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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

९८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली [ प्रत्यक्ष-

नसप्रत्यक्ष ज्ञानादि गुणोंद्वाराही होताहै.उसकालमें ज्ञानादिगुणोंके न होनेसे आत्मा-
का मानसप्रत्यक्षभी नहीं हो सकता. ऐसेही सुषुप्तिकालमें व्याप्तिज्ञानके न होनेसे
अनुमितिज्ञानभी नहीं हो सकता. सादृश्यज्ञानके न होनेसे उपमितिज्ञानभी नहीं
हो सकता, एवं सुषुप्तिकालमें पदज्ञान न होनेसे शाब्दबोधात्मक ज्ञानभी नहीं हो-
सकता.इस पूर्वोक्तरीतिसे सुषुप्तिकालमें अनुभव सामग्रीके न होनेसे अनुभव ज्ञान नहीं
होसकता. एवं सुषुप्तिकालमें संस्कारोंका उद्बोधक कोई पदार्थ नहीं है याते स्मृतिरूप
ज्ञानभी नहीं होता. समाधान-सुषुप्तिके प्रथमक्षणमें उत्पन्न हुई ( इच्छादि ) अ-
र्थात् इच्छाके आदिमें होनेवाली ज्ञान व्यक्तिका तथा उस ज्ञानके सम्बन्धसे आत्माका
साक्षात्कार होना चाहिये. शंका-सुषुप्तिके प्रथमक्षणमें ज्ञानव्यक्ति अतीन्द्रिय उत्पन्न
होती है इसलिये उसका तथा उसके सम्बन्धसे आत्माका प्रत्यक्ष नहीं होता-समा-
धान-उस ज्ञानव्यक्तिके अतीन्द्रिय माननेमें कोई प्रमाण नहीं है.
सुषुप्तिप्राक्काले निर्विकल्पकमेव जायत इत्यत्रापि प्रमाणाभावा-
त् । अथ ज्ञानमात्रे त्वङ्मनःसंयोगस्य यदि कारणत्वं तदा रास-
नचाक्षुषादिप्रत्यक्षकाले स्पार्शनप्रत्यक्षं स्यात्, विषयत्वक्संयो-
गस्य त्वङ्मनःसंयोगस्य च सत्त्वात् परस्परप्रतिबन्धादेकमपि
वा न स्यादिति ।
शंका-सुषुप्तिके पूर्वक्षणमें उत्पन्नहुआ ज्ञान नियमसे ( निर्विकल्पक ) प्रकारतादि
रहित होता है. याते उसका प्रत्यक्ष तथा उसके सम्बन्धसे आत्माका प्रत्यक्ष बन
नहीं सकता. समाधान-सुषुप्तिके प्रथम लक्षणमें ज्ञानके नियमसे ( निर्विकल्प )
प्रकारतादि शून्य उत्पन्न होनेमेंभी कोई प्रमाण नहीं है.शंका-यदि ज्ञानमात्रके प्रति
त्वचा मनका संयोग कारण है तो रसनाजन्य प्रत्यक्षकालमें तथा नेत्रादिजन्य प्रत्यक्ष
कालमें त्वाच प्रत्यक्षभी होना चाहिये; क्योंकि विषय घटादिके साथ त्वचाका
तथा त्वचाके साथ मनका संयोग विद्यमान है. समाधान-चाक्षुषादि ज्ञान जनका
सामग्री त्वचा जन्य स्पर्शन ज्ञानमें प्रतिबन्धका है इसलिये चाक्षुष ज्ञानकालमें
स्पार्शनज्ञान नहीं होता. शंका-यदि ज्ञानकी सामग्रियोंमें प्रतिबध्य प्रतिबन्धक
भावकी कल्पना की जाय तो विषयइन्द्रियसंयोग तथा इन्द्रियमनःसंयोगरूपा ज्ञान
सामग्री सर्वत्र उपस्थित है, वह सामग्री यदि ( परस्पर ) एक दूसरीकी प्रतिबन्धका
होगी तो कोई ज्ञानभी उत्पन्न नहीं होगा.

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ९९
अत्र केचित् । पूर्वोक्तयुक्त्या त्वङ्मनोयोगस्य हेतुत्वे सिद्धे
चाक्षुषादिसामग्र्याः स्पार्शनादिप्रतिबन्धकत्वमनुभवानुरोधात्
कल्प्यत इति । अन्ये तु सुषुप्त्यनुरोधाच्चर्ममनःसंयोगस्य ज्ञान-
हेतुत्वं कल्प्यम्, चाक्षुषादिप्रत्यक्षकाले च त्वङ्मनःसंयोगाभा-
वान्न स्पार्शनप्रत्यक्षमिति वदन्ति ।
समाधान-यहां कई आचार्य ऐसा कहते हैं कि-“सुषुप्तिकाले त्वचं त्यक्त्वा पुरी-
ततिवर्तमानेन मनसा ज्ञानाजननमिति” अर्थात् सुषुप्तिकालमें त्वगिन्द्रियको त्यागके
पुरीततीनामक नाडीमें वर्तमान मनसे ज्ञान उत्पन्न नहीं होता.इति।इस पूर्वोक्त युक्ति
से त्वचा मनःसंयोगको ज्ञानहेतुता सिद्ध है और एककालमें नाना ज्ञानकी उत्पत्ति
भी अनुभवसे विरुद्ध है. इसलिये अनुभवके अनुरोधसे चाक्षुषादि ज्ञानकी सामग्री
को स्पार्शन ज्ञानके प्रति प्रतिबन्धक कल्पना करसकते हैं. इस पूर्व प्रकरणमें 'त्वचा'
शब्दसे त्वगिन्द्रियका ग्रहण है. इसी स्थलमें ( अन्येतु ) पक्षधरमिश्र ऐसे कहते हैं
कि-सुषुप्तिके अनुरोधसे ( चर्म ) त्वग् इन्द्रियके गोलकके तथा मनके परस्पर संयो-
गको ज्ञान सामान्यके प्रति कारणता कल्पना करनी उचित है. ऐसे माननेसे पूर्व
दिया जो चाक्षुषादि प्रत्यक्षकालमें त्वाच प्रत्यक्ष आपत्तिरूप दोष वहभी नहीं है;
क्योंकि चाक्षुषादि प्रत्यक्षकालमें त्वग् इन्द्रियका तथा मनका संयोग नहीं है इसलिये
त्वाचप्रत्यक्षकी योग्यता नहीं है.
मनोग्राह्यं सुखं दुःखमिच्छा द्वेषो मतिः कृतिः ॥५७॥
भाषा-सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, ज्ञान तथा यत्न इन छहको मन इन्द्रिय ग्रहण
करता है ॥ ५७ ॥
मनोग्राह्यमिति।मनोजन्यप्रत्यक्षविषय इत्यर्थः।मतिर्ज्ञानं,कृतिः
प्रयत्नः। एवं सुखत्वादिकमपि मनोग्राह्यम् । एवमात्मापि मनो
ग्राह्यः, किंतु मनोमात्रस्य गोचर इत्यनेन पूर्वमुक्तत्वादत्र
नोक्तः॥ ५७ ॥
भाषा-यह सब मानस प्रत्यक्षके विषय हैं ऐसेही इन सबमें रहनेवाली ' सुख-
त्व ' आदि जातियोंकाभी मानस प्रत्यक्षही होता है. ऐसेही आत्माकाभी मानस
प्रत्यक्षही होता है "मनोमात्रस्य गोचरः५०" इस ग्रन्थसे पूर्व कहआये हैं; इसलिये
यहां नहीं कहा ॥ ५७ ॥

