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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 130, कुल 350 में से

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पृष्ठ 130

परमाणुओंमें विद्यमान है ऐसेही पार्थिव परमाणुनिष्ठ पृथिवीत्वके साथभी महत्त्वपरि-
माणका सम्बन्ध घटादिकोंको लेकर पूर्वोक्त परम्परा सम्बन्धसे विद्यमान है. ऐसेही
वायुमें तथा वायुके स्पर्शमें रहनेवाली सत्ताकाभी चाक्षुष प्रत्यक्ष होना चाहिये; क्योंकि
घटादिकोंको लेकर उद्भूतरूपका तथा महत्त्वपरिमाणका सम्बन्ध सत्ताके साथ वायु
तथा उसके पर्श, दोनोंमें बना सकता है.
तस्मादुद्भूतरूपावच्छिन्नमहत्त्वावच्छिन्नचक्षुःसंयुक्तसमवायस्यद्र-
व्यसमवेतचाक्षुषप्रत्यक्षे तादृशचक्षुःसंयुक्तसमवेतसमवायस्य द्र-
व्यसमवेतसमवेतचाक्षुषे कारणत्वं वाच्यम्। इत्थं च परमाणुनीला-
दौ न नीलत्वादिग्रहः, परमाणुचक्षुःसंयोगस्य महत्त्वावच्छिन्नत्वा-
भावात् । एवं वाय्वादौ न सत्त्वादिचाक्षुषं तत्र चक्षुःसंयोगस्य
रूपावच्छिन्नत्वाभावात् ।
भाषा-इसलिये द्रव्यसमवेत 'रूपादि' चाक्षुष प्रत्यक्षके प्रति उद्भूतरूपविशिष्ट
महत्त्वावच्छिन्नके साथ 'चक्षुःसंयुक्तसमवाय' सम्बन्धको कारणता कहनी चाहिये. एवं
द्रव्यसमवेतसमवेत 'रूपत्त्वादि' चाक्षुष प्रत्यक्षके प्रति ( तादृश ) उद्भूतरूप
विशिष्टमहत्त्वावच्छिन्नके साथ 'चक्षुःसंयुक्त समवेत समवायसम्बन्धको कारणता
कहनी उचित है. इस रीतिसे परमाणु नीलमें नीलत्वादि प्रत्यक्षकी आपत्ति नहा बन
सकती; क्योंकि परमाणुओंमें महत्त्व परिमाणके न होनेसे परमाणुनिष्ठ चक्षुःसंयोगमहत्त्वा
वच्छिन्नके साथ नहींहै; ऐसेही वायुआदिकोंमें सत्त्वादिचाक्षुषप्रत्यक्षकी आपत्तिभी नहीं
बन सकती क्योंकि वायुआदिनिष्ठ चक्षुःसंयोग रूपावच्छिन्नके साथ नहीं है.
एवं यत्र घटस्य मध्यावच्छेदेनालोकसंयोगः चक्षुःसंयोगस्तु बाह्या
वच्छेदेन तत्र घटप्रत्यक्षाभावादालोकसंयोगावच्छिन्नत्वं चक्षुः-
संयोगे विशेषणं देयम् । एवं द्रव्यस्पार्शनप्रत्यक्षे त्वक्संयोगः
कारणम्, द्रव्यसमवेतस्पार्शनप्रत्यक्षे त्वक्संयुक्तसमवायः, द्रव्य-
समवेतसमवेतस्पार्शनप्रत्यक्षे त्वक्संयुक्तसमवेतसमवायः कारण
म् । अत्रापि महत्त्वावच्छिन्नत्वमुद्भूतस्पर्शावच्छिन्नत्वं च पूर्व-
१ (पूर्ववदेवेति) अर्थात् परमाणुघटित त्वक्सन्निकर्षसे स्पर्शत्व स्पार्शनके वारणार्थ
महत्त्वावच्छिन्नका तथा प्रभावटित सन्निकर्षसे स्पर्शत्व स्पार्शन वारणार्थ उद्भूतस्पर्शाव-
च्छिन्नत्वादिविशेषणोंकाभी पूर्ववत् निवेश अवश्य करना चाहिये.