न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
८४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
एतेन प्रकृतिः कर्त्री, पुरुषस्तु पुष्करपलाशवन्निर्लेपः किंतु चेत-
नः, कार्यकारणयोरभेदात्कार्यनाशे सति कार्यरूपतया नाशः
स्यादित्यकारणत्वं तस्य।
भाषा—'एतेन' इस पदका 'इति मतमपास्तम्' इस अग्रिम पाठके साथ सम्बन्ध
है; अर्थात् 'एतेन' इस पूर्वोक्त युक्तिद्वारा आत्माको ज्ञानाधिकरण सिद्ध करनेसे
तथा आगे कथनीय युक्तिसे (इति मतं) सांख्यशास्त्रमें कहा कपिलमुनिका मतभी
(अपास्तम्) खण्डन किया है. सांख्यीके मतमें मूलप्रकृतिही आद्यकर्तारूप है और
(पुरुष) जीवात्मा जलगत कमलपत्रकी तरह अलिप्त है; परन्तु चेतन है. इस
मतमें कार्यका तथा उपादानकारणका परस्पर अभेद है कार्यके नाश होनेसे कार्य-
रूपहीसे कारणकाभी नाश मानना पड़ता है इसलिये पुरुष किसी कार्यका उपादा-
नकारण नहीं, याते विनाशीभी नहीं.
बुद्धिगतचैतन्याभिमानादन्यथाऽनुपपत्त्या तत्कल्पनम्
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ८५
भाषा-उस बुद्धिका नेत्रादि इंद्रियरूप प्रणालिका द्वारा ज्ञानरूप परिणाम घटादि
पदार्थोंके साथ सम्बंध है. पुरुषमें कर्तृत्व-'मैं कर्ता हूं' यह अभिमान, एवं बुद्धिमें
चैतन्य ' मैं चेतनाहूं ' यह अभिमान बुद्धिका तथा पुरुषका परस्पर भेद न जाननेसे
है. " ममेदं कर्तव्यम्-अर्थात् मेरेको यह कार्य करने योग्य है " इत्याकारका
बुद्धिमें "मम, इदं, कर्तव्यम्" ये तीन अंश हैं. उनमें प्रथम अंश ( पुरुष ) जीवा-
त्माका है; वहभी जैसे ( दर्पण ) शीशेके स्वच्छ होनेसे उसमें मुखकी प्रतीति
मिथ्याही होजाती है, वैसेही बुद्धिके स्वच्छ होनेसे पुरुष प्रतिबिंबद्वारा ( अतात्त्विक )
झूठा ( उपराग ) सम्बंध रूप है. एवं द्वितीय अंश विषयका है. वही बुद्धि ( इंद्रिय )
नेत्रादिद्वारा परिणामको प्राप्त हुई विषयको ग्रहण करती है; जैसे शीशेपर ( निः-
श्वासाभिहत ) फूत्कार मारनेसे ( मलिणिमा ) छाईका सम्बन्ध ( तात्त्विक ) सच्चा
हो जाता है; वैसेही बुद्धिका परिणाम रूपसे विषयके साथ सम्बन्ध वास्तव है. एवं
तृतीय व्यापार अंशका भान है. वह बुद्धिका अपना तथा तात्त्विक है.