१०० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
ज्ञानं यन्निर्विकल्पाख्यं तदतीन्द्रियमिष्यते ।
भाषा-और जो निर्विकल्पात्मक ज्ञान है उसका किसी इन्द्रियद्वारा प्रत्यक्ष
नहीं होता.
ज्ञानं यदिति। चक्षुःसंयोगाद्यनन्तरं घट इत्याकारकं घटत्वादिवि-
शिष्टज्ञानं न सम्भवति पूर्वं विशेषणस्य घटत्वादेर्ज्ञानाभावात्,
विशिष्टबुद्धौ विशेषणज्ञानस्य कारणत्वात् । तथा च प्रथमतौ
घटघटत्वयोर्वैशिष्ट्यानवगाहि एव ज्ञानं जायते तदेव निर्विक-
ल्पकात्मकम् । तच्च न प्रत्यक्षम् ।
भाषा--उसमें प्रमाण यह है कि-नेत्रइन्द्रियके संयोगआदिके पश्चात् ही 'अयं
घटः' इत्याकारक घटत्वादि प्रकारक घटादिविशेष्यक विशिष्ट ज्ञान नहीं होता;
क्योंकि उससे पहले विशेषणीभूत घटत्वादिका ज्ञान नहीं है. और 'अयंघटः'
इत्याकारक विशिष्टबुद्धिमें ' घटत्वादि ' विशेषणज्ञानको कारणताका नियम है;
इसलिये पहले घटघटत्वादि उभयका ( वैशिष्ट्यानवगाहि ) जुदा जुदा "इमे घट-
घटत्वे" इत्याकारक ज्ञान ही होता है उसीका नाम निर्विकल्प ज्ञान है. वह निर्विकल्पकें
ज्ञान प्रत्यक्ष नहीं होता ।
तथाहि । वैशिष्ट्यानवगाहिज्ञानस्य प्रत्यक्षं न भवति घटमहं
जानामीति प्रत्ययात् । तत्रात्मनि ज्ञानं प्रकारीभूय भासते,ज्ञाने
घटस्तत्र घटत्वम् । यः प्रकारः स एव विशेषणमित्युच्यते ।
विशेषणे यद्विशेषणं तद्विशेषणतावच्छेदकमित्युच्यते । विशे-
षणतावच्छेदकप्रकारकं ज्ञानं विशिष्टवैशिष्ट्यज्ञाने कारणम् ।
भाषा-वह इसरीतिसे है कि (वैशिष्ट्यानवगाहि) 'विशेष्यता' प्रकारता, संसर्गता
को न विषय करनेवाले ज्ञानका प्रत्यक्ष नहीं होता क्योंकि ज्ञानका प्रत्यक्ष तो
“घटमहं जानामि” इत्याकारक अनुव्यवसायात्मक प्रतीतिमें होता है. इसप्रती-
तिमें आत्मामें ज्ञान विशेषणरूपसे प्रतीत होता है और ज्ञानमें घट विशेषणरूपसे
भासता है. एवं घटमें घटत्वविशेषण रूपसे भासता है. प्रकार और विशेषण ये एक
अर्थको कहनेवाले दो शब्द हैं. घटादिविशेषणोंमें जो घटत्वादि विशेषण है उन्हींको
विशेषणताके अवच्छेदक धर्मभी कहते हैं. उन घटत्वादिधर्मोंका जो विशेषणतावच्छे-
दक प्रकारकरूपसे ज्ञान वही 'घटमहं जानामि' इत्याकारक विशिष्ट वैशिष्ट्यावगाहि
ज्ञानमें कारण है.

·-परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. १०१
निर्विकल्पके च घटत्वादिकं न प्रकारः तेन घटत्वादिविशिष्टघ-
टादिवैशिष्ट्यभानं ज्ञाने न सम्भवति। घटत्वाद्यप्रकारकं च घटा-
दिविशिष्टज्ञानं न सम्भवति, जात्यखण्डोपाध्यतिरिक्तपदार्थज्ञा-
नस्य किञ्चिद्धर्मप्रकारकत्वनियमात् ।
भाषा-और निर्विकल्पकज्ञानमें घटत्वादिधर्मोंका प्रकारतारूपसे भान नहीं है
इसलिये घटत्वादि विशिष्ट जो घटादि, उन घटादिकोंका ( वैशिष्ट्य ) विशेषणरूपसे
भान निर्विकल्पक ज्ञानमें नहीं होता और घटत्वादिप्रकारकां जिसमें न भान हो
किन्तु केवल घटही प्रकाररूपसे जिसमें भान हो ऐसा घटादिविशिष्ट ज्ञान होही
नहीं सकता; क्योंकि जाति तथा अखण्ड उपाधिसे भिन्न पदार्थोंका किसी एक
धर्महीसे अवश्य भान होताहै, अन्यथा नहीं घटादि पदार्थ जाति तथा अखण्डोपा-
धिसे भिन्न हैं इसलिये उनका घटत्वादि धर्मोंद्वारा भान होताहै, केवल नहीं. अख
ण्डउपाधि नाम प्रतियोगित्व अनुयोगित्व आदि अनिर्वचनीय धर्मोंका है-इति ।
महत्त्वं षड्विधे हेतुः-
भाषा-पूर्वोक्त षड्विध प्रत्यक्षमें महत्त्वपरिमाणको कारणता है.
महत्त्वमिति । द्रव्यप्रत्यक्षे महत्त्वं समवायसम्बन्धेन कारणम् ।
द्रव्यसमवेतानां जातिगुणकर्मणां प्रत्यक्षे स्वाश्रयसमवायस-
म्बन्धेन कारणम्। द्रव्यसमवेतसमवेतानां गुणत्वकर्मत्वरूपत्वा-
दीनां प्रत्यक्षे स्वाश्रयसमवेतसमवायसम्बन्धेन कारणमिति ।
भाषा-द्रव्यके प्रत्यक्षमें महत्त्व परिमाण समवायसम्बन्धसे कारण है अर्थात्
जिस द्रव्यमें समवायसम्बन्धसे महत्त्वपरिमाण है उसीका प्रत्यक्ष होसकताहै,
अन्यका नहीं और द्रव्यमें समवायसम्बन्धसे रहनेवाले जाति गुण कर्म आदिकोंके
प्रत्यक्षमें महत्त्वपरिमाणको 'स्वाश्रयसमवाय' सम्बन्धसे कारणता है. 'स्व' शब्दसे
महत्त्वपरिमाण उसका आश्रय द्रव्य, उसमें समवायसम्बन्धसे जातिगुणादि रहतेहैं.
ऐसेही द्रव्यमें समवेत जो गुण कर्मरूपादि उन गुणकर्मरूपादिकोंमें समवेत जो
गुणत्वकर्मत्व रूपत्वादि उन गुणत्वकर्मत्व रूपत्वादिकोंके प्रत्यक्षके प्रति महत्त्वपरि-
माणको 'स्वाश्रयसमवेतरूमवाय' सम्बन्धसे कारणता है. 'स्व' शब्दसे महत्त्वपरिमाण
उसका आश्रय द्रव्य उसमें समवेत गुण कर्म रूपादि उनमे गुणत्व कर्मत्व
रूपत्वादिकोंका समवायसम्बन्ध है. एतादृश सम्बन्धसे महत्त्व परिमाणको गुणत्वादि
प्रत्यक्षके प्रति कारणता है-इति.

१०२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
-इन्द्रियं करणं मतम् ॥ ५८ ॥
भाषा-पूर्वोक्त षड्विध प्रत्यक्षमें नेत्रादिइन्द्रियोंको असाधारण कारण-
ता है ॥ ५८ ॥
इन्द्रियमिति।अत्रापि षड्विध इत्यनुषज्यते।इन्द्रियत्वं तु न जातिः
पृथिवीत्वादिना साङ्कर्यप्रसङ्गात् । किंतु शब्देतरोद्भूतविशेष-
गुणानाश्रयत्वे सति ज्ञानकारणमनःसंयोगाश्रयत्वम् । आत्मन्य-
तिव्यातिवारणाय सत्यन्तम्, उद्भूतविशेषगुणस्य शब्दस्यश्रोत्रे
सत्त्वाच्छब्देतरेति, विशेषगुणस्य रूपादेश्चक्षुषि सत्त्वादुद्भूतेति ।
उद्भूतत्वं न जातिः शुक्लत्वादिना सङ्करात् ।
भाषा-इन्द्रियोंमें इन्द्रियत्वरूप धर्मका पृथिवीत्व जलत्वादिधर्मोंके साथ संकर है
इसलिये 'इन्द्रियत्व' धर्मजातिरूप नहींहै,किन्तु सखण्डोपाधिरूप है.बहुपदार्थघटित
धर्मका नाम सखण्डोपाधि है.यह 'धर्म' शब्दसे इतर ( रूपसुखादि ) उद्भूत विशे-
षगुणके अनाश्रय तथा ज्ञानके कारणीभूत मनःसंयोगके आश्रयरूप इन्द्रियमें रहता
है यही इन्द्रियका निर्वचन है, ज्ञान कारणीभूत मनःसंयोगका आश्रय आत्माभी है
उसके वारणार्थ 'शब्देतरोद्भूत विशेषगुणानाश्रत्वे सति' कहा. आत्मा शब्देतरउद्भूत
विशेषगुण 'सुखादि' का आश्रय है,यति दोष नहीं. शब्दरूप उद्भूतविशेषगुण श्रोत्र
इन्द्रियमें है. श्रोत्र संग्रहार्थ शब्देतरउद्भूत गुणका अनाश्रय कहा, अनुद्भूतरूपादि
विशेषगुण नेत्रादि इन्द्रियोंमें विद्यमान हैं; उनके वारणार्थ उद्भूतविशेषगुण कहा
अर्थात् 'उद्भूत' पदके न देनेसे नेत्रादि इन्द्रियोंमें अव्याप्ति होगी. उद्भूतत्वरूप
धर्मका शुक्लत्वादि धर्मोंके साथ संकर है. इसलिये 'उद्भूतत्व' धर्मजातिरूप
नहीं है.
न च शुक्लत्वादिव्याप्यं नानैवोद्भूतत्वमिति वाच्यम् । उद्भूतरूप
१ संकरका प्रकार यह है कि-पृथिवीत्वरूप धर्मको छोड़कर इन्द्रियत्व धर्म नेत्रादिकोंमें
रहताहै और इन्द्रियत्वरूप धर्मको छोड़कर पृथिवीत्वरूप धर्म घटादिपृथिवीमें रहताहै. एवं पृथिवीत्व
इन्द्रियत्व उभयधर्मका एकत्र समावेश घ्राणेन्द्रियमें है-इति. ऐसेही जलत्वादि धर्मोंके साथ
संकर जानलेना.
२ संकरका प्रकार यह है कि-शुक्लत्वधर्मको छोड़कर उद्भूतत्व उद्भूतगन्धमें है एवं उद्भूतत्व
धर्मको छोड़कर शुक्लत्वधर्म अनुद्भूत शुक्लमें है एवं धर्मद्वयका समावेश उद्भूतशुक्लमें है. ऐसेही
नीलत्वादिधर्मोंके साथ जानलेना.

