न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. १०७
वदेव बोध्यम् । एवं गन्धप्रत्यक्षे घ्राणसंयुक्तसमवायः। गन्धसमवे-
तस्य घ्राणजप्रत्यक्षे घ्राणसंयुक्तसमवेतसमवायः कारणम् ।
भाषा-ऐसेही जहां अन्धेरमें घटके बीच दीप जलाकर रखाजाय तो उसका चांदना
घटके मध्यदेशमें होगा और नेत्रसंयोग अन्धकारमें घटके बाह्य देशमें हुआ है. वह
नेत्रसंयोग पूर्वोक्त रीतिसे उद्भूतरूप विशिष्ट महत्त्ववावच्छिन्नभी है; परन्तु ऐसे स्थलमें
घटका प्रत्यक्ष नहीं हो सकता. इसलिये नेत्रसंयोगमें ' प्रकाशसंयोगावच्छिन्नत्व '
भी विशेषण देना चाहिये अर्थात् जहां उद्भूतरूप महत्त्वपरिमाण प्रकाशसंयोगविशिष्ट
चक्षुःसंयोग होगा वहां द्रव्य प्रत्यक्ष होगा, अन्यथा नहीं १ । ऐसेही द्रव्यस्पार्शन
प्रत्यक्षके प्रति त्वक्-संयोगको कारणता है.द्रव्यसमवेत‘उष्णादि’स्पार्शनप्रत्यक्षके प्रति
'त्वक्संयुक्त समवाय' सम्बन्धको कारणता है. एवं द्रव्यसमवेतसमवेत 'उष्णत्वादि'
स्पार्शन प्रत्यक्षके प्रति त्वक्संयुक्तसमवेत समवायसम्बन्धको कारणता है. यहांभी
पूर्ववत् चाक्षुषप्रत्यक्षकी तरह महत्त्वावच्छिन्न उद्भूतस्पर्शत्वावावच्छिन्नके साथ त्वक्संयुक्त
समवेतादिसम्बन्धकोही कारणता है २ । ऐसेही गन्धप्रत्यक्षके प्रति घ्राणसंयुक्त-
समवायसम्बन्धको कारणता है; गन्धसमवेत 'गन्धत्वादि' प्रत्यक्षके प्रति घ्राणसंयुक्त-
समवेतसमवायको कारणता है ३ ।
एवं रसप्रत्यक्षे रसनासंयुक्तसमवायः, रससमवेतस्य रासनप्रत्यक्षे
रसनासंयुक्तसमवेतसमवायःकारणम्।शब्दप्रत्यक्षे श्रोत्रावच्छिन्न-
समवायःकारणम्।शब्दसमवेतश्रावणप्रत्यक्षे श्रोत्रावच्छिन्नसमवे-
तसमवायः कारणम्।अत्र सर्वत्र प्रत्यक्षं लौकिकं बोध्यम्। वक्ष्य-
माणमलौकिकं प्रत्यक्षमिनिद्रयसंयोगादिकं विनापि संभवति ।
एवमात्मनः प्रत्यक्षे मनःसंयोगः, आत्मसमवेतमानसप्रत्यक्षे
मनःसंयुक्तसमवायः, आत्मसमवेतसमवेतमानसप्रत्यक्षे मनःसं-
युक्तसमवेतसमवायः कारणम् ।
भाषा-एवं रसप्रत्यक्षके प्रति रसनासंयुक्त समवायसम्बन्धको कारणता है.
रससमवेत ( रसत्वादि ) रासन प्रत्यक्षके प्रति रसनासंयुक्तसमवेत समवायको
कारणता है ४। एवं शब्दप्रत्यक्षके प्रति श्रोत्रावच्छिन्न समवायसम्बन्धको कारणता
है.शब्दसमवेत ( शब्दत्वादि ) श्रावणप्रत्यक्षके प्रति श्रोत्रावच्छिन्न समवेतसमवायको