तेनांशत्रयवती बुद्धिस्तत्परिणामेन ज्ञानेन पुरुषस्यातात्त्विकः स-
म्वन्धो दर्पणमलिनिमैव मुखस्योपलब्धिरुच्यते। ज्ञानवत् सुखदुः-
खेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मा अपि बुद्धेरेव कृतिसामानाधिकरण्येन
प्रतीतेः ।
भाषा--इस रीतिसे बुद्धि तीन अंशवाली है और बुद्धिके परिणामरूप ज्ञानके साथभी
पुरुषका अतात्त्विक संबंध है. जैसे-शीशेकी छाईके साथ मुखका संबंध वस्तुतः नहीं
किन्तु मिथ्या है; वैसेही बुद्धि परिणाम ज्ञानके साथभी पुरुषका सम्बन्ध वास्तव
नहीं किन्तु अतात्त्विक है. उसी अतात्त्विक सम्बन्धकी सांख्यशास्त्रमें ( उपलब्धि )
संज्ञा कही है. जैसे-परिणामी ज्ञान बुद्धिका धर्म है, वैसेही सुख दुःख इच्छा द्वेष
प्रयत्न, धर्म और अधर्म ये सातभी बुद्धिकीके धर्म हैं; क्योंकि इन सबकी " अहं
कर्त्ता, अहंसुखी" इत्यादि प्रत्ययोंसे ( कृति ) प्रयत्नके साथ एकाधिकरणत
प्रतीत होती है.
न च बुद्धिश्चेतना, परिणामित्वात्, इति मतमपास्तम्। कृत्यदृष्ट-
भोगानामिव चैतन्यस्यापि सामानाधिकरण्यप्रतीतेस्तद्भिन्ने
मानाभावाच्च ।
भाषा -और प्रयत्न बुद्धिका मुख्य धर्म है. वह बुद्धि(परिणामिनी)अनित्य धर्मोंवाली
होनेसे चिद्रूपा नहीं है, यह सब सांख्याचार्यका मत है. पूर्वोक्त तथा अग्रे मयुक्ती
८६ -न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
योंसे यहभी खण्डित है; क्योंकि जैसे "अहं कर्ता, अहं धार्मिकः, अहं भोक्ता" इत्या-
दि प्रत्यय एकाधिकरणमें प्रतीत होते हैं वैसेही 'अहं चेतनः' यह प्रत्ययभी उसी
अधिकरणमें प्रतीत होता है याते ( तद् ) कर्तासे भिन्न चेतन माननेमें कोई
प्रमाण नहीं है.
चेतनोऽहं करोमीति प्रतीतिश्चैतन्यांशे भ्रम इति चेत्। कृत्यंशेऽपि
किं नेष्यते । अन्यथा बुद्धेर्नित्यत्वे मोक्षाभावोऽनित्यत्वे तत्पूर्व-
मसंसारापत्तिः ।
सांख्यी-शंका-'चेतनोऽहं करोमि' यह प्रतीति चेतनअंशमें भ्रमरूपा है
क्योंकि चेतन 'पुरुष' है उसके सम्बन्धसे प्रतिबिम्ब ग्रहण करतीहुई बुद्धि अपनेमें
मिथ्याही चेतनताका अभिमानकरती है. नैयायिक-यदि पूर्वोक्ता प्रतीति चेतनां-
शमें भ्रमरूपा है तो प्रयत्न अंशमेंभी भ्रमरूपाही माननी उचितहै, क्योंकि उक्तप्रतीतिमें
दोनोंका अधिकरण एकही प्रतीत होता है; ( अन्यथा ) यदि कर्ता तथा चेतनका
परस्परभेद मानों तो हम पूँछतेहैं कि-वह बुद्धि आपकी नित्या है अथवा अनित्या है?
यदि नित्या कहो तो मोक्षका अभावहोगा क्योंकि बुद्धिरूपकर्तासे भिन्न चेतनमें सुखदुःख
का अभाव होनेसे उसमें बन्ध मोक्ष व्यवहार अनुपपन्न है. शेष रहा बुद्धिरूप कर्ता
तो इसीके सत्त्व तथा असत्त्वसे बन्ध तथा मोक्ष मानना होगा एवं यदि बुद्धिको
नित्य मानें तो उसके सत्त्व निबन्धन संसारभी नित्यही मानना होगा; एवं मोक्षाभाव
होगा. एवं यदि बुद्धिको अनित्य मानो तो वह उत्पत्तिवालीभी माननी होगी क्योंकि
अजन्य भावपदार्थका नाश नहीं होता. एवं बुद्धिकी उत्पत्तिसे प्रथमकालमें
संसार नहीं हुआ चाहिये अर्थात् बुद्धिकी उत्पत्तिसे पूर्व बुद्धिमें अदृष्ट नहीं रहसकते
अदृष्टोंके न होनेसे बुद्धिकी उत्पत्ति नहीं होसकती. एवं संसार कदापि न
होना चाहिये.