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. १०३
वत्त्वादिना चाक्षुषादौ जनकतानुपपत्तेः । किंतु शुक्लत्वादिव्या-
प्यमनुद्भूतत्वं नाना तदभावकूटश्चोद्भूतत्वम्, तच्च संयोगादावपि ।
तथा च शब्देतरोद्भूतगुणः संयोगादिश्चक्षुरादेरस्त्यतो विशेषे
ति । कालादिवारणाय विशेष्यदलम् ।
शंका-शुक्लत्वादि जातियोंके व्याप्यधर्म उद्भूतत्व अनेक माने तो क्या दोष है?
समाधान-यदि अनेक मानें तो चाक्षुषप्रत्यक्षमें उद्भूतरूपत्वादि धर्मोंसे जनकता
नहीं बन सकेगी क्योंकि उन उद्भूतरूपत्वादिकोंको यदि एक एक व्यक्तिको कार-
णतावच्छेदक मानें तो एक व्यक्तिके सत्त्वकालमेंभी द्वितीय ‘ उद्भूतत्व ’ व्यक्तिका
अभाव होनेसे उद्भूतरूपत्वादिकोंका चाक्षुषप्रत्यक्षके साथ कार्यकारणभावका व्यभिचार
होगा और अनेक उद्भूतत्व किसीएक व्यक्तिमेंभी नहीं रहसकते इसलिये कारणताके
अवच्छेदक नहीं होसकते; ( किन्तु ) परन्तु ऐसा कह सकते हैं कि शुक्लत्वादिधर्मोंके
व्याप्य ‘ अनुद्भूतत्व ’ धर्म अनेक हैं और उन सबके अभावका पुंजरूप एक
‘ उद्भूतत्व ’ है, वह उद्भूतत्वरूप धर्म संयोगादिगुणोंमेंभी है, एवं शब्दसे इतर उद्भूत
गुणसंयोगादिक नेत्रादि इन्द्रियोंमें विद्यमान हैं, इसलिये ‘ उद्भूतविशेषगुण ’ कहा.
संयोगादि विशेषगुण नहीं ह यांते अव्याप्तिरूप दोष नहीं है. शब्देतरउद्भूत विशेष
गुणके अनाश्रय कालादिभी हैं उनके वारणार्थ उत्तर विशेष्यदल कहाहै. कालादि
शब्देतरउद्भूतविशेषगुणके अनाश्रयहैंभी परन्तु ज्ञानकारणीभूत मनःसंयोगके आश्रय
नहींहैं यांते दोष नहीं.
इन्द्रियावयवविषयसंयोगस्यापि प्राचां मते प्रत्यक्षजनकत्वादिन्द्रि
यावयववारणाय, कालादौ रूपाभावप्रत्यक्षे सन्निकर्षघटकतया
कारणीभूतचक्षुःसंयोगाद्याश्रयस्य कालादेश्च वारणाय मनः
पदम् । ज्ञानकारणमित्यपि तद्वारणाय । करणमिति । असाधा-
रणं कारणं करणम् । असाधारणत्वं व्यापारवत्त्वम् ॥ ५८ ॥
भाषा-प्राचीन आचार्य नेत्रादिइन्द्रियके अवयवोंको तथा घटादि विषयके परस्पर
संयोगकोभी प्रत्यक्षके प्रति कारण मानतेहैं पूर्वोक्त इन्द्रियके लक्षणकी इन्द्रियके एकदेश
अवयवमें प्रसक्तिवारणार्थ ‘ मनः ’ पदका निवेश है. अथवा नवीन आचार्य कालादि-
कोंमें रूपाभावका चाक्षुष प्रत्यक्ष मानते हैं उसमें कारणीभूत चक्षुःसंयोगका आश्रय
होनेसे संबन्धका सम्पादक कालभी है । इसलिये “ काले रूपं नास्ति ” इ

१०४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
रूपाभावात्मक ज्ञानका कारण जो ‘ चक्षुःकाल संयोग ’ उसका आश्रय कालभी है
उसमें पूर्वोक्त लक्षण अतिप्रसक्त होगा. उसके वारणार्थ ‘ मनः ’ पदका निवेश है.
‘ज्ञानकारण’इस पदके न देनेसेभी पूर्वोक्त सम्पूर्ण लक्षणकी कालादिकोंमें अतिप्रसक्ति
होती है; इसलिये सार्थक है. ‘ करणमिति ’ यह मूलकरिकाकी प्रतीक है असाधारण
कारणका नाम करण है, व्यापारवालेका नाम असाधारण कारण है.
विषयेन्द्रियसम्बन्धो व्यापारः सोऽपि षड्विधः ।
भाषा-पूर्वोक्त षड्विध प्रत्यक्षमें घटादिविषयोंके साथ नेत्रादिइन्द्रियोंका सम्बन्ध
रूप व्यापारभी षट्प्रकारका है.
विषयेन्द्रियेति । व्यापारः सन्निकर्षः ।
भाषा-प्रकृतमें व्यापार नाम सन्निकर्ष विशेषका है.
षड्विधं संनिकर्षमुदाहरणद्वारा दर्शयति, द्रव्यग्रह इति-
भाषा-उस छः प्रकारके सन्निकर्षको मूलकार उदाहरण पूर्वक दिखलाता है-
द्रव्यग्रहस्तु संयोगात्संयुक्तसमवायतः ॥ ५९ ॥
द्रव्येषु समवेतानां,तथा तत्समवायतः ।
तत्रापि समवेतानां,शब्दस्य समवायतः ॥ ६० ॥
तद्वृत्तीनां समवेतसमवायेन तु ग्रहः ।
प्रत्यक्षं समवायस्य विशेषणतया भवेत् ॥६१॥
विशेषणतया तद्वदभावानां ग्रहो भवेत् ।
भाषा-घटादि द्रव्यका ग्रहणसंयोग सम्बन्धसे होता है; द्रव्यसमवेत रूपादिकोंका
ग्रहण ‘संयुक्तसमवाय’ सम्बन्धसे होता है॥५९॥ एवं द्रव्यसमवेत समवेत रूपत्वादि-
कोंका ग्रहण ‘संयुक्तसमवेत समवाय’ सम्बन्धसे होता है; शब्दका ‘ समवाय ’
सम्बन्धसे ग्रहण होता है ॥ ६० ॥ शब्दमें रहनेवाले शब्दत्वादि धर्मोंका ‘समवेत
समवाय’ सम्बन्धसे ग्रहण होत है; समवायका ‘ विशेषणता ’ सम्बन्धसे प्रत्यक्ष
होता है ॥ ६१ ॥ तथा अभावोंका ‘ विशेषणता ’ सम्बन्धसे प्रत्यक्ष होता है.
द्रव्यप्रत्यक्षमिन्द्रियसंयोगजन्यम् । द्रव्यसमवेतप्रत्यक्षमिन्द्रियसं-
युक्तसमवायजन्यमेवमग्रेऽपि। वस्तुतस्तु द्रव्यचाक्षुषं प्रति चक्षुः-
संयोगःकारणम्। द्रव्यसमवेतचाक्षुषं प्रति चक्षुःसंयुक्तसमवायः ।

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. १०५
द्रव्यसमवेतसमवेतचाक्षुषंप्रति चक्षुःसंयुक्तसमवेतसमवायः ।
एवमन्यत्रापि विशिष्यैव कार्यकारणभावः ।
भाषा-घटादि द्रव्यका लौकिक प्रत्यक्ष नेत्रादि इन्द्रियोंके संयोगसे होता है.
एवं घटादि द्रव्य समवेत रूपादिकोंका लौकिक प्रत्यक्ष ' इन्द्रियसंयुक्त समवाय '
सम्बन्धसे होता है.ऐसेही आगेभी जानलेना.वास्तवस तो ऐसा कहना उचित है कि-
घटादि द्रव्य चाक्षुषके प्रति चक्षुःसंयोगकी कारणताहै. एवं घटादिसमवेतरूपादि चाक्षुष
प्रत्यक्षके प्रति ' चक्षुःसंयुक्तसमवाय संसर्गकोकारणता है. एवं घटादि द्रव्यमें समवेत
जो रूपादि उनमें समवेत जो रूपत्त्वादि उन रूपत्त्वादि चाक्षुष प्रत्यक्षके प्रति 'चक्षुः-
संयुक्तसमवेत समवाय' संसर्गको कारणता है ऐसेही त्वाचादिलौकिक प्रत्यक्षमेंभी
विशेषरूपसेही कार्यकारण भाव मानना उचित है.
परंतु परमाणुनीले नीलत्वं पृथिवीपरमाणौ पृथिवीत्वं च चक्षु-
षा कथं न गृह्यते,तत्र परम्परयोद्भूतरूपसम्बन्धस्य महत्त्वसम्ब-
न्धस्य च विद्यमानत्वात् ।
भाषा-(परंतु) इसमेंभी यह विचारणीय है कि पृथिवीके नील परमाणुओंमें नीलत्व
जातिका तथा पार्थिवपरमाणुओंमें पृथिवीत्वजातिका नेत्र इन्द्रिय द्वारा ग्रहण क्यों नहीं
होसकता ? वहां 'स्वाश्रयसमवेतसमवेतत्वादि' परम्परा सम्बन्धसे उद्भूतरूप तथा
महत्त्व परिमाणरूप कारणभी विद्यमान है. यहां 'स्व' शब्दसे उद्भूत रूप तथा महत्त्व-
परिमाण उभयका ग्रहण है. उनके आश्रय त्रसरेणु आदिहैं; त्रसरेणु द्वयणुकमें समवेत है
द्वयणुकपरमाणुओंमें समवेत है, इत्याकारक परंपरासम्बन्धसे उद्भूतरूप तथा महत्त्व
परिमाण परमाणुओंमें विद्यमान है इसीको स्पष्टरूपसे दिखलाते हैं-
तथाहि। नीलत्वं जातिरेकैव घटनीले परमाणुनीले च वर्त्ततेत-
था च महत्त्वसम्बन्धो घटनीलमादायवर्त्तते उद्भूतरूपसम्बन्ध-
स्तूभयमादायैव वर्तते । एवं पृथिवीत्वे घटादिकमादाय मह-
त्त्वसम्बन्धो बोध्यः। एवं वायौ तदीयस्पर्शादौ च सत्तायाश्चाक्षु-
षप्रत्यक्षं स्यात् ।
भाषा-तथाहि नीलमें नीलत्वजाति एकही है वहीघट नीलमें तथा परमाणु नीलमें
विद्यमान है. एवं महत्त्व परिमाणका सम्बन्ध घट नीलको लेकर परमाणुनीलमें विद्य-
मान है और उद्भूतरूपका सम्बन्ध तो घटनील तथा परमाणु नील उभयको लेकर

