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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 350 में से

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पृष्ठ 144

इत्याकारक ज्ञान हुए पश्चात् "धूममहं जानामि" इत्याकारक अनुव्यवसायमें धूलीपटलका
भान ज्ञानलक्षणाप्रत्यासत्तिसे होता है. यहां भाव यह है कि-ज्ञानविषयक ज्ञानका
नाम 'अनुव्यवसाय' है. वह सर्वत्र मानसिक होता है. तथा स्वविषयभूत ज्ञानादिको
उनके विषय सहित विषय करे है. उसमें ज्ञानादिको तो 'स्वसंयुक्तात्मसमवेतत्व' रूप
अभ्यन्तरीय लौकिक सम्बन्धसे ही विषय करे है; परन्तु ज्ञानादिके बाह्य घटादिवि-
षयोंके साथ उसका कोई लौकिकसम्बन्ध नहीं है किन्तु 'स्वसंयुक्तात्मसमवेतज्ञानवि-
षयत्व' रूप ज्ञानलक्षण नामक अलौकिक सम्बन्धही बन सकता है. उसमेंभी घटादि
सद्विषय स्थलमें तो 'आसत्तिराश्रयाणां' इत्यादि पूर्वोक्त रीतिसे घटादि अंशमें
सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्तिरूपभी हो सकता है किन्तु केवल घटत्वांशमें अवश्य
ज्ञानलक्षणाही मानना पड़ता है; परन्तु धूमत्वेन धूलीपटलादि भ्रमस्थलमें तो
उभयांशमें ज्ञानलक्षणाही सम्बन्ध है; क्योंकि वहां धूमत्व धर्म्म धूलीपटलमें
वस्तुतः नहीं है इसलिये तदाश्रयत्वेन धूलीपटलका ज्ञानभी सामान्यलक्षणाप्रत्यास-
त्तिसे नहीं हो सकता किन्तु पूर्वोक्तसम्बन्धसे ज्ञानलक्षणाहीसे हो सकता है. यहां
पूर्वोक्त उभय सम्बन्धमें 'स्व' शब्दसे मनका ग्रहण है.
योगजो द्विविधः प्रोक्तो युक्तयुञ्जानभेदतः ॥ ६५॥
भाषा-युक्त युञ्जान योगीके भेदसे योगजधर्म दो प्रकारका है॥ ६५ ॥
योगज इति । योगाभ्यासजनितो धर्मविशेषः श्रुतिपुराणादि-
प्रमाणक इत्यर्थः । युक्तेति । युक्तयुञ्जानरूपयोगिद्वैविध्याद्धर्म-
स्यापि द्वैविध्यमिति भावः ॥ ६५ ॥
भाषा-युक्त युञ्जान रूप योगीके भेदसे योगाभ्यासजनित श्रुतिपुराणादि प्रति-
पाद्य योगजधर्माविशेषभी दो प्रकारका है ॥ ६५ ॥
युक्तस्य सर्वदा भानं चिन्तासहकृतोऽपरः ।
भाषा-उनमें युक्त योगीको सर्वकालमें यावत् वस्तुका भान रहता है और युं-
जान योगीको चिंतन करनेसे तत् २ पदार्थका साक्षात्कार होता है.
युक्तस्येति।योगाभ्यासवशीकृतमानसः समाधिसमासादितविवि-
धसिद्धिर्युक्त इत्युच्यते।अयमेव विशिष्टयोगवत्त्वाद् वियुक्त इत्य-
प्युच्यते । सर्वदेति । चिन्तासहकारं विनाऽपीत्यर्थः । भानं सर्व-
विषयाणां प्रत्यक्षम् । अपरो युञ्जानो विषयव्यावृत्तमानसः ।