न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
तस्मात् सामान्यज्ञानं प्रत्यासत्तिर्न तु सामान्यमित्याह, आ-
सत्तिरित्यादि-
भाषा-इसलिये सामान्यप्रत्यासत्ति नहीं बन सकती; किन्तु सामान्यका ज्ञानही
प्रत्यासत्ति माननी उचित है. इसीवार्ताको मूलकार 'आसत्तिराश्रयाणां' इत्यादि
ग्रन्थसे कहतेहैं-
आसत्तिराश्रयाणां तु सामान्यज्ञानमिष्यते ।
आसत्तिः प्रत्यासत्तिरित्यर्थः ।
भाषा-घटादि अधिकरणोंकी (आसत्ति) प्रत्यासत्ति तो सामान्यविषयक ज्ञानको
मानना उचित है.
तथा च सामान्यलक्षणेत्यत्र लक्षणशब्दस्य विषयोऽर्थः । तेन
सामान्यविषयकं ज्ञानं प्रत्यासत्तिरित्यर्थो लभ्यते ॥ ६३ ॥
भाषा-(तथाच) जब ऐसे माना तो पूर्वकारिकाकथित “सामान्यलक्षणा” इस
संज्ञानिष्ठ 'लक्षण' शब्दका अर्थ 'विषय' है. पूर्वोक्त रीतिसे स्वरूप नहीं अर्थात्
“सामान्यं लक्षणं विषयो यस्य” ऐसा समास करनेसे सामान्यविषयक ज्ञानही प्रत्या-
सत्ति है. यही अर्थ लाभ होताहै ॥ ६३ ॥
ननु चक्षुःसंयोगादिकं विनाऽपि सामान्यज्ञानं यत्र वर्त्तते तत्र
सकलघटादीनां चाक्षुषादिप्रत्यक्षं स्यादत आह, तदिन्द्रियजेति-
शंका-जिस स्थलमें नेत्रसंयोगादिकसे विनाभी घटत्वादि सामान्यविषयक
ज्ञान विद्यमान है वहां सकल घटादिविषयोंका चाक्षुषप्रत्यक्ष होना चाहिये; क्योंकि
प्रत्यक्ष कारणीभूत 'सामान्यज्ञानप्रत्यासत्तिरूपा' सामग्री वहां विद्यमान है.
समाधान-ऐसे स्थलमें जिस सामग्रीकी न्यूनता है उसीको 'तदिन्द्रियज' इत्यादि
ग्रन्थसे मूलकारकहतेहैं-
तदिन्द्रियजतद्धर्मबोधसामग्र्यपेक्ष्यते ॥ ६४ ॥
भाषा-(तत) नेत्रादि इन्द्रियजन्य जो (तत) घटत्वादि धर्मिकबोध उस बोधकी
सामग्रीभी अपेक्षित है ॥ ६४ ॥
अस्यार्थः- यदा बहिरिन्द्रियेण सामान्यलक्षणया ज्ञानं जननीयं
तदा यत्किञ्चिद्धर्मिणि तत्सामान्यस्य तदिन्द्रियजन्यज्ञानसाम-