परमाणुओंमें विद्यमान है ऐसेही पार्थिव परमाणुनिष्ठ पृथिवीत्वके साथभी महत्त्वपरि-
माणका सम्बन्ध घटादिकोंको लेकर पूर्वोक्त परम्परा सम्बन्धसे विद्यमान है. ऐसेही
वायुमें तथा वायुके स्पर्शमें रहनेवाली सत्ताकाभी चाक्षुष प्रत्यक्ष होना चाहिये; क्योंकि
घटादिकोंको लेकर उद्भूतरूपका तथा महत्त्वपरिमाणका सम्बन्ध सत्ताके साथ वायु
तथा उसके पर्श, दोनोंमें बना सकता है.
तस्मादुद्भूतरूपावच्छिन्नमहत्त्वावच्छिन्नचक्षुःसंयुक्तसमवायस्यद्र-
व्यसमवेतचाक्षुषप्रत्यक्षे तादृशचक्षुःसंयुक्तसमवेतसमवायस्य द्र-
व्यसमवेतसमवेतचाक्षुषे कारणत्वं वाच्यम्। इत्थं च परमाणुनीला-
दौ न नीलत्वादिग्रहः, परमाणुचक्षुःसंयोगस्य महत्त्वावच्छिन्नत्वा-
भावात् । एवं वाय्वादौ न सत्त्वादिचाक्षुषं तत्र चक्षुःसंयोगस्य
रूपावच्छिन्नत्वाभावात् ।
भाषा-इसलिये द्रव्यसमवेत 'रूपादि' चाक्षुष प्रत्यक्षके प्रति उद्भूतरूपविशिष्ट
महत्त्वावच्छिन्नके साथ 'चक्षुःसंयुक्तसमवाय' सम्बन्धको कारणता कहनी चाहिये. एवं
द्रव्यसमवेतसमवेत 'रूपत्त्वादि' चाक्षुष प्रत्यक्षके प्रति ( तादृश ) उद्भूतरूप
विशिष्टमहत्त्वावच्छिन्नके साथ 'चक्षुःसंयुक्त समवेत समवायसम्बन्धको कारणता
कहनी उचित है. इस रीतिसे परमाणु नीलमें नीलत्वादि प्रत्यक्षकी आपत्ति नहा बन
सकती; क्योंकि परमाणुओंमें महत्त्व परिमाणके न होनेसे परमाणुनिष्ठ चक्षुःसंयोगमहत्त्वा
वच्छिन्नके साथ नहींहै; ऐसेही वायुआदिकोंमें सत्त्वादिचाक्षुषप्रत्यक्षकी आपत्तिभी नहीं
बन सकती क्योंकि वायुआदिनिष्ठ चक्षुःसंयोग रूपावच्छिन्नके साथ नहीं है.
एवं यत्र घटस्य मध्यावच्छेदेनालोकसंयोगः चक्षुःसंयोगस्तु बाह्या
वच्छेदेन तत्र घटप्रत्यक्षाभावादालोकसंयोगावच्छिन्नत्वं चक्षुः-
संयोगे विशेषणं देयम् । एवं द्रव्यस्पार्शनप्रत्यक्षे त्वक्संयोगः
कारणम्, द्रव्यसमवेतस्पार्शनप्रत्यक्षे त्वक्संयुक्तसमवायः, द्रव्य-
समवेतसमवेतस्पार्शनप्रत्यक्षे त्वक्संयुक्तसमवेतसमवायः कारण
म् । अत्रापि महत्त्वावच्छिन्नत्वमुद्भूतस्पर्शावच्छिन्नत्वं च पूर्व-
१ (पूर्ववदेवेति) अर्थात् परमाणुघटित त्वक्सन्निकर्षसे स्पर्शत्व स्पार्शनके वारणार्थ
महत्त्वावच्छिन्नका तथा प्रभावटित सन्निकर्षसे स्पर्शत्व स्पार्शन वारणार्थ उद्भूतस्पर्शाव-
च्छिन्नत्वादिविशेषणोंकाभी पूर्ववत् निवेश अवश्य करना चाहिये.

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. १०७
वदेव बोध्यम् । एवं गन्धप्रत्यक्षे घ्राणसंयुक्तसमवायः। गन्धसमवे-
तस्य घ्राणजप्रत्यक्षे घ्राणसंयुक्तसमवेतसमवायः कारणम् ।
भाषा-ऐसेही जहां अन्धेरमें घटके बीच दीप जलाकर रखाजाय तो उसका चांदना
घटके मध्यदेशमें होगा और नेत्रसंयोग अन्धकारमें घटके बाह्य देशमें हुआ है. वह
नेत्रसंयोग पूर्वोक्त रीतिसे उद्भूतरूप विशिष्ट महत्त्ववावच्छिन्नभी है; परन्तु ऐसे स्थलमें
घटका प्रत्यक्ष नहीं हो सकता. इसलिये नेत्रसंयोगमें ' प्रकाशसंयोगावच्छिन्नत्व '
भी विशेषण देना चाहिये अर्थात् जहां उद्भूतरूप महत्त्वपरिमाण प्रकाशसंयोगविशिष्ट
चक्षुःसंयोग होगा वहां द्रव्य प्रत्यक्ष होगा, अन्यथा नहीं १ । ऐसेही द्रव्यस्पार्शन
प्रत्यक्षके प्रति त्वक्-संयोगको कारणता है.द्रव्यसमवेत‘उष्णादि’स्पार्शनप्रत्यक्षके प्रति
'त्वक्संयुक्त समवाय' सम्बन्धको कारणता है. एवं द्रव्यसमवेतसमवेत 'उष्णत्वादि'
स्पार्शन प्रत्यक्षके प्रति त्वक्संयुक्तसमवेत समवायसम्बन्धको कारणता है. यहांभी
पूर्ववत् चाक्षुषप्रत्यक्षकी तरह महत्त्वावच्छिन्न उद्भूतस्पर्शत्वावावच्छिन्नके साथ त्वक्संयुक्त
समवेतादिसम्बन्धकोही कारणता है २ । ऐसेही गन्धप्रत्यक्षके प्रति घ्राणसंयुक्त-
समवायसम्बन्धको कारणता है; गन्धसमवेत 'गन्धत्वादि' प्रत्यक्षके प्रति घ्राणसंयुक्त-
समवेतसमवायको कारणता है ३ ।
एवं रसप्रत्यक्षे रसनासंयुक्तसमवायः, रससमवेतस्य रासनप्रत्यक्षे
रसनासंयुक्तसमवेतसमवायःकारणम्।शब्दप्रत्यक्षे श्रोत्रावच्छिन्न-
समवायःकारणम्।शब्दसमवेतश्रावणप्रत्यक्षे श्रोत्रावच्छिन्नसमवे-
तसमवायः कारणम्।अत्र सर्वत्र प्रत्यक्षं लौकिकं बोध्यम्। वक्ष्य-
माणमलौकिकं प्रत्यक्षमिनिद्रयसंयोगादिकं विनापि संभवति ।
एवमात्मनः प्रत्यक्षे मनःसंयोगः, आत्मसमवेतमानसप्रत्यक्षे
मनःसंयुक्तसमवायः, आत्मसमवेतसमवेतमानसप्रत्यक्षे मनःसं-
युक्तसमवेतसमवायः कारणम् ।
भाषा-एवं रसप्रत्यक्षके प्रति रसनासंयुक्त समवायसम्बन्धको कारणता है.
रससमवेत ( रसत्वादि ) रासन प्रत्यक्षके प्रति रसनासंयुक्तसमवेत समवायको
कारणता है ४। एवं शब्दप्रत्यक्षके प्रति श्रोत्रावच्छिन्न समवायसम्बन्धको कारणता
है.शब्दसमवेत ( शब्दत्वादि ) श्रावणप्रत्यक्षके प्रति श्रोत्रावच्छिन्न समवेतसमवायको

