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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 350 में से

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पृष्ठ 141

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ११७

द्यपेक्षिता,सा च सामग्री चक्षुःसंयोगालोकसंयोगादिकम्। तेना-
न्धकारादौ चक्षुरादिना तादृशं ज्ञानं न जायते ॥ ६४ ॥
भाषा-अर्थात् जिस कालमें नेत्रादि बाह्य इन्द्रियोंसे सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति-
द्वारा ज्ञान उत्पन्न होता है, उस कालमें (यत्किञ्चित् ) घटादि धर्म्मीमें ' घटत्वादि '
सामान्यविषयक नेत्रादि इन्द्रियजन्य ज्ञानकी सामग्रीभी अपेक्षित है; वह सामग्री
नेत्रसंयोग, आलोकसंयोग, उद्भूतरूप, महत्त्वपरिमाणादि यथायोग्य तिस २ इन्द्रिय-
प्रत्यक्ष स्थलमें जाननी योग्य है. ऐसा माननेसे अन्धकारादिकोंमें नेत्रादिद्वारा
घटत्वादिधर्म्मविशिष्ट धर्मीका ज्ञान नहीं होय सकता; इसलिये वहां सामान्यल-
क्षणा प्रत्यासत्तिभी नहीं बन सकती ॥ ६४ ॥
ननु ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्तिर्यदि ज्ञानरूपा सामान्यलक्षणापि
ज्ञानरूपा तदा तयोर्भेदो न स्यादत आह, विषयीति-
शंका-ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति यदि ज्ञानस्वरूपा है और सामान्यलक्षणाभी पूर्वो-
क्तरीतिसे ज्ञानस्वरूपाही है तौ फिर उन दोनोंका परस्पर भेद नहीं होना चाहिये.
समाधान--उनके भेदहीको 'विषयी यस्य' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार स्वयं
कहते हैं-
विषयी यस्य तस्यैव व्यापारो ज्ञानलक्षणः ।
व्याख्या-यस्य सौरभादेः, विषयी--ज्ञानं, तस्यैव सौरभादेः, व्यापारः सन्निकर्षः,
ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्तिर्भवतीत्यर्थः ।
भाषा--अर्थात् अलौकिक सन्निकर्षसे यद्विषयक ज्ञान हुआ है उसीके सम्बन्ध-
विशेषका नाम ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति है.
[ 'सुरभि चन्दनं ' इत्याकारक चाक्षुष ज्ञान सौरभमें चन्दनमें चन्दनत्व इन
तीनोंको विषय करताहै. उनमें चन्दन चन्दनत्वका तो यथाक्रम नेत्रसंयोग तथा नेत्रसंयु-
क्तसमवाय सम्बन्धसे लौकिकप्रत्यक्ष हो सकता है; परन्तु सौरभांशमें साक्षात्कारज-
नक लौकिकसम्बन्ध दुर्घट है; क्योंकि सौरभांश चाक्षुषज्ञानका अविषय है और
सौरभांशको विषय करनेवाले घ्राणेन्द्रियका उस कालमें सम्बन्धही
नहीं किन्तु पूर्वगृहीत सौरभका स्मरण किंवा पूर्वगृहीत सौरभके आत्मामें
संस्कारमात्रका सम्भव होसकताहै इसलिये ' सुरभिचन्दनं ' इत्याकारक ज्ञानस्थलमें
सौरभानुयोगिक नेत्रप्रतियोगिक कोई एक सम्बन्ध अवश्य कहना चाहिये. वह
सम्बन्ध साक्षात् तो बनही नहींसकता, किन्तु ' नेत्रसंयुक्त मनःसंयुक्त आत्मसमवेत