न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
-इन्द्रियं करणं मतम् ॥ ५८ ॥
भाषा-पूर्वोक्त षड्विध प्रत्यक्षमें नेत्रादिइन्द्रियोंको असाधारण कारण-
ता है ॥ ५८ ॥
इन्द्रियमिति।अत्रापि षड्विध इत्यनुषज्यते।इन्द्रियत्वं तु न जातिः
पृथिवीत्वादिना साङ्कर्यप्रसङ्गात् । किंतु शब्देतरोद्भूतविशेष-
गुणानाश्रयत्वे सति ज्ञानकारणमनःसंयोगाश्रयत्वम् । आत्मन्य-
तिव्यातिवारणाय सत्यन्तम्, उद्भूतविशेषगुणस्य शब्दस्यश्रोत्रे
सत्त्वाच्छब्देतरेति, विशेषगुणस्य रूपादेश्चक्षुषि सत्त्वादुद्भूतेति ।
उद्भूतत्वं न जातिः शुक्लत्वादिना सङ्करात् ।
भाषा-इन्द्रियोंमें इन्द्रियत्वरूप धर्मका पृथिवीत्व जलत्वादिधर्मोंके साथ संकर है
इसलिये 'इन्द्रियत्व' धर्मजातिरूप नहींहै,किन्तु सखण्डोपाधिरूप है.बहुपदार्थघटित
धर्मका नाम सखण्डोपाधि है.यह 'धर्म' शब्दसे इतर ( रूपसुखादि ) उद्भूत विशे-
षगुणके अनाश्रय तथा ज्ञानके कारणीभूत मनःसंयोगके आश्रयरूप इन्द्रियमें रहता
है यही इन्द्रियका निर्वचन है, ज्ञान कारणीभूत मनःसंयोगका आश्रय आत्माभी है
उसके वारणार्थ 'शब्देतरोद्भूत विशेषगुणानाश्रत्वे सति' कहा. आत्मा शब्देतरउद्भूत
विशेषगुण 'सुखादि' का आश्रय है,यति दोष नहीं. शब्दरूप उद्भूतविशेषगुण श्रोत्र
इन्द्रियमें है. श्रोत्र संग्रहार्थ शब्देतरउद्भूत गुणका अनाश्रय कहा, अनुद्भूतरूपादि
विशेषगुण नेत्रादि इन्द्रियोंमें विद्यमान हैं; उनके वारणार्थ उद्भूतविशेषगुण कहा
अर्थात् 'उद्भूत' पदके न देनेसे नेत्रादि इन्द्रियोंमें अव्याप्ति होगी. उद्भूतत्वरूप
धर्मका शुक्लत्वादि धर्मोंके साथ संकर है. इसलिये 'उद्भूतत्व' धर्मजातिरूप
नहीं है.
न च शुक्लत्वादिव्याप्यं नानैवोद्भूतत्वमिति वाच्यम् । उद्भूतरूप
१ संकरका प्रकार यह है कि-पृथिवीत्वरूप धर्मको छोड़कर इन्द्रियत्व धर्म नेत्रादिकोंमें
रहताहै और इन्द्रियत्वरूप धर्मको छोड़कर पृथिवीत्वरूप धर्म घटादिपृथिवीमें रहताहै. एवं पृथिवीत्व
इन्द्रियत्व उभयधर्मका एकत्र समावेश घ्राणेन्द्रियमें है-इति. ऐसेही जलत्वादि धर्मोंके साथ
संकर जानलेना.
२ संकरका प्रकार यह है कि-शुक्लत्वधर्मको छोड़कर उद्भूतत्व उद्भूतगन्धमें है एवं उद्भूतत्व
धर्मको छोड़कर शुक्लत्वधर्म अनुद्भूत शुक्लमें है एवं धर्मद्वयका समावेश उद्भूतशुक्लमें है. ऐसेही
नीलत्वादिधर्मोंके साथ जानलेना.