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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 350 में से

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पृष्ठ 134

११० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
प्रत्यक्षकी प्रसक्तिभी वारण हुई; क्योंकि वहां प्रतियोग्युपलम्भके आरोपका सम्भव
नहीं है. आरोपका प्रकार यह है कि "जलीयपरमाणुषु यदि पृथिवीत्वं स्यात् तर्ह्युप-
लभ्येत" इसरीतिसे पृथिवीत्वके आरोपसे पृथिवीत्वके उपलम्भकों आरोप जलपर-
माणुओंमें होसकता नहीं क्योंकि आश्रयप्रत्यक्ष प्रयुक्तजातिका प्रत्यक्ष होताहै; यह
नियमहै. इसलिये जैसे जलीय परमाणुमें जलत्वजातिका प्रत्यक्ष नहीं होता वैसेही
आरोपित पृथिवीत्वके उपलम्भके आरोपकाभी सम्भव नहीं है. इसलिये जलीय
परमाणुओंमें पृथिवीत्वाभाव नहीं है. ] इससे यही सिद्ध हुआ कि-जिस अधिकरणमें
जिस अभावके प्रतियोगिके आरोपसे उपलम्भका आरोप होसके उस अधिकरणमें
वह अभाव प्रत्यक्ष होताहै.
तथाहि। यत्रालोकसंयोगादिकं वर्तते तत्र यद्यत्र घटः स्यात्तर्हि
उपलभ्येतेत्यापादयितुं शक्यते तत्र घटाभावादिप्रत्यक्षं भवति,
अन्धकारे तु नापादयितुं शक्यत इति न घटाभावादेरन्धकारे चा-
क्षुषं प्रत्यक्षम्, स्पार्शनप्रत्यक्षं तु भवत्येव, आलोकसंयोगं वि-
नापि स्पार्शनप्रत्यक्षस्यापादयितुं शक्यत्वात् ।
भाषा-(तथाहि)वही दिखलातेहैं कि-जहां आरोपित विषय स्थलमें प्रकाशसंयो-
गादि सामग्री विद्यमान होय वहां "यदि अत्र घटः स्यात् तर्हि उपलभ्येत" ऐसा
आपादन कर सकते हैं; ऐसे स्थलमें घटाभावादिकोंका प्रत्यक्षभी होसकताहै.
अन्धकारस्थलमें ऐसा आपादन कर नहीं सकते इसलिये अन्धकारमें घटाभावादिका
चाक्षुषसाक्षात्कार नहीं होसकता; परन्तु घटादिका (स्पार्शन ) त्वाचसाक्षात्कार
अन्धकारमेंभी होसकताहै; क्योंकि प्रकाशसंयोगसे विनाभी "यदि अत्र घटः स्यात्
तर्हि स्पर्शन उपलभ्येत" ऐसा आपादन कर सकतेंहैं.
गुरुत्वादिकं यदयोग्यं तदभावस्तु न प्रत्यक्षः, तत्र गुरुत्वादि-
प्रत्यक्षस्यापादयितुमशक्यत्वात् ।
भाषा-गुरुत्वधर्म अधर्म आदि जो सर्वथा प्रत्यक्षके अयोग्यपदार्थ हैं, उनका
अभावभी प्रत्यक्ष नहीं होता; क्योंकि "घटे यदि गुरुत्वं स्यात् तर्हि उपलभ्येत" ऐसा
आपादन यहां होय नहीं सकता; कारण यह कि-गुरुत्वधर्म सर्वथाही प्रत्यक्षके
योग्य नहीं किन्तु (तोलनी) तकड़ीके ऊपर नीचे होनेसे अनुमेय है. ऐसेही
"मयि धर्मो यदि स्यात् अधर्मो वा स्यात् तर्हि उपलभ्येत" ऐसा धर्माधर्मका
आपादनभी नहीं होसकता क्योंकि धर्माधर्म सर्वथा प्रत्यक्षके योग्य नहीं किन्तु