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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 350 में से

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पृष्ठ 123

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ९९
अत्र केचित् । पूर्वोक्तयुक्त्या त्वङ्मनोयोगस्य हेतुत्वे सिद्धे
चाक्षुषादिसामग्र्याः स्पार्शनादिप्रतिबन्धकत्वमनुभवानुरोधात्
कल्प्यत इति । अन्ये तु सुषुप्त्यनुरोधाच्चर्ममनःसंयोगस्य ज्ञान-
हेतुत्वं कल्प्यम्, चाक्षुषादिप्रत्यक्षकाले च त्वङ्मनःसंयोगाभा-
वान्न स्पार्शनप्रत्यक्षमिति वदन्ति ।
समाधान-यहां कई आचार्य ऐसा कहते हैं कि-“सुषुप्तिकाले त्वचं त्यक्त्वा पुरी-
ततिवर्तमानेन मनसा ज्ञानाजननमिति” अर्थात् सुषुप्तिकालमें त्वगिन्द्रियको त्यागके
पुरीततीनामक नाडीमें वर्तमान मनसे ज्ञान उत्पन्न नहीं होता.इति।इस पूर्वोक्त युक्ति
से त्वचा मनःसंयोगको ज्ञानहेतुता सिद्ध है और एककालमें नाना ज्ञानकी उत्पत्ति
भी अनुभवसे विरुद्ध है. इसलिये अनुभवके अनुरोधसे चाक्षुषादि ज्ञानकी सामग्री
को स्पार्शन ज्ञानके प्रति प्रतिबन्धक कल्पना करसकते हैं. इस पूर्व प्रकरणमें 'त्वचा'
शब्दसे त्वगिन्द्रियका ग्रहण है. इसी स्थलमें ( अन्येतु ) पक्षधरमिश्र ऐसे कहते हैं
कि-सुषुप्तिके अनुरोधसे ( चर्म ) त्वग् इन्द्रियके गोलकके तथा मनके परस्पर संयो-
गको ज्ञान सामान्यके प्रति कारणता कल्पना करनी उचित है. ऐसे माननेसे पूर्व
दिया जो चाक्षुषादि प्रत्यक्षकालमें त्वाच प्रत्यक्ष आपत्तिरूप दोष वहभी नहीं है;
क्योंकि चाक्षुषादि प्रत्यक्षकालमें त्वग् इन्द्रियका तथा मनका संयोग नहीं है इसलिये
त्वाचप्रत्यक्षकी योग्यता नहीं है.
मनोग्राह्यं सुखं दुःखमिच्छा द्वेषो मतिः कृतिः ॥५७॥
भाषा-सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, ज्ञान तथा यत्न इन छहको मन इन्द्रिय ग्रहण
करता है ॥ ५७ ॥
मनोग्राह्यमिति।मनोजन्यप्रत्यक्षविषय इत्यर्थः।मतिर्ज्ञानं,कृतिः
प्रयत्नः। एवं सुखत्वादिकमपि मनोग्राह्यम् । एवमात्मापि मनो
ग्राह्यः, किंतु मनोमात्रस्य गोचर इत्यनेन पूर्वमुक्तत्वादत्र
नोक्तः॥ ५७ ॥
भाषा-यह सब मानस प्रत्यक्षके विषय हैं ऐसेही इन सबमें रहनेवाली ' सुख-
त्व ' आदि जातियोंकाभी मानस प्रत्यक्षही होता है. ऐसेही आत्माकाभी मानस
प्रत्यक्षही होता है "मनोमात्रस्य गोचरः५०" इस ग्रन्थसे पूर्व कहआये हैं; इसलिये
यहां नहीं कहा ॥ ५७ ॥