नन्वचेतनायाः प्रकृतेः कार्यत्वाद्वुद्धेरचैतन्यं, कार्यकारणयो-
स्तादात्म्यादिति चेत् । न, असिद्धेः । कर्तुर्जन्यत्वे मानाभावा-
द्वीतरागजन्मादर्शनादनादित्वम्। अनादेर्नाशासम्भवान्नित्यत्वम्।
तत् किं प्रकृत्यादिकल्पनेन ।
सांख्यी-हमारे मतमें कार्यकारणका परस्पर अभेद है; इसलिये अचेतनप्रकृतिका
कार्यरूप बुद्धिभी चेतन नहीं है. नैयायिक-तुम्हारा कथन असिद्धहै; क्योंकि
बुद्धि प्रकृतिका कार्य नहीं है और कर्ता नियमसे जन्य होता है, इसमें कोई
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ८७
अनुकूल तर्कभी नहीं है. प्रत्युत "वीतरागजन्मादर्शनात्-३ अ, १ आ, २५
सू०-अर्थात् विरक्त पुरुषका जन्म नहीं होता किंतु रागवाले पुरुषका जन्म होता है "
इस गौतमसूत्रसे कर्त्ता अनादि प्रतीत होता है, एवं भावरूप अनादिका नाश नहीं
होता; याते कर्त्ता नित्य मानना उचित है, एवं अप्रमाणिक प्रकृति आदि पदार्थोंकी
कल्पनासे क्या लाभ है ?
नच "प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । अहङ्कारविमू-
ढात्मा कर्त्ताहमिति मन्यते" इत्यनेन विरोध इति वाच्यम्, प्रकृ-
तेरदृष्टस्य गुणैरदृष्टजन्यैरिच्छादिभिः कर्त्ताऽहं कर्त्ताहमेवेत्यस्य
तदर्थत्वात् । "तत्रैवं सति कर्त्तारमात्मानं केवलं तु यः" इ-
त्यादि वदता भगवता प्रकटीकृतोऽयमुपरिष्टादाशय इति संक्षेपः।
सांख्यी-श्रीकृष्णदेवने ( गीताके तृतीयाध्यायके २७ श्लोकमें ) यह कहा कि-
"क्रियमाण यावत् कर्म प्रकृतिके सत्त्वादि गुणोंसे होते हैं उन कर्मोंको 'मैं कर्त्ता हूं'
इत्याकारक अहंकारसे विमूढ चित्तवाला जीवात्मा पुरुष 'मैंही कर्त्ताहूं' ऐसा मानताहै"
इस भगवद्वाक्यसे आपके कथनका विरोध होगा, क्योंकि इस वाक्यसे भगवान्ने
पुरुषको कर्त्ता नहीं मानाहै. नैयायिक-इस भगवद्वाक्यमें 'प्रकृति' नाम अदृष्टोंका
है, 'गुण' नाम अदृष्टजन्य इच्छादिकोंका है. एवं अदृष्टजन्य इच्छादि गुणोंद्वारा 'मैंही
कर्त्ता हूं' ऐसे अहंकार विमूढ होकर जीवात्मा मानताहै. इस वाक्यका येहा अर्थ
है. इस वाक्यसे भगवान्ने यह नहीं कहा, कि जीवात्मा कर्त्ता नहीं है
किन्तु यह कहा है कि-अकेला जीवात्मा कर्त्ता नहीं है; क्योंकि इसी अर्थको भग-
वान्ने अष्टादशाध्यायके १५ वें तथा १६ वें श्लोकमें लिखा है. वहां ऐसे कहा है कि
"आश्रय १ कर्त्ता २ अनेकप्रकारके करण ३ अनेक प्रकारकी चेष्टा ४ और जीवोंके
अदृष्ट ५,"यह पांचों मिलकर कार्यमात्रके प्रति कर्त्ता हैं. एवं इन पांचोंमेंसे जो पुरुष
केवल अपने आपकोही कर्त्ता मानताहै उस मलीनबुद्धि पुरुषको यथार्थ ज्ञान नहीं है
इन वाक्योंसे भगवान्का आशयै जीवके कर्त्तापनेमे स्पष्ट प्रतीत होता है यह संक्षेपसे
सांख्यमत खण्डन कियाहै.
