न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
रूपाभावात्मक ज्ञानका कारण जो ‘ चक्षुःकाल संयोग ’ उसका आश्रय कालभी है
उसमें पूर्वोक्त लक्षण अतिप्रसक्त होगा. उसके वारणार्थ ‘ मनः ’ पदका निवेश है.
‘ज्ञानकारण’इस पदके न देनेसेभी पूर्वोक्त सम्पूर्ण लक्षणकी कालादिकोंमें अतिप्रसक्ति
होती है; इसलिये सार्थक है. ‘ करणमिति ’ यह मूलकरिकाकी प्रतीक है असाधारण
कारणका नाम करण है, व्यापारवालेका नाम असाधारण कारण है.
विषयेन्द्रियसम्बन्धो व्यापारः सोऽपि षड्विधः ।
भाषा-पूर्वोक्त षड्विध प्रत्यक्षमें घटादिविषयोंके साथ नेत्रादिइन्द्रियोंका सम्बन्ध
रूप व्यापारभी षट्प्रकारका है.
विषयेन्द्रियेति । व्यापारः सन्निकर्षः ।
भाषा-प्रकृतमें व्यापार नाम सन्निकर्ष विशेषका है.
षड्विधं संनिकर्षमुदाहरणद्वारा दर्शयति, द्रव्यग्रह इति-
भाषा-उस छः प्रकारके सन्निकर्षको मूलकार उदाहरण पूर्वक दिखलाता है-
द्रव्यग्रहस्तु संयोगात्संयुक्तसमवायतः ॥ ५९ ॥
द्रव्येषु समवेतानां,तथा तत्समवायतः ।
तत्रापि समवेतानां,शब्दस्य समवायतः ॥ ६० ॥
तद्वृत्तीनां समवेतसमवायेन तु ग्रहः ।
प्रत्यक्षं समवायस्य विशेषणतया भवेत् ॥६१॥
विशेषणतया तद्वदभावानां ग्रहो भवेत् ।
भाषा-घटादि द्रव्यका ग्रहणसंयोग सम्बन्धसे होता है; द्रव्यसमवेत रूपादिकोंका
ग्रहण ‘संयुक्तसमवाय’ सम्बन्धसे होता है॥५९॥ एवं द्रव्यसमवेत समवेत रूपत्वादि-
कोंका ग्रहण ‘संयुक्तसमवेत समवाय’ सम्बन्धसे होता है; शब्दका ‘ समवाय ’
सम्बन्धसे ग्रहण होता है ॥ ६० ॥ शब्दमें रहनेवाले शब्दत्वादि धर्मोंका ‘समवेत
समवाय’ सम्बन्धसे ग्रहण होत है; समवायका ‘ विशेषणता ’ सम्बन्धसे प्रत्यक्ष
होता है ॥ ६१ ॥ तथा अभावोंका ‘ विशेषणता ’ सम्बन्धसे प्रत्यक्ष होता है.
द्रव्यप्रत्यक्षमिन्द्रियसंयोगजन्यम् । द्रव्यसमवेतप्रत्यक्षमिन्द्रियसं-
युक्तसमवायजन्यमेवमग्रेऽपि। वस्तुतस्तु द्रव्यचाक्षुषं प्रति चक्षुः-
संयोगःकारणम्। द्रव्यसमवेतचाक्षुषं प्रति चक्षुःसंयुक्तसमवायः ।