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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 132, कुल 350 में से

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पृष्ठ 132

कारणता है ५ । इस प्रकरणमें सब जगह प्रत्यक्षशब्दसे लौकिकप्रत्यक्षहीका ग्रहण
करना चाहिये (वक्ष्यमाण) आगे कथनीय अलौकिकप्रत्यक्ष तो चक्षुरादि इन्द्रियस-
म्बन्धसे बिनाभी होसकता है. एवं स्वात्म प्रत्यक्षके प्रति मनःसंयोगको कारणता
है, स्वात्मसमवेत 'सुखादि' मानस प्रत्यक्षके प्रति मनःसंयुक्त समवायसम्बन्धको
कारणता है, स्वात्मसमवेतसमवेत 'सुखत्वादि' मानसप्रत्यक्षके प्रति मनःसंयुक्त
समवेतसमवाय सम्बन्धको कारणता है ६।
अभावप्रत्यक्षे समवायप्रत्यक्षे चेन्द्रियसम्बद्धविशेषणताहेतुः ।
वैशेषिकमते तु न समवायः प्रत्यक्षः । अत्र यद्यपि विशेषणता
नानाविधा ।
भाषा-अभावका तथा समवायका 'इन्द्रियसम्बद्धविशेषणता' सम्बन्धसे प्रत्यक्ष
होताहै नेत्रादिसम्बद्धभूतलादिकोंमें घटादिकोंका अभाव तथा समवेत रूपादिकोंका
समवाय उभय विशेषणीभूत हैं; इसलिये इन्द्रियसम्बद्ध जो भूतलादि उसमें विशे-
षणीभूत अभावादिकोंका 'इन्द्रियसम्बद्धविशेषणता'से ग्रहण होता है; परन्तु समवाय-
का प्रत्यक्ष वैशेषिकसिद्धान्तमें स्वीकृत नहीं है. इस प्रकरणमें वह अभावनिरूपित
विशेषणता यद्यपि अनेक प्रकारकी है.
तथाहि । भूतलादौ घटाद्यभावः संयुक्तविशेषणतया गृह्यते,
संख्यादौ रूपाद्यभावः संयुक्तसमवेतविशेषणतया, संख्यात्वादौ
रूपाद्यभावः संयुक्तसमवेतसमवेतविशेषणतया,शब्दाद्यभावःके-
वलश्रोत्रावच्छिन्नविशेषणतया,कादौ खत्वाद्यभावः श्रोत्रावच्छि-
न्नसमवेतविशेषणतया, एवं कत्वावच्छिन्नाभावे खत्वाभावादिकं
विशेषणविशेषणतया, एवं घटाभावादौ पटाद्यभावः चक्षुःसंयुक्त
विशेषणविशेषणतया ।
भाषा-जैसे भूतलादिमें घटाभावका प्रत्यक्ष संयुक्त विशेषणता सम्बन्धसे होता
है, संख्यादिकोंमें रूपादिका अभाव 'संयुक्तसमवेत विशेषणता' सम्बन्धसे ग्रहण होता
है. एवं संख्यात्वादि धर्मोंमें रूपादिका अभाव 'संयुक्तसमवेत समवेत विशेषणता'
सम्बन्धसे ग्रहण होताहै.शब्दका अभाव केवल'श्रोत्रावच्छिन्न विशेषणता'से ग्रहण होता
है. एवं ककारादि वर्णोंमें खत्वादि धर्मोंका अभाव 'श्रोत्रावच्छिन्न समवेत विशेषणता'
सम्बन्धसे ग्रहण होता है. एवं कत्वावच्छिन्नाभावमें खत्वादिधर्मोंका अभाव 'विशेषण