कारणता है ५ । इस प्रकरणमें सब जगह प्रत्यक्षशब्दसे लौकिकप्रत्यक्षहीका ग्रहण
करना चाहिये (वक्ष्यमाण) आगे कथनीय अलौकिकप्रत्यक्ष तो चक्षुरादि इन्द्रियस-
म्बन्धसे बिनाभी होसकता है. एवं स्वात्म प्रत्यक्षके प्रति मनःसंयोगको कारणता
है, स्वात्मसमवेत 'सुखादि' मानस प्रत्यक्षके प्रति मनःसंयुक्त समवायसम्बन्धको
कारणता है, स्वात्मसमवेतसमवेत 'सुखत्वादि' मानसप्रत्यक्षके प्रति मनःसंयुक्त
समवेतसमवाय सम्बन्धको कारणता है ६।
अभावप्रत्यक्षे समवायप्रत्यक्षे चेन्द्रियसम्बद्धविशेषणताहेतुः ।
वैशेषिकमते तु न समवायः प्रत्यक्षः । अत्र यद्यपि विशेषणता
नानाविधा ।
भाषा-अभावका तथा समवायका 'इन्द्रियसम्बद्धविशेषणता' सम्बन्धसे प्रत्यक्ष
होताहै नेत्रादिसम्बद्धभूतलादिकोंमें घटादिकोंका अभाव तथा समवेत रूपादिकोंका
समवाय उभय विशेषणीभूत हैं; इसलिये इन्द्रियसम्बद्ध जो भूतलादि उसमें विशे-
षणीभूत अभावादिकोंका 'इन्द्रियसम्बद्धविशेषणता'से ग्रहण होता है; परन्तु समवाय-
का प्रत्यक्ष वैशेषिकसिद्धान्तमें स्वीकृत नहीं है. इस प्रकरणमें वह अभावनिरूपित
विशेषणता यद्यपि अनेक प्रकारकी है.
तथाहि । भूतलादौ घटाद्यभावः संयुक्तविशेषणतया गृह्यते,
संख्यादौ रूपाद्यभावः संयुक्तसमवेतविशेषणतया, संख्यात्वादौ
रूपाद्यभावः संयुक्तसमवेतसमवेतविशेषणतया,शब्दाद्यभावःके-
वलश्रोत्रावच्छिन्नविशेषणतया,कादौ खत्वाद्यभावः श्रोत्रावच्छि-
न्नसमवेतविशेषणतया, एवं कत्वावच्छिन्नाभावे खत्वाभावादिकं
विशेषणविशेषणतया, एवं घटाभावादौ पटाद्यभावः चक्षुःसंयुक्त
विशेषणविशेषणतया ।
भाषा-जैसे भूतलादिमें घटाभावका प्रत्यक्ष संयुक्त विशेषणता सम्बन्धसे होता
है, संख्यादिकोंमें रूपादिका अभाव 'संयुक्तसमवेत विशेषणता' सम्बन्धसे ग्रहण होता
है. एवं संख्यात्वादि धर्मोंमें रूपादिका अभाव 'संयुक्तसमवेत समवेत विशेषणता'
सम्बन्धसे ग्रहण होताहै.शब्दका अभाव केवल'श्रोत्रावच्छिन्न विशेषणता'से ग्रहण होता
है. एवं ककारादि वर्णोंमें खत्वादि धर्मोंका अभाव 'श्रोत्रावच्छिन्न समवेत विशेषणता'
सम्बन्धसे ग्रहण होता है. एवं कत्वावच्छिन्नाभावमें खत्वादिधर्मोंका अभाव 'विशेषण

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. १०९
विशेषणता' सम्बन्धसे ग्रहण होता है; ऐसेही घटादिके अभावमें गो पटादिका अभाव
उसका संयुक्त 'विशेषण विशेषणता' सम्बन्धसे प्रत्यक्ष होता है.
एवमन्यदप्यूह्यम् । तथापि विशेषणतात्वरूपेणैकैव सा गण्यते,
अन्यथा षोढा सन्निकर्ष इति प्राचां प्रवादो व्याहन्येतेति ।
भाषा-इसी तरह अभावप्रत्यक्षमें स्थलानुसार और सम्बन्धोंकीभी कल्पना कर-
लेनी. इसरीतिसे विशेषणता यद्यपि अनेकप्रकारकी है तथापि विशेषणतात्वरूपधर्मसे
वह विशेषणता एकही है. ( अन्यथा ) यदि विशेषणता अधिक मानलीजाय तो
“सन्निकर्ष छःही प्रकारका है”यह कथन प्राचीन आचार्योंका असंगत होगा-इति ।
यदि स्यादुपलभ्येतेत्येवं यत्र प्रसज्यते ॥ ६२ ॥
भाषा-यदि यहां वस्तु होय तो उसका उपलाभ होना चाहिये. इस रीतिसे जहां
प्रसक्ति होसकती है वहां अभावका प्रत्यक्ष विशेषणतासम्बन्धसे होता है ॥ ६२ ॥
यदि स्यादुपलभ्येतेति । अभावप्रत्यक्षे योग्यानुपलब्धिः कार-
णम् । तथाहि । भूतलादौ घटादिज्ञाने जाते घटाभावादिकं न
ज्ञायते, तेनाभावोपलम्भे प्रतियोग्युपलम्भाभावः कारणम् । तत्र
योग्यताऽप्यपेक्षिता ।
भाषा--यहां अभावके साक्षात्कारमें योग्यानुपलब्धिको कारणता है; वही दिखला-
तेहैं कि-भूतलादि अधिकरणोंमें घटादिकोंके भ्रम होनेसे घटादिकोंके अभावका
ज्ञान नहीं होता; इसलिये अभावमात्रकी उपलब्धिमें तत्तत्प्रतियोग्युपलम्भाभावको
कारणता अवश्य माननी चाहिये. ( तत्र ) उस प्रतियोग्युपलम्भाभावमें योग्यताभी
अपेक्षित है.
सा च प्रतियोगिसत्त्वप्रसअनप्रसञ्जितप्रतियोगिकत्वरूपा । तद-
र्थश्च प्रतियोगिनो घटादेः सत्त्वप्रसक्त्या प्रसञ्जित उपलम्भरूपः
प्रतियोगी यस्य स उपलम्भाभावोऽभादप्रत्यक्षे हेतुः ।
भाषा-वह योग्यता प्रतियोगिके सत्त्वापादनसे आपादित प्रतियोगिकत्वरूपा है,
अर्थात् घटादि प्रतियोगियोंकी प्रसक्तिद्वारा जिसके प्रतियोगिका उपलम्भरूपसे
आपादन होसके वह उपलम्भाभाव अभावप्रत्यक्षमें हेतु है. [ तात्पर्य यह कि-प्रतियो-
गिके उपलम्भके आरोपका जहां सम्भव होसके वहां तत्प्रतियोगिक अभावका
प्रत्यक्ष होताहै, अन्यथा नहीं. ऐसा कहनेसे जलीय परमाणुओंमें पृथिवीत्वाभावके

११० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
प्रत्यक्षकी प्रसक्तिभी वारण हुई; क्योंकि वहां प्रतियोग्युपलम्भके आरोपका सम्भव
नहीं है. आरोपका प्रकार यह है कि "जलीयपरमाणुषु यदि पृथिवीत्वं स्यात् तर्ह्युप-
लभ्येत" इसरीतिसे पृथिवीत्वके आरोपसे पृथिवीत्वके उपलम्भकों आरोप जलपर-
माणुओंमें होसकता नहीं क्योंकि आश्रयप्रत्यक्ष प्रयुक्तजातिका प्रत्यक्ष होताहै; यह
नियमहै. इसलिये जैसे जलीय परमाणुमें जलत्वजातिका प्रत्यक्ष नहीं होता वैसेही
आरोपित पृथिवीत्वके उपलम्भके आरोपकाभी सम्भव नहीं है. इसलिये जलीय
परमाणुओंमें पृथिवीत्वाभाव नहीं है. ] इससे यही सिद्ध हुआ कि-जिस अधिकरणमें
जिस अभावके प्रतियोगिके आरोपसे उपलम्भका आरोप होसके उस अधिकरणमें
वह अभाव प्रत्यक्ष होताहै.
तथाहि। यत्रालोकसंयोगादिकं वर्तते तत्र यद्यत्र घटः स्यात्तर्हि
उपलभ्येतेत्यापादयितुं शक्यते तत्र घटाभावादिप्रत्यक्षं भवति,
अन्धकारे तु नापादयितुं शक्यत इति न घटाभावादेरन्धकारे चा-
क्षुषं प्रत्यक्षम्, स्पार्शनप्रत्यक्षं तु भवत्येव, आलोकसंयोगं वि-
नापि स्पार्शनप्रत्यक्षस्यापादयितुं शक्यत्वात् ।
भाषा-(तथाहि)वही दिखलातेहैं कि-जहां आरोपित विषय स्थलमें प्रकाशसंयो-
गादि सामग्री विद्यमान होय वहां "यदि अत्र घटः स्यात् तर्हि उपलभ्येत" ऐसा
आपादन कर सकते हैं; ऐसे स्थलमें घटाभावादिकोंका प्रत्यक्षभी होसकताहै.
अन्धकारस्थलमें ऐसा आपादन कर नहीं सकते इसलिये अन्धकारमें घटाभावादिका
चाक्षुषसाक्षात्कार नहीं होसकता; परन्तु घटादिका (स्पार्शन ) त्वाचसाक्षात्कार
अन्धकारमेंभी होसकताहै; क्योंकि प्रकाशसंयोगसे विनाभी "यदि अत्र घटः स्यात्
तर्हि स्पर्शन उपलभ्येत" ऐसा आपादन कर सकतेंहैं.
गुरुत्वादिकं यदयोग्यं तदभावस्तु न प्रत्यक्षः, तत्र गुरुत्वादि-
प्रत्यक्षस्यापादयितुमशक्यत्वात् ।
भाषा-गुरुत्वधर्म अधर्म आदि जो सर्वथा प्रत्यक्षके अयोग्यपदार्थ हैं, उनका
अभावभी प्रत्यक्ष नहीं होता; क्योंकि "घटे यदि गुरुत्वं स्यात् तर्हि उपलभ्येत" ऐसा
आपादन यहां होय नहीं सकता; कारण यह कि-गुरुत्वधर्म सर्वथाही प्रत्यक्षके
योग्य नहीं किन्तु (तोलनी) तकड़ीके ऊपर नीचे होनेसे अनुमेय है. ऐसेही
"मयि धर्मो यदि स्यात् अधर्मो वा स्यात् तर्हि उपलभ्येत" ऐसा धर्माधर्मका
आपादनभी नहीं होसकता क्योंकि धर्माधर्म सर्वथा प्रत्यक्षके योग्य नहीं किन्तु

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. १११
सुखदुःखादिके भोगसे अनुमेय हैं; परन्तु जिस अधिकरणमें जिस अभावके प्रतियो-
गिका आपादन होसकता है उस अधिकरणमें उस अभावका प्रत्यक्ष अवश्य
होता है.
वायौ रूपाभावः, पाषाणे सौरभाभावः, गुडे तिक्ताभावः, व-
ह्नाव्नुष्णत्वाभावः, श्रोत्रे शब्दाभावः, आत्मनि सुखाभावः।
एवमादयस्तत्तदिन्द्रियैर्गृह्यन्ते तत्तत्प्रत्यक्षरस्यापादयितुं श-
क्यत्वात् ।
भाषा-जैसे ( १ ) “वायौ यदि रूपं स्यात्तर्हि चक्षुषा उपलभ्येत” ऐसा
आपादन कर सकतेहैं; क्योंकि जहां जहां महत्त्वपरिमाण विशिष्ट उद्भूतरूप है वहां२
अवश्य प्रत्यक्ष होताही है, यह वार्त्ता घटादिकोंमें प्रसिद्ध है और वायुमें स्पार्शन
प्रत्यक्ष होनेसे महत्त्वपरिमाण तो विद्यमानही है परन्तु रूप नहीं है; इसलिये रूपा-
भावका चाक्षुष प्रत्यक्ष होसकताहै. ( २ ) एवं “पाषाणे यदि सौरभं स्यात् तर्हि
उपलभ्येत” ऐसा आपादन करसकतेहैं; क्योंकि पुष्पादिकोंमें जहां जहां गन्ध है
उसका घ्राण इन्द्रियद्वारा सर्वत्र ग्रहण होताहै. पाषाणमेंभी यदि गन्ध
होता तो उसका घ्राणेन्द्रियद्वारा ग्रहण अवश्य होता; इसलिये पाषाणमें
गन्धाभावका घ्राणज प्रत्यक्ष होवैहै. ( ३ ) एवं गुड़े तिक्ताभावका रासन प्रत्यक्ष
होता है क्योंकि “गुड़े यदि तिक्तरसः स्यात् तर्हि रसनेन्द्रियेणोपलभ्येत
नास्त्यतो नैवोपलभ्यते” इस रीतिसे गुड़में तिक्तरसके आरोपसे सरनजन्य
तिक्तरसोपलम्भका आरोप होसकता है, अन्य इन्द्रियजन्य उपलम्भका आरोप हो-
सकता नहीं इसलिये रसाभावका प्रत्यक्ष रसनाइन्द्रियजन्यही होवै है अन्यथा नहीं.
( ४ ) एवं अग्निमें अनुष्णस्पर्शाभावका त्वाच प्रत्यक्ष होताहै; क्योंकि “अग्नौ यदि
अनुष्णस्पर्शः स्यात् तर्हि त्वगिन्द्रियेणोपलभ्येत” इस रीतिसे अग्निमें अनुष्ण स्पर्शके
आरोपसे त्वक्जन्य उपलम्भका आरोप होताहै; इसलिये स्पर्शाभावका प्रत्यक्ष केवल
त्वगिन्द्रियजन्य है अन्यथा नहीं. ( ५ ) एवं श्रोत्रमें शब्दाभावका श्रोत्रज प्रत्यक्ष
होताहै; क्योंकि “श्रोत्रे यदि शब्दः स्यात् तर्हि उपलभ्येत” इसरीतिसे श्रोत्रमें
शब्दके आरोपसे श्रोत्रजन्य उपलम्भका आरोप होसकताहै; इसलिये शब्दाभावका
प्रत्यक्ष केवल श्रोत्रइन्द्रिय जन्य है, अन्यथा नहीं. (६) एवं आत्मामें सुखादि अभाव
का प्रत्यक्ष मानसही होताहै क्योंकि “स्वात्मनि यदि सुखं स्यात् तर्हि मनसोपल-
भ्येत” इसरीतिसे आत्मामें सुखके आरोपसे उसके मानस उपलम्भका आरोप होस-
कताहै इसलिये सुखादिके अभावका केवल मानस प्रत्यक्ष होताहै अन्यथा नहीं. ऐसे२

११२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
औरभी अनेकों अभाव पूर्वोक्तरीतिसे तिस तिस इन्द्रियसे ग्रहण होते हैं;
क्योंकि पूर्वोक्त रीतिसे तिस तिस अभावके प्रत्यक्षका आपादन करसकतेहैं.
संसर्गाभावप्रत्यक्षे प्रतियोगिनो योग्यता । अन्योन्याभावप्रत्यक्षे
त्वाधिकरणयोग्यताऽपेक्षिता, अतः स्तम्भादौ पिशाचादिभेदो
ऽपि चक्षुषा गृह्यत एव ॥ ६२ ॥
भाषा-पूर्वोक्तरीतिसे अभाव चार प्रकारका है. उनमें तीन तो ‘संसर्गाभाव’
इस एकही नामसे ग्रहण होतेहैं और चौथे भेदका ‘अन्योन्याभाव’ शब्दसेभी ग्रहण
होताहै उनमें संसर्गाभाव वाचि प्रथम तीन अभावके प्रत्यक्षमें तो बहुलतासे प्रति
योगिकी योग्यता अपेक्षित है अर्थात् यत्प्रतियोगिक संसर्गाभावका साक्षात्कार अपे-
क्षित होय वह प्रतियोगी किसीन किसी इन्द्रियसे अवश्य प्रत्यक्षके योग्य होना
चाहिये और एवं अन्योन्याभाव प्रत्यक्षमें अधिकरणकी योग्यता अपेक्षित है.
इसीसे स्तम्भादिकोंमें पिशाचादिका भेदभी “स्तम्भः पिशाचो न” इत्यादि प्रतीति-
योंद्वारा नेत्रोंसे ग्रहण होताहै--इति ॥ ६२ ॥
एवं प्रत्यक्षं लौकिकालौकिकभेदेन द्विविधं, तत्र लौकिकप्रत्यक्षे
षोढा सन्निकर्षो वर्णितः । अलौकिकसन्निकर्षानिदानीं वदति,
अलौकिक इति-
भाषा-पूर्वोक्त प्रत्यक्षज्ञान, लौकिक, तथा अलौकिक भेदसे दो प्रकारका है. उनमें
लौकिक प्रत्यक्षमें तो छः प्रकारके सन्निकर्ष पूर्व कह चुकेहैं. अब आगे ‘अलौ-
किकस्तु’ इत्यादि ग्रन्थसे अलौकिक सन्निकर्षोंको कहते हैं-
अलौकिकस्तु व्यापारस्त्रिविधः परिकीर्तितः ।
व्यापारः संनिकर्षः ।
भाषा-अलौकिक प्रत्यक्षमें ( व्यापार ) सन्निकर्ष तीन प्रकारका कहा है.
सामान्यलक्षणो ज्ञानलक्षणो योगजस्तथा ॥ ६३ ॥
भाषा-उनमें प्रथम सामान्यलक्षणारूप है; दूसरा ज्ञानलक्षणारूप है, और तीसरा
योगजधर्मरूप है ॥ ६३ ॥
सामान्यलक्षणेति । सामान्यं लक्षणं यस्या इत्यर्थः । तत्र लक्षण-

