सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 350 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 136

११२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
औरभी अनेकों अभाव पूर्वोक्तरीतिसे तिस तिस इन्द्रियसे ग्रहण होते हैं;
क्योंकि पूर्वोक्त रीतिसे तिस तिस अभावके प्रत्यक्षका आपादन करसकतेहैं.
संसर्गाभावप्रत्यक्षे प्रतियोगिनो योग्यता । अन्योन्याभावप्रत्यक्षे
त्वाधिकरणयोग्यताऽपेक्षिता, अतः स्तम्भादौ पिशाचादिभेदो
ऽपि चक्षुषा गृह्यत एव ॥ ६२ ॥
भाषा-पूर्वोक्तरीतिसे अभाव चार प्रकारका है. उनमें तीन तो ‘संसर्गाभाव’
इस एकही नामसे ग्रहण होतेहैं और चौथे भेदका ‘अन्योन्याभाव’ शब्दसेभी ग्रहण
होताहै उनमें संसर्गाभाव वाचि प्रथम तीन अभावके प्रत्यक्षमें तो बहुलतासे प्रति
योगिकी योग्यता अपेक्षित है अर्थात् यत्प्रतियोगिक संसर्गाभावका साक्षात्कार अपे-
क्षित होय वह प्रतियोगी किसीन किसी इन्द्रियसे अवश्य प्रत्यक्षके योग्य होना
चाहिये और एवं अन्योन्याभाव प्रत्यक्षमें अधिकरणकी योग्यता अपेक्षित है.
इसीसे स्तम्भादिकोंमें पिशाचादिका भेदभी “स्तम्भः पिशाचो न” इत्यादि प्रतीति-
योंद्वारा नेत्रोंसे ग्रहण होताहै--इति ॥ ६२ ॥
एवं प्रत्यक्षं लौकिकालौकिकभेदेन द्विविधं, तत्र लौकिकप्रत्यक्षे
षोढा सन्निकर्षो वर्णितः । अलौकिकसन्निकर्षानिदानीं वदति,
अलौकिक इति-
भाषा-पूर्वोक्त प्रत्यक्षज्ञान, लौकिक, तथा अलौकिक भेदसे दो प्रकारका है. उनमें
लौकिक प्रत्यक्षमें तो छः प्रकारके सन्निकर्ष पूर्व कह चुकेहैं. अब आगे ‘अलौ-
किकस्तु’ इत्यादि ग्रन्थसे अलौकिक सन्निकर्षोंको कहते हैं-
अलौकिकस्तु व्यापारस्त्रिविधः परिकीर्तितः ।
व्यापारः संनिकर्षः ।
भाषा-अलौकिक प्रत्यक्षमें ( व्यापार ) सन्निकर्ष तीन प्रकारका कहा है.
सामान्यलक्षणो ज्ञानलक्षणो योगजस्तथा ॥ ६३ ॥
भाषा-उनमें प्रथम सामान्यलक्षणारूप है; दूसरा ज्ञानलक्षणारूप है, और तीसरा
योगजधर्मरूप है ॥ ६३ ॥
सामान्यलक्षणेति । सामान्यं लक्षणं यस्या इत्यर्थः । तत्र लक्षण-