न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
पृष्ठ 122, कुल 350 में से
संदर्भ में पढ़ें९८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली [ प्रत्यक्ष-
नसप्रत्यक्ष ज्ञानादि गुणोंद्वाराही होताहै.उसकालमें ज्ञानादिगुणोंके न होनेसे आत्मा-
का मानसप्रत्यक्षभी नहीं हो सकता. ऐसेही सुषुप्तिकालमें व्याप्तिज्ञानके न होनेसे
अनुमितिज्ञानभी नहीं हो सकता. सादृश्यज्ञानके न होनेसे उपमितिज्ञानभी नहीं
हो सकता, एवं सुषुप्तिकालमें पदज्ञान न होनेसे शाब्दबोधात्मक ज्ञानभी नहीं हो-
सकता.इस पूर्वोक्तरीतिसे सुषुप्तिकालमें अनुभव सामग्रीके न होनेसे अनुभव ज्ञान नहीं
होसकता. एवं सुषुप्तिकालमें संस्कारोंका उद्बोधक कोई पदार्थ नहीं है याते स्मृतिरूप
ज्ञानभी नहीं होता. समाधान-सुषुप्तिके प्रथमक्षणमें उत्पन्न हुई ( इच्छादि ) अ-
र्थात् इच्छाके आदिमें होनेवाली ज्ञान व्यक्तिका तथा उस ज्ञानके सम्बन्धसे आत्माका
साक्षात्कार होना चाहिये. शंका-सुषुप्तिके प्रथमक्षणमें ज्ञानव्यक्ति अतीन्द्रिय उत्पन्न
होती है इसलिये उसका तथा उसके सम्बन्धसे आत्माका प्रत्यक्ष नहीं होता-समा-
धान-उस ज्ञानव्यक्तिके अतीन्द्रिय माननेमें कोई प्रमाण नहीं है.
सुषुप्तिप्राक्काले निर्विकल्पकमेव जायत इत्यत्रापि प्रमाणाभावा-
त् । अथ ज्ञानमात्रे त्वङ्मनःसंयोगस्य यदि कारणत्वं तदा रास-
नचाक्षुषादिप्रत्यक्षकाले स्पार्शनप्रत्यक्षं स्यात्, विषयत्वक्संयो-
गस्य त्वङ्मनःसंयोगस्य च सत्त्वात् परस्परप्रतिबन्धादेकमपि
वा न स्यादिति ।
शंका-सुषुप्तिके पूर्वक्षणमें उत्पन्नहुआ ज्ञान नियमसे ( निर्विकल्पक ) प्रकारतादि
रहित होता है. याते उसका प्रत्यक्ष तथा उसके सम्बन्धसे आत्माका प्रत्यक्ष बन
नहीं सकता. समाधान-सुषुप्तिके प्रथम लक्षणमें ज्ञानके नियमसे ( निर्विकल्प )
प्रकारतादि शून्य उत्पन्न होनेमेंभी कोई प्रमाण नहीं है.शंका-यदि ज्ञानमात्रके प्रति
त्वचा मनका संयोग कारण है तो रसनाजन्य प्रत्यक्षकालमें तथा नेत्रादिजन्य प्रत्यक्ष
कालमें त्वाच प्रत्यक्षभी होना चाहिये; क्योंकि विषय घटादिके साथ त्वचाका
तथा त्वचाके साथ मनका संयोग विद्यमान है. समाधान-चाक्षुषादि ज्ञान जनका
सामग्री त्वचा जन्य स्पर्शन ज्ञानमें प्रतिबन्धका है इसलिये चाक्षुष ज्ञानकालमें
स्पार्शनज्ञान नहीं होता. शंका-यदि ज्ञानकी सामग्रियोंमें प्रतिबध्य प्रतिबन्धक
भावकी कल्पना की जाय तो विषयइन्द्रियसंयोग तथा इन्द्रियमनःसंयोगरूपा ज्ञान
सामग्री सर्वत्र उपस्थित है, वह सामग्री यदि ( परस्पर ) एक दूसरीकी प्रतिबन्धका
होगी तो कोई ज्ञानभी उत्पन्न नहीं होगा.