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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 125, कुल 350 में से

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पृष्ठ 125

·-परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. १०१
निर्विकल्पके च घटत्वादिकं न प्रकारः तेन घटत्वादिविशिष्टघ-
टादिवैशिष्ट्यभानं ज्ञाने न सम्भवति। घटत्वाद्यप्रकारकं च घटा-
दिविशिष्टज्ञानं न सम्भवति, जात्यखण्डोपाध्यतिरिक्तपदार्थज्ञा-
नस्य किञ्चिद्धर्मप्रकारकत्वनियमात् ।
भाषा-और निर्विकल्पकज्ञानमें घटत्वादिधर्मोंका प्रकारतारूपसे भान नहीं है
इसलिये घटत्वादि विशिष्ट जो घटादि, उन घटादिकोंका ( वैशिष्ट्य ) विशेषणरूपसे
भान निर्विकल्पक ज्ञानमें नहीं होता और घटत्वादिप्रकारकां जिसमें न भान हो
किन्तु केवल घटही प्रकाररूपसे जिसमें भान हो ऐसा घटादिविशिष्ट ज्ञान होही
नहीं सकता; क्योंकि जाति तथा अखण्ड उपाधिसे भिन्न पदार्थोंका किसी एक
धर्महीसे अवश्य भान होताहै, अन्यथा नहीं घटादि पदार्थ जाति तथा अखण्डोपा-
धिसे भिन्न हैं इसलिये उनका घटत्वादि धर्मोंद्वारा भान होताहै, केवल नहीं. अख
ण्डउपाधि नाम प्रतियोगित्व अनुयोगित्व आदि अनिर्वचनीय धर्मोंका है-इति ।
महत्त्वं षड्विधे हेतुः-
भाषा-पूर्वोक्त षड्विध प्रत्यक्षमें महत्त्वपरिमाणको कारणता है.
महत्त्वमिति । द्रव्यप्रत्यक्षे महत्त्वं समवायसम्बन्धेन कारणम् ।
द्रव्यसमवेतानां जातिगुणकर्मणां प्रत्यक्षे स्वाश्रयसमवायस-
म्बन्धेन कारणम्। द्रव्यसमवेतसमवेतानां गुणत्वकर्मत्वरूपत्वा-
दीनां प्रत्यक्षे स्वाश्रयसमवेतसमवायसम्बन्धेन कारणमिति ।
भाषा-द्रव्यके प्रत्यक्षमें महत्त्व परिमाण समवायसम्बन्धसे कारण है अर्थात्
जिस द्रव्यमें समवायसम्बन्धसे महत्त्वपरिमाण है उसीका प्रत्यक्ष होसकताहै,
अन्यका नहीं और द्रव्यमें समवायसम्बन्धसे रहनेवाले जाति गुण कर्म आदिकोंके
प्रत्यक्षमें महत्त्वपरिमाणको 'स्वाश्रयसमवाय' सम्बन्धसे कारणता है. 'स्व' शब्दसे
महत्त्वपरिमाण उसका आश्रय द्रव्य, उसमें समवायसम्बन्धसे जातिगुणादि रहतेहैं.
ऐसेही द्रव्यमें समवेत जो गुण कर्मरूपादि उन गुणकर्मरूपादिकोंमें समवेत जो
गुणत्वकर्मत्व रूपत्वादि उन गुणत्वकर्मत्व रूपत्वादिकोंके प्रत्यक्षके प्रति महत्त्वपरि-
माणको 'स्वाश्रयसमवेतरूमवाय' सम्बन्धसे कारणता है. 'स्व' शब्दसे महत्त्वपरिमाण
उसका आश्रय द्रव्य उसमें समवेत गुण कर्म रूपादि उनमे गुणत्व कर्मत्व
रूपत्वादिकोंका समवायसम्बन्ध है. एतादृश सम्बन्धसे महत्त्व परिमाणको गुणत्वादि
प्रत्यक्षके प्रति कारणता है-इति.