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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 135, कुल 350 में से

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पृष्ठ 135

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. १११
सुखदुःखादिके भोगसे अनुमेय हैं; परन्तु जिस अधिकरणमें जिस अभावके प्रतियो-
गिका आपादन होसकता है उस अधिकरणमें उस अभावका प्रत्यक्ष अवश्य
होता है.
वायौ रूपाभावः, पाषाणे सौरभाभावः, गुडे तिक्ताभावः, व-
ह्नाव्नुष्णत्वाभावः, श्रोत्रे शब्दाभावः, आत्मनि सुखाभावः।
एवमादयस्तत्तदिन्द्रियैर्गृह्यन्ते तत्तत्प्रत्यक्षरस्यापादयितुं श-
क्यत्वात् ।
भाषा-जैसे ( १ ) “वायौ यदि रूपं स्यात्तर्हि चक्षुषा उपलभ्येत” ऐसा
आपादन कर सकतेहैं; क्योंकि जहां जहां महत्त्वपरिमाण विशिष्ट उद्भूतरूप है वहां२
अवश्य प्रत्यक्ष होताही है, यह वार्त्ता घटादिकोंमें प्रसिद्ध है और वायुमें स्पार्शन
प्रत्यक्ष होनेसे महत्त्वपरिमाण तो विद्यमानही है परन्तु रूप नहीं है; इसलिये रूपा-
भावका चाक्षुष प्रत्यक्ष होसकताहै. ( २ ) एवं “पाषाणे यदि सौरभं स्यात् तर्हि
उपलभ्येत” ऐसा आपादन करसकतेहैं; क्योंकि पुष्पादिकोंमें जहां जहां गन्ध है
उसका घ्राण इन्द्रियद्वारा सर्वत्र ग्रहण होताहै. पाषाणमेंभी यदि गन्ध
होता तो उसका घ्राणेन्द्रियद्वारा ग्रहण अवश्य होता; इसलिये पाषाणमें
गन्धाभावका घ्राणज प्रत्यक्ष होवैहै. ( ३ ) एवं गुड़े तिक्ताभावका रासन प्रत्यक्ष
होता है क्योंकि “गुड़े यदि तिक्तरसः स्यात् तर्हि रसनेन्द्रियेणोपलभ्येत
नास्त्यतो नैवोपलभ्यते” इस रीतिसे गुड़में तिक्तरसके आरोपसे सरनजन्य
तिक्तरसोपलम्भका आरोप होसकता है, अन्य इन्द्रियजन्य उपलम्भका आरोप हो-
सकता नहीं इसलिये रसाभावका प्रत्यक्ष रसनाइन्द्रियजन्यही होवै है अन्यथा नहीं.
( ४ ) एवं अग्निमें अनुष्णस्पर्शाभावका त्वाच प्रत्यक्ष होताहै; क्योंकि “अग्नौ यदि
अनुष्णस्पर्शः स्यात् तर्हि त्वगिन्द्रियेणोपलभ्येत” इस रीतिसे अग्निमें अनुष्ण स्पर्शके
आरोपसे त्वक्जन्य उपलम्भका आरोप होताहै; इसलिये स्पर्शाभावका प्रत्यक्ष केवल
त्वगिन्द्रियजन्य है अन्यथा नहीं. ( ५ ) एवं श्रोत्रमें शब्दाभावका श्रोत्रज प्रत्यक्ष
होताहै; क्योंकि “श्रोत्रे यदि शब्दः स्यात् तर्हि उपलभ्येत” इसरीतिसे श्रोत्रमें
शब्दके आरोपसे श्रोत्रजन्य उपलम्भका आरोप होसकताहै; इसलिये शब्दाभावका
प्रत्यक्ष केवल श्रोत्रइन्द्रिय जन्य है, अन्यथा नहीं. (६) एवं आत्मामें सुखादि अभाव
का प्रत्यक्ष मानसही होताहै क्योंकि “स्वात्मनि यदि सुखं स्यात् तर्हि मनसोपल-
भ्येत” इसरीतिसे आत्मामें सुखके आरोपसे उसके मानस उपलम्भका आरोप होस-
कताहै इसलिये सुखादिके अभावका केवल मानस प्रत्यक्ष होताहै अन्यथा नहीं. ऐसे२