धर्माधर्माश्रयोऽध्यक्षो विशेषगुणयोगतः ॥ ४९ ॥
भाषा-आत्मा धर्म तथा अधर्मका आश्रय है. एवं सुखदुःखादि विशेष गुणोंके
सम्बन्धसे आत्माका प्रत्यक्षभी हो सकताहै ॥ ४९ ॥
८८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
धर्माधर्माश्रय इति । आत्मेत्यनुषज्यते । शरीरस्य तदाश्रयत्वे
देहान्तरकृतकर्मणां देहान्तरेण भोगानुपपत्तेः । विशेषगुणयो-
गत इति । योग्यविशेषगुणसम्बन्धेनात्मनः प्रत्यक्षं भवति, न
त्वन्यथा । अहंजानेहंकरोमीत्यादि प्रतीतेः ॥ ४९ ॥
भाषा-यहां 'आत्मा' शब्दका सम्बन्ध पीछे ग्रन्थसे करलेना. यदि शरीरहीको
धर्माधर्मका आश्रय मानें तो (देहान्तर) पुरुषशरीरसे किये कर्मोंका (देहान्तर)
श्वादिशरीरसे भोगनही बनसकेगा.प्रत्यक्षके योग्य ज्ञानसुखादि विशेष गुणोंके सम्बन्ध-
हीसे जीवात्माका प्रत्यक्ष होताहै. विशेषगुणोंके सम्बन्धसे विना नहीं होता. 'मैं जान
ताहूं, मैं करताहूं' इत्यादि प्रतीतियोंसे ज्ञानप्रकारक प्रयत्नादि प्रकारक जीवात्माका
भान होताहै ॥ ४९ ॥
प्रवृत्त्याद्यनुमेयोऽयं रथगत्येव सारथिः ।
भाषा-जैसे रथकी गतिसे रथवाहीका अनुमान होताहै वैसेही यह आत्मा दूसरे
पुरुषके शरीरमें चेष्टाद्वारा अनुमेय है.
प्रवृत्तीति । अयमात्मा परदेहादौ प्रवृत्त्यादिनाऽनुमीयते । प्रवृ-
त्तिरत्र चेष्टा, ज्ञानेच्छाप्रयत्नादीनां देहेऽभावस्योक्तप्रायत्वात् ।
चेष्टायाश्च प्रयत्नसाध्यत्वाच्चेष्टया प्रयत्नवानात्माऽप्यनुमीयत इति
भावः । तत्र दृष्टान्तमाह । रथेति । यद्यपि रथकर्म चेष्टा न भ-
वति तथापि तेन कर्मणा सारथिर्यथाऽनुमीयते तथा चेष्टात्म-
केन कर्मणा परात्माऽपीति भावः ।
भाषा-इस आत्माका दूसरे पुरुषकी देहमें प्रवृत्तिनिवृत्तिसे अनुमान होताहै.
यहां 'प्रवृत्ति' शब्दसे चेष्टाका ग्रहण है. ज्ञान इच्छा प्रयत्नादि गुणोंका शरीरमें अभाव
“शरीरस्य न चैतन्यं” इत्यादि ग्रन्थसे पीछे कह चुकेहैं और चेष्टा प्रयत्नसाध्य-
होती है इसलिये चेष्टावत्वरूप हेतुसे प्रयत्नवाले आत्माका अनुमानभी होसकताहै.
