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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 142, कुल 350 में से

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पृष्ठ 142

११८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
ज्ञानरूप' किंवा 'नेत्रसंयुक्त मनःसंयुक्तात्मसमवेत संस्काररूप' परम्परा सम्बन्ध
बन सकताहै. इसी परंपरासम्बन्धहीका नाम 'ज्ञानलक्षणाप्रत्यासत्ति' है. जिस कालमें
नेत्रोंका चन्दनसे संयोग होताहै उसीकालमें “एकसम्बन्धि ज्ञानमपरसम्बन्धिसमारकं”
इस न्यायसे सौरभका स्मरण किंवा पूर्वानुभवजन्य संस्कार उद्बुद्ध होय कर “सुरभि
चन्दनं” इत्याकारक चाक्षुषज्ञान होताहै; यह ज्ञान चन्दनांशमें तो लौकिक है और
सौरभांशमें पूर्वोक्तसम्बन्धसे अलौकिक है.]
सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्तिर्हि तदाश्रयस्य ज्ञानं जनयति, ज्ञानल-
क्षणा प्रत्यासत्तिस्तु यद्विषयकं ज्ञानं तस्यैव प्रत्यासत्तिरिति। अ-
त्रायमर्थः। प्रत्यक्षे सन्निकर्षं विना भानं न सम्भवति, तथाच
सामान्यलक्षणां विना धूमत्वेन सकलधूमानां वह्नित्वेन सकलव-
ह्नीनां च भानं कथं भवेत्, तदर्थं सामान्यलक्षणा स्वीक्रियते।
भाषा-सामान्यलक्षणाप्रत्यासत्तिका और ज्ञानलक्षणाप्रत्यासत्तिका परस्पर इतना
भेद है कि घटत्वादिधर्मविशिष्ट एक धर्मीका लौकिक साक्षात्कार हुए उसी धर्मके
आश्रय देशांतरीय कालान्तरीय यावत् धर्मीका ज्ञान सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्तिद्वारा
होताहै, ज्ञानलक्षणाप्रत्यासत्ति तो जिस सौरभादिका अलौकिक भान हुआ है उसीके साथ
सम्बन्धविशेषका नाम है. यहां यह अभिप्राय है कि-प्रत्यक्षयोग्य पदार्थोंकी नेत्रादि
इन्द्रियोंके सन्निकर्षसे बिना प्रतीति नहीं होसकती तो फिर सामान्यलक्षणाके न स्वी-
कार करनेसे धूमत्वेन सकल धूमोंका और वह्नित्वेन सकल वह्नियोंका
ज्ञान कैसे होगा ? इसलिये यावत् वह्नि धूमज्ञानार्थ सामान्य लक्षणका
स्वीकरण है.
नच सकलवह्निधूमभानाभावे का क्षतिरिति वाच्यम्। प्रत्य-
क्षधूमे वह्निसम्बन्धस्य गृहीतत्वादन्यधूमस्य चानुपस्थितत्वा-
द्धूमो वह्निव्याप्यो न वेति संशयानुपपत्तेः। मन्मते तु सामान्य-
लक्षणया सकलधूमोपस्थितौ कालान्तरीयदेशान्तरीयधूमे वह्नि-
व्याप्यत्वसन्देहः संभवति ।
शंका-सकलवह्नि धूमविषयक ज्ञान न होनेसे हानि क्या है? समाधान-महान-
सीय प्रत्यक्षधूममें तो वह्निके साथ 'सहवृत्तित्व' रूप सम्बन्ध नेत्रइन्द्रियसे ग्रहण
हुआ है और देशान्तर कालान्तरमें होनेवाले धूमकी किसीतरहसे उपस्थिति नहींहै;