्रकारीभूतधर्म' को प्रत्यासत्ति माना है. यहां इन्द्रिय
सम्बद्ध धूलीपटल है उसी धूलीपटलमें धूलीपटल विशेष्यक धूमत्व प्रकारक 'धूमः'
इत्याकारक ज्ञान हुआ है. उसमें प्रकाररूपसे भासमान धूमत्वही सामान्यलक्षणा
प्रत्यासत्ति है. पुरोवर्ति पदार्थमें इन्द्रियका सम्बन्ध लौकिक ग्रहण करना उचित है;
परन्तु यह पूर्व कथन बाह्य इन्द्रियस्थलमें है, मानस प्रत्यक्षस्थलमें तो ज्ञानप्रकारीभूत
सामान्य मात्र प्रत्यासत्ति कहनेसे निर्वाह होसकताहै.इसी प्रत्यासत्तिसे सर्वथा प्रत्यक्षा-
योग्य पिशाचादिका शाब्दज्ञान हुए पीछे "सर्वे पिशाचाः पिशाचत्ववन्तः" इत्याकारक
सकल पिशाचादिविषयक मानस बोध उत्पन्न होता है क्योंकि पूर्वोक्त रीतिसे ज्ञान
शब्दसे पिशाचादि विषयक शाब्दज्ञानभी लेसकते हैं;उसमें प्रकारीभूत जो पिशाचत्व-
रूप सामान्य वही 'मनोजन्य ज्ञानप्रकारीभूत पिशाचत्ववत्ता'सम्बन्धसे सकल पिशाच
विषयक अलौकिक ज्ञानका जनक है.
परंतु समानानां भावः सामान्यं, तच्च क्वचिन्नित्यं धूमत्वादि, क्व-
चिच्चानित्यं घटादि, यथैको घटः संयोगेन भूतले समवायेन क-
पाले वा ज्ञातस्तदनन्तरं सर्वेषामेव तद्वतां भूतलादीनां
कपालादीनां वा ज्ञानं भवति तत्रेदं बोध्यम् । परन्तु सामान्यं
येन सम्बन्धेन ज्ञायते तेन सम्बन्धेनाधिकरणानां प्रत्यासत्तिः ।