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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 133, कुल 350 में से

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पृष्ठ 133

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. १०९
विशेषणता' सम्बन्धसे ग्रहण होता है; ऐसेही घटादिके अभावमें गो पटादिका अभाव
उसका संयुक्त 'विशेषण विशेषणता' सम्बन्धसे प्रत्यक्ष होता है.
एवमन्यदप्यूह्यम् । तथापि विशेषणतात्वरूपेणैकैव सा गण्यते,
अन्यथा षोढा सन्निकर्ष इति प्राचां प्रवादो व्याहन्येतेति ।
भाषा-इसी तरह अभावप्रत्यक्षमें स्थलानुसार और सम्बन्धोंकीभी कल्पना कर-
लेनी. इसरीतिसे विशेषणता यद्यपि अनेकप्रकारकी है तथापि विशेषणतात्वरूपधर्मसे
वह विशेषणता एकही है. ( अन्यथा ) यदि विशेषणता अधिक मानलीजाय तो
“सन्निकर्ष छःही प्रकारका है”यह कथन प्राचीन आचार्योंका असंगत होगा-इति ।
यदि स्यादुपलभ्येतेत्येवं यत्र प्रसज्यते ॥ ६२ ॥
भाषा-यदि यहां वस्तु होय तो उसका उपलाभ होना चाहिये. इस रीतिसे जहां
प्रसक्ति होसकती है वहां अभावका प्रत्यक्ष विशेषणतासम्बन्धसे होता है ॥ ६२ ॥
यदि स्यादुपलभ्येतेति । अभावप्रत्यक्षे योग्यानुपलब्धिः कार-
णम् । तथाहि । भूतलादौ घटादिज्ञाने जाते घटाभावादिकं न
ज्ञायते, तेनाभावोपलम्भे प्रतियोग्युपलम्भाभावः कारणम् । तत्र
योग्यताऽप्यपेक्षिता ।
भाषा--यहां अभावके साक्षात्कारमें योग्यानुपलब्धिको कारणता है; वही दिखला-
तेहैं कि-भूतलादि अधिकरणोंमें घटादिकोंके भ्रम होनेसे घटादिकोंके अभावका
ज्ञान नहीं होता; इसलिये अभावमात्रकी उपलब्धिमें तत्तत्प्रतियोग्युपलम्भाभावको
कारणता अवश्य माननी चाहिये. ( तत्र ) उस प्रतियोग्युपलम्भाभावमें योग्यताभी
अपेक्षित है.
सा च प्रतियोगिसत्त्वप्रसअनप्रसञ्जितप्रतियोगिकत्वरूपा । तद-
र्थश्च प्रतियोगिनो घटादेः सत्त्वप्रसक्त्या प्रसञ्जित उपलम्भरूपः
प्रतियोगी यस्य स उपलम्भाभावोऽभादप्रत्यक्षे हेतुः ।
भाषा-वह योग्यता प्रतियोगिके सत्त्वापादनसे आपादित प्रतियोगिकत्वरूपा है,
अर्थात् घटादि प्रतियोगियोंकी प्रसक्तिद्वारा जिसके प्रतियोगिका उपलम्भरूपसे
आपादन होसके वह उपलम्भाभाव अभावप्रत्यक्षमें हेतु है. [ तात्पर्य यह कि-प्रतियो-
गिके उपलम्भके आरोपका जहां सम्भव होसके वहां तत्प्रतियोगिक अभावका
प्रत्यक्ष होताहै, अन्यथा नहीं. ऐसा कहनेसे जलीय परमाणुओंमें पृथिवीत्वाभावके