न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. १०३
वत्त्वादिना चाक्षुषादौ जनकतानुपपत्तेः । किंतु शुक्लत्वादिव्या-
प्यमनुद्भूतत्वं नाना तदभावकूटश्चोद्भूतत्वम्, तच्च संयोगादावपि ।
तथा च शब्देतरोद्भूतगुणः संयोगादिश्चक्षुरादेरस्त्यतो विशेषे
ति । कालादिवारणाय विशेष्यदलम् ।
शंका-शुक्लत्वादि जातियोंके व्याप्यधर्म उद्भूतत्व अनेक माने तो क्या दोष है?
समाधान-यदि अनेक मानें तो चाक्षुषप्रत्यक्षमें उद्भूतरूपत्वादि धर्मोंसे जनकता
नहीं बन सकेगी क्योंकि उन उद्भूतरूपत्वादिकोंको यदि एक एक व्यक्तिको कार-
णतावच्छेदक मानें तो एक व्यक्तिके सत्त्वकालमेंभी द्वितीय ‘ उद्भूतत्व ’ व्यक्तिका
अभाव होनेसे उद्भूतरूपत्वादिकोंका चाक्षुषप्रत्यक्षके साथ कार्यकारणभावका व्यभिचार
होगा और अनेक उद्भूतत्व किसीएक व्यक्तिमेंभी नहीं रहसकते इसलिये कारणताके
अवच्छेदक नहीं होसकते; ( किन्तु ) परन्तु ऐसा कह सकते हैं कि शुक्लत्वादिधर्मोंके
व्याप्य ‘ अनुद्भूतत्व ’ धर्म अनेक हैं और उन सबके अभावका पुंजरूप एक
‘ उद्भूतत्व ’ है, वह उद्भूतत्वरूप धर्म संयोगादिगुणोंमेंभी है, एवं शब्दसे इतर उद्भूत
गुणसंयोगादिक नेत्रादि इन्द्रियोंमें विद्यमान हैं, इसलिये ‘ उद्भूतविशेषगुण ’ कहा.
संयोगादि विशेषगुण नहीं ह यांते अव्याप्तिरूप दोष नहीं है. शब्देतरउद्भूत विशेष
गुणके अनाश्रय कालादिभी हैं उनके वारणार्थ उत्तर विशेष्यदल कहाहै. कालादि
शब्देतरउद्भूतविशेषगुणके अनाश्रयहैंभी परन्तु ज्ञानकारणीभूत मनःसंयोगके आश्रय
नहींहैं यांते दोष नहीं.
इन्द्रियावयवविषयसंयोगस्यापि प्राचां मते प्रत्यक्षजनकत्वादिन्द्रि
यावयववारणाय, कालादौ रूपाभावप्रत्यक्षे सन्निकर्षघटकतया
कारणीभूतचक्षुःसंयोगाद्याश्रयस्य कालादेश्च वारणाय मनः
पदम् । ज्ञानकारणमित्यपि तद्वारणाय । करणमिति । असाधा-
रणं कारणं करणम् । असाधारणत्वं व्यापारवत्त्वम् ॥ ५८ ॥
भाषा-प्राचीन आचार्य नेत्रादिइन्द्रियके अवयवोंको तथा घटादि विषयके परस्पर
संयोगकोभी प्रत्यक्षके प्रति कारण मानतेहैं पूर्वोक्त इन्द्रियके लक्षणकी इन्द्रियके एकदेश
अवयवमें प्रसक्तिवारणार्थ ‘ मनः ’ पदका निवेश है. अथवा नवीन आचार्य कालादि-
कोंमें रूपाभावका चाक्षुष प्रत्यक्ष मानते हैं उसमें कारणीभूत चक्षुःसंयोगका आश्रय
होनेसे संबन्धका सम्पादक कालभी है । इसलिये “ काले रूपं नास्ति ” इ