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ११३
पदेन यदि स्वरूपमुच्यते तदा सामान्यस्वरूपा प्रत्यासत्तिरि-
त्यर्थो लभ्यते । तच्चेन्द्रियसम्बद्धविशेष्यकज्ञाने प्रकारीभूतं
बोध्यम् ।
भाषा-यहां ‘ सामान्य ’ नाम घटत्वादि जातिका है और ‘ लक्षण ’ शब्दसे
यदि स्वरूपका ग्रहण कियाजाय तो “ सामान्यं लक्षणं यस्य ” इत्याकारक बहुव्रीहि
समाससे सामान्यस्वरूपप्रत्यासत्तिरूप अर्थका लाभ होताहै. ‘प्रत्यासत्ति’ नाम सम्बन्ध-
का है. (तच्च) वह सामान्यस्वरूप सम्बन्ध इन्द्रियसम्बद्ध विशेष्यक जो “अयं घटः”
इत्याकारक ज्ञान उसमें प्रकारीभूत जानना चाहिये अर्थात् पुरोवर्ति घटमें नेत्रसंयोगके
पश्चात् ‘अयं घटः’ इत्याकारक साक्षात्कार होताहै. इस साक्षात्कारका कारणीभूत सम्बन्ध
संयोगरूप लौकिक है. यह ज्ञान घट-घटत्व दोनोंको विषय करैहै. उनमें घटकों
विशेष्यविधया तथा घटत्वको प्रकारविधया विषय करैहै; इसलिये ‘इन्द्रियसम्बद्धं
विशेष्यं यस्य तदिन्द्रियसम्बद्धविशेष्यकं ज्ञानम्’ इसमें जो प्रकारविधया भान हो
वही सामान्यसम्बन्धका स्वरूप है. ऐसे घटत्वादि हैं.
तथाहि । यतेन्द्रियसंयुक्तो धूमादिस्तद्विशेष्यकं धूम इति ज्ञानं
जातं तत्र ज्ञाने धूमत्वं प्रकारो धूमत्वेन च सन्निकर्षेण धूमः इत्येवं
रूपं सकलधूमविषयकं ज्ञानं जायते । अत्र यदिन्द्रियसम्बद्ध-
मित्येवोच्यते तदा धूलीपटले धूमत्वभ्रमानन्तरं सकलधूमविष-
यकं ज्ञानं न स्यात्, तत्र धूमत्वेन सहेन्द्रियसम्बन्धाभावात् ।
भाषा-(तथाहि) वही दिखलाते हैं कि-जहां धूमादि विशेष्य पदार्थोंके साथ ने-
त्रादि इन्द्रियोंका सम्बन्ध हुआहै वहां धूमादि विशेष्यक ‘धूमः’ इत्याकारक ज्ञान
होता है. उस ज्ञानमें धूमत्वका प्रकारविधया भान है; वह ( धूमत्व ) ही अलौकिक
सन्निकर्ष है; उस धूमत्वरूप सन्निकर्षसे ‘धूमः’ इत्याकारक सकलधूमविषयक ज्ञान
उत्पन्न होता है; क्योंकि इस ज्ञानमें प्रकार जो धूमत्व वह सभी धूमोंमें एकही है. इस
लिये पुरोवर्ति धूमज्ञानकालमें नेत्रइन्द्रियका ‘स्वजन्यज्ञानप्रकारीभूत धूमत्ववत्ता’
सम्बन्ध सकल धूमनमें होता है. इस सम्बन्धसे नेत्रइन्द्रियजन्य यावत् धूमका प्र-
त्यक्ष द्वितीयक्षणमें होता है. इस प्रत्यक्षका विषय पुरोवर्ति धूमभी होसकता है,
क्योंकि ज्ञानप्रकारीभूत धूमत्ववत्ता जैसे और धूमोंमें है वैसे पुरोवर्ति धूममेंभी है.
इसलिये पुरोवर्ति धूमादि पदार्थोंमें प्रथमक्षणमें लौकिक और द्वितीयक्षणमें अलौकिक
यह दो ज्ञान मानने उचितहैं. शंका-यहां इन्द्रियसम्बद्ध विशेष्यकज्ञानमें प्रकारीभूत
धर्मको सामान्यलक्षणप्रत्यासत्ति न मानकर लाघवसे केवल प्रकारत्वेन इनेद्रय-
८

११४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
सम्बद्धहीको प्रत्यासत्ति मानें तो क्या दोष है ? धूमचक्षुःसंयोगकालमें धूमत्वभी प्र-
कारत्वेन इन्द्रियसम्बद्ध है याते कुछ दोष नहीं. समाधान-ऐसा कहनेसे जहां
( धूलीपटल ) वायुवरोलेका धूमत्वेन ज्ञान हुआ है वहां निर्वाह नहीं होय सकेगा
क्योंकि ऐसे स्थलमें प्रकारता सम्बन्धसे इन्द्रियसम्बद्ध धूलीपटलत्व है, धूमत्व नहीं;
परन्तु ज्ञान तो यहांभी सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्तिसे सकल धूमविषयक होता
है सो धूमत्वको इन्द्रियसम्बद्ध नहीं होनेसे नहीं हुआ चाहिये.
मन्मते त्विन्द्रियसम्बद्धं धूलीपटलं, तद्विशेष्यकं धूम इति ज्ञानं
तत्र प्रकारीभूतं धूमत्वं प्रत्यासत्तिः। इन्द्रियसम्बन्धश्च लौकिको
ग्राह्यः, इदं च बहिरिन्द्रियस्थले, मानसस्थले तु ज्ञानप्रकारीभूतं
सामान्यमात्रं प्रत्यासत्तिः । अतः शब्दादिना यत्किञ्चित्पिशा-
चाद्युपस्थितौ मानसः सकलपिशाचादिबोध उपपद्यते ।
भाषा-और मेरे मतमें तो निर्वाह होसकता है; क्योंकि हमने तो लम्बायमान
इन्द्रियसम्बद्धविशेष्यक ज्ञानमें 'प्रकारीभूतधर्म' को प्रत्यासत्ति माना है. यहां इन्द्रिय
सम्बद्ध धूलीपटल है उसी धूलीपटलमें धूलीपटल विशेष्यक धूमत्व प्रकारक 'धूमः'
इत्याकारक ज्ञान हुआ है. उसमें प्रकाररूपसे भासमान धूमत्वही सामान्यलक्षणा
प्रत्यासत्ति है. पुरोवर्ति पदार्थमें इन्द्रियका सम्बन्ध लौकिक ग्रहण करना उचित है;
परन्तु यह पूर्व कथन बाह्य इन्द्रियस्थलमें है, मानस प्रत्यक्षस्थलमें तो ज्ञानप्रकारीभूत
सामान्य मात्र प्रत्यासत्ति कहनेसे निर्वाह होसकताहै.इसी प्रत्यासत्तिसे सर्वथा प्रत्यक्षा-
योग्य पिशाचादिका शाब्दज्ञान हुए पीछे "सर्वे पिशाचाः पिशाचत्ववन्तः" इत्याकारक
सकल पिशाचादिविषयक मानस बोध उत्पन्न होता है क्योंकि पूर्वोक्त रीतिसे ज्ञान
शब्दसे पिशाचादि विषयक शाब्दज्ञानभी लेसकते हैं;उसमें प्रकारीभूत जो पिशाचत्व-
रूप सामान्य वही 'मनोजन्य ज्ञानप्रकारीभूत पिशाचत्ववत्ता'सम्बन्धसे सकल पिशाच
विषयक अलौकिक ज्ञानका जनक है.
परंतु समानानां भावः सामान्यं, तच्च क्वचिन्नित्यं धूमत्वादि, क्व-
चिच्चानित्यं घटादि, यथैको घटः संयोगेन भूतले समवायेन क-
पाले वा ज्ञातस्तदनन्तरं सर्वेषामेव तद्वतां भूतलादीनां
कपालादीनां वा ज्ञानं भवति तत्रेदं बोध्यम् । परन्तु सामान्यं
येन सम्बन्धेन ज्ञायते तेन सम्बन्धेनाधिकरणानां प्रत्यासत्तिः ।