यहां रथसारथिका दृष्टान्तरूपसे कथन है. यद्यपि दृष्टान्तमें रथकी क्रिया चेष्टा नहीं है;
क्योंकि चेष्टा नाम 'हिताहितपरिहारार्था क्रिया' का है. वह क्रिया सिवाय चेतनके
रथादि जड़पदार्थोंमें होही नहीं सकती; तथापि जैसे रथकी क्रियासे रथवाहीका
अनुमान होताहै वैसेही चेष्टारूप कर्मसे आत्माका अनुमानभी होसकताहै.
अहङ्कारस्याश्रयोऽयं मनोमात्रस्य गोचरः ॥ ५० ॥
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ८९
भाषा-वह आत्मा अहंकारका आश्रय है, एवं मनोमात्र इन्द्रियसे आत्माका ग्र-
हण होता है ॥ ५० ॥
अहङ्कारस्येति । अहङ्कारोऽहमिति प्रत्ययस्तस्याश्रयो विषय
आत्मा, न शरीरादिरिति।मन इति। मनोभिन्नेन्द्रियजन्यप्रत्यक्षा-
विषयो मानसप्रत्यक्षविषयश्चेत्यर्थः। रूपाद्यभावेनेन्द्रियान्तरा-
योग्यत्वात् ॥ ५० ॥
भाषा-अहंकार नाम ‘अहं’ इत्याकारक प्रत्ययका है. इस प्रत्ययका विषय
आत्माही है; शरीरादि नहीं बन सकते. एवं मनसे भिन्न सभी इन्द्रियोंका अविषय है,
केवल मानस प्रत्यक्षका विषय है; क्योंकि मनसे भिन्न सभी इन्द्रियरूप रसादिवाले
पदार्थको ग्रहण करतेहैं और आत्मामें रूपरसादि गुण नहीं हैं; याते नेत्रादि इन्द्रियों-
द्वारा प्रत्यक्षयोग्य आत्मा नहींहै ॥ ५० ॥
विभुर्बुद्ध्यादिगुणवान्-
भाषा-वह आत्मा व्यापक है तथा बुद्धिआदि गुणोंवाला है.
विभुरिति । विभुत्वं परममहत्परिमाणवत्त्वं, तच्च पूर्वमुक्तमपि
स्पष्टार्थमुक्तम् । बुद्ध्यादीति । बुद्धिसुखदुःखेच्छादयश्चतुर्दश
गुणाः पूर्वमुक्ता वेदितव्याः ।
भाषा--विभु नाम परममहत् परिमाणवालेका है. यह यद्यपि “कालखात्मदिशां
सर्वगतत्वं परमं महत् ( २६ का० ) ” इस ग्रन्थसे कह चुके हैं, तथापि स्पष्टार्थ
बोधनके लिये उसी अर्थको फिर कहाहै. बुद्ध्यादि पदसे “बुद्ध्यादिषट्कं ३२” इत्या-
दि कारिकोक्त आत्माके १४ गुण जान लेने.
अत्रैव प्रसङ्गाद्बुद्धेः कतिपयं प्रपञ्चं दर्शयति, बुद्धिस्त्विति-
भाषा-यहांही बुद्धिके प्रसंगसे ग्रंथकार बुद्धिके कईएक भेद दिखलाता है-
- बुद्धिस्तु द्विविधा मता ।
अनुभूतिः स्मृतिश्च स्यादनुभूतिश्चतुर्विधा ॥ ५१ ॥
भाषा--एवं वह बुद्धि दो प्रकारकी है; एक अनुभवरूपा है और दूसरी स्मृतिरूपा
है. एवं अनुभवरूपा बुद्धि पुनः चार प्रकारकी है ॥ ५१ ॥
द्वैविध्यं व्युत्पादयति, अनुभूतिरिति । अनुभूतिश्चतुर्विधेति । ए-
तासां चतसृणां करणानि चत्वारि “प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः
प्रमाणानि” इति सूत्रोक्तानि वेदितव्यानि ॥ ५१ ॥
भाषा--उस बुद्धिके द्वैविध्यको प्रतिपादनकरताहै अर्थात् वह बुद्धि पहले अनुभूति
तथा स्मृतिभेदसे दो तरहकी है. उनमें अनुभूति पुनः चार तरहकी है. इन चारों
बुद्धियोंके साधन “प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि ३” अर्थात् प्रत्यक्ष १
अनुमान २, उपमान ३, शब्द ४ यह गौतमसूत्रोक्त चारप्रमाण जानने चाहिये ॥५१॥
प्रत्यक्षमप्यनुमितिरस्तथोपमितिशब्दजे ।
भाषा-एक प्रत्यक्षरूपा है, दूसरी अनुमितिरूपा है, तीसरी उपमितिरूपा है
और चौथी शब्दजन्या है.