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ११५
भाषा-(परन्तु) यहां (समानानां) तुल्यपदार्थोंका (भावः) प्रकारीभूतधर्म
'सामान्य' शब्दका अर्थ है. वह किसी जगहमें नित्य है, जैसे धूमत्व घटत्व पटत्वादि;
और किसी जगहमें अनित्यभी है, जैसे घटपटादि. जिस स्थलमें एकही घटका संयोग
सम्बन्धसे भूतलमें और समवायसम्बन्धसे कपालोंमें भान हुआहै वहां (तदनन्तरं)
उस लौकिकज्ञानके पश्चात् द्वितीयक्षणमें 'सर्वाणि भूतलादीनि संयोगेन घटवंति'
एवं सर्वे कपालाः समवायेन घटवन्तः' इत्याकारक यावत् उस घटवाले संयोगसम्ब-
न्धसे भूतलादिकोंका तथा समवायसम्बन्धसे कपालोंका ज्ञान होता है. (तत्रेदं बो-
ध्यम्) वहां ऐसे स्थलमें ज्ञायमान अनित्य सामान्यही प्रत्यासत्ति जाननी उचित है;
(परन्तु) उसमेंभी इतना और अधिक जानना चाहिये कि वह सामान्य जिस स-
म्बन्धसे अपने अधिकरणमें ज्ञात हुआ है उसीही सम्बन्धसे उस सदृश
अधिकरणोंकी अलौकिक प्रत्यासत्ति होती है. अन्यथा यदि ऐसा नहीं
माने तो समवायसम्बन्धसे ज्ञान प्रकारीभूत घटत्वादि सामान्य प्रत्यासत्तिसे
कालाकाशादि पदार्थोंके ज्ञानकी आपत्तिभी अलौकिक प्रत्यासत्तिसे होसकती है.
किंतु यत्र तद्घटनाशानन्तरं तद्धटवतः स्मरणं जातं तत्र सामा-
न्यलक्षणया सर्वेषां तद्धटवतां भानं न स्यात्, सामान्यस्य त-
दानीमभावात् । किंचेन्द्रियसम्बद्धविशेष्यकं 'घटः' इति ज्ञानं
यत्र जातं तत्र परदिन इन्द्रियसम्बन्धंविनापि तादृशज्ञानप्रकारी-
भूतसामान्यस्य सत्त्वात्तादृशज्ञानं कुतो न जायते ।
भाषा-किन्तु एवंच जिस स्थलमें (तद्घट) विशेषणरूपेण दृष्ट घटके नाशके
अनन्तर उसी घटवाले स्थलका "तद्भूतलं घटवदासीत्"इत्याकारक स्मरण हुआ है
वहां सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्तिसे उसी सम्बन्धसे उस घटवाले यावत् अधिकरणोंका
बोध नहीं हुआ चाहिये; क्योंकि सामान्यरूपसे भासमान घटका उस कालमें अभाव
है. और वही अधिकरणोंके साथ ज्ञानका सम्बन्ध है; उसके न होनेसे उसके अधिकर-
णोंका ज्ञानभी स्वयंही नहीं होगा. (किञ्च) औरभी दोष है. जहां इन्द्रियसम्बद्ध
विशेष्यक 'घटः' इत्याकारक ज्ञान उत्पन्न हुआ है वहां अग्रिम दिनमें इन्द्रियसम्ब-
न्धसे विनाभी तादृश 'घटः' इत्याकारक ज्ञान प्रकारीभूत घटत्वरूप सामान्य विद्य-
मान है तादृश सामान्यलक्षणा प्रत्यसत्तिद्वारा "सर्वे घटा घटत्ववतः"इत्याकारक ज्ञान-
अग्रिम दिनमें क्यों नहीं होता?(अर्थात् ज्ञानकी सामग्री विद्यमान है तो ज्ञान अवश्य
होनाचाहिये )

११६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
तस्मात् सामान्यज्ञानं प्रत्यासत्तिर्न तु सामान्यमित्याह, आ-
सत्तिरित्यादि-
भाषा-इसलिये सामान्यप्रत्यासत्ति नहीं बन सकती; किन्तु सामान्यका ज्ञानही
प्रत्यासत्ति माननी उचित है. इसीवार्ताको मूलकार 'आसत्तिराश्रयाणां' इत्यादि
ग्रन्थसे कहतेहैं-
आसत्तिराश्रयाणां तु सामान्यज्ञानमिष्यते ।
आसत्तिः प्रत्यासत्तिरित्यर्थः ।
भाषा-घटादि अधिकरणोंकी (आसत्ति) प्रत्यासत्ति तो सामान्यविषयक ज्ञानको
मानना उचित है.
तथा च सामान्यलक्षणेत्यत्र लक्षणशब्दस्य विषयोऽर्थः । तेन
सामान्यविषयकं ज्ञानं प्रत्यासत्तिरित्यर्थो लभ्यते ॥ ६३ ॥
भाषा-(तथाच) जब ऐसे माना तो पूर्वकारिकाकथित “सामान्यलक्षणा” इस
संज्ञानिष्ठ 'लक्षण' शब्दका अर्थ 'विषय' है. पूर्वोक्त रीतिसे स्वरूप नहीं अर्थात्
“सामान्यं लक्षणं विषयो यस्य” ऐसा समास करनेसे सामान्यविषयक ज्ञानही प्रत्या-
सत्ति है. यही अर्थ लाभ होताहै ॥ ६३ ॥
ननु चक्षुःसंयोगादिकं विनाऽपि सामान्यज्ञानं यत्र वर्त्तते तत्र
सकलघटादीनां चाक्षुषादिप्रत्यक्षं स्यादत आह, तदिन्द्रियजेति-
शंका-जिस स्थलमें नेत्रसंयोगादिकसे विनाभी घटत्वादि सामान्यविषयक
ज्ञान विद्यमान है वहां सकल घटादिविषयोंका चाक्षुषप्रत्यक्ष होना चाहिये; क्योंकि
प्रत्यक्ष कारणीभूत 'सामान्यज्ञानप्रत्यासत्तिरूपा' सामग्री वहां विद्यमान है.
समाधान-ऐसे स्थलमें जिस सामग्रीकी न्यूनता है उसीको 'तदिन्द्रियज' इत्यादि
ग्रन्थसे मूलकारकहतेहैं-
तदिन्द्रियजतद्धर्मबोधसामग्र्यपेक्ष्यते ॥ ६४ ॥
भाषा-(तत) नेत्रादि इन्द्रियजन्य जो (तत) घटत्वादि धर्मिकबोध उस बोधकी
सामग्रीभी अपेक्षित है ॥ ६४ ॥
अस्यार्थः- यदा बहिरिन्द्रियेण सामान्यलक्षणया ज्ञानं जननीयं
तदा यत्किञ्चिद्धर्मिणि तत्सामान्यस्य तदिन्द्रियजन्यज्ञानसाम-

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ११७

द्यपेक्षिता,सा च सामग्री चक्षुःसंयोगालोकसंयोगादिकम्। तेना-
न्धकारादौ चक्षुरादिना तादृशं ज्ञानं न जायते ॥ ६४ ॥
भाषा-अर्थात् जिस कालमें नेत्रादि बाह्य इन्द्रियोंसे सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति-
द्वारा ज्ञान उत्पन्न होता है, उस कालमें (यत्किञ्चित् ) घटादि धर्म्मीमें ' घटत्वादि '
सामान्यविषयक नेत्रादि इन्द्रियजन्य ज्ञानकी सामग्रीभी अपेक्षित है; वह सामग्री
नेत्रसंयोग, आलोकसंयोग, उद्भूतरूप, महत्त्वपरिमाणादि यथायोग्य तिस २ इन्द्रिय-
प्रत्यक्ष स्थलमें जाननी योग्य है. ऐसा माननेसे अन्धकारादिकोंमें नेत्रादिद्वारा
घटत्वादिधर्म्मविशिष्ट धर्मीका ज्ञान नहीं होय सकता; इसलिये वहां सामान्यल-
क्षणा प्रत्यासत्तिभी नहीं बन सकती ॥ ६४ ॥
ननु ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्तिर्यदि ज्ञानरूपा सामान्यलक्षणापि
ज्ञानरूपा तदा तयोर्भेदो न स्यादत आह, विषयीति-
शंका-ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति यदि ज्ञानस्वरूपा है और सामान्यलक्षणाभी पूर्वो-
क्तरीतिसे ज्ञानस्वरूपाही है तौ फिर उन दोनोंका परस्पर भेद नहीं होना चाहिये.
समाधान--उनके भेदहीको 'विषयी यस्य' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार स्वयं
कहते हैं-
विषयी यस्य तस्यैव व्यापारो ज्ञानलक्षणः ।
व्याख्या-यस्य सौरभादेः, विषयी--ज्ञानं, तस्यैव सौरभादेः, व्यापारः सन्निकर्षः,
ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्तिर्भवतीत्यर्थः ।
भाषा--अर्थात् अलौकिक सन्निकर्षसे यद्विषयक ज्ञान हुआ है उसीके सम्बन्ध-
विशेषका नाम ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति है.
[ 'सुरभि चन्दनं ' इत्याकारक चाक्षुष ज्ञान सौरभमें चन्दनमें चन्दनत्व इन
तीनोंको विषय करताहै. उनमें चन्दन चन्दनत्वका तो यथाक्रम नेत्रसंयोग तथा नेत्रसंयु-
क्तसमवाय सम्बन्धसे लौकिकप्रत्यक्ष हो सकता है; परन्तु सौरभांशमें साक्षात्कारज-
नक लौकिकसम्बन्ध दुर्घट है; क्योंकि सौरभांश चाक्षुषज्ञानका अविषय है और
सौरभांशको विषय करनेवाले घ्राणेन्द्रियका उस कालमें सम्बन्धही
नहीं किन्तु पूर्वगृहीत सौरभका स्मरण किंवा पूर्वगृहीत सौरभके आत्मामें
संस्कारमात्रका सम्भव होसकताहै इसलिये ' सुरभिचन्दनं ' इत्याकारक ज्ञानस्थलमें
सौरभानुयोगिक नेत्रप्रतियोगिक कोई एक सम्बन्ध अवश्य कहना चाहिये. वह
सम्बन्ध साक्षात् तो बनही नहींसकता, किन्तु ' नेत्रसंयुक्त मनःसंयुक्त आत्मसमवेत