प्रत्यक्षमिति । इन्द्रियजन्यं ज्ञानं प्रत्यक्षम्। यद्यपि मनोरूपेन्द्रिय-
जन्यं सर्वमेव ज्ञानम्, तथापीन्द्रियत्वेन रूपेणेन्द्रियाणां यत्र
ज्ञाने कारणत्वं तत्प्रत्यक्षमिति विवक्षितम्। ईश्वरप्रत्यक्षं तु न ल-
क्ष्यम्। “इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि
व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्” इति सूत्रे तथैवोक्तत्वात् ।
भाषा-नेत्रादि इन्द्रियसे उत्पन्न हुए ज्ञानका नाम प्रत्यक्ष है. यद्यपि मनोरूप
इन्द्रियजन्यता अनुमिति आदि यावत् ज्ञानोंकी है; यान्ते पूर्वोक्त लक्षण अतिव्याप्ति
ग्रस्त है, तथापि इन्द्रियत्वरूपसे इन्द्रियोंको जिस ज्ञानके प्रति कारणता है वह
ज्ञान प्रत्यक्ष है 'इन्द्रियत्व' का स्वरूप “शब्देतरोद्भूतविशेषगुणानाश्रयत्वे सति ज्ञान-
कारणमनःसंयोगाश्रयत्वम्” इत्यादि ग्रन्थसे ५८ कारिकाकी व्याख्यामें ग्रन्थकार
स्वयं लिखेगा. ज्ञानमात्रके प्रति मनको कारणता इन्द्रियत्वेन रूपेण नहीं किन्तु
मनस्त्वेन रूपेण विशेषधर्मसेहै. सुखादि साक्षात्के प्रति मनको इन्द्रियत्वेन रूपेण कारणता
है; याते मनमें इन्द्रियत्व धर्मकी हानिभी नहीं. प्रकृतमें जीवके जन्य प्रत्यक्षका विचार है
“ईश्वरका प्रत्यक्षजन्य नहीं किन्तु नित्य है याते पूर्वोक्त लक्षणका लक्ष्य नहीं है;
क्योंकि “नेत्रादि इन्द्रिय तथा घटादिरूप अर्थके परस्पर सम्बन्धसे उत्पन्न हो निर्वि-
कल्पस्वरूप हो पुनः व्यभिचार रहित निश्चयात्मक हो उस ज्ञानका नाम प्रत्यक्षहै”
इस गौतम ४ सूत्रमें जन्यप्रत्यक्षहीका लक्षण किया है.
अथवा ज्ञानाकरणकं ज्ञानं प्रत्यक्षम्, इदं लक्षणमीश्वरप्रत्यक्षसा-
धारणम् । अनुमितौ व्याप्तिज्ञानस्योपमितौ सादृश्यज्ञानस्य शा-
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासंमेता. ९१
ब्दबोधे पदज्ञानस्य स्मरणेऽनुभवस्य च हेतुत्वान्न तत्र तत्राति-
व्याप्तिः ।
भाषा-अथवा जिस ज्ञानका ज्ञानान्तर करण नहीं वह ज्ञान प्रत्यक्ष है. इस
लक्षणका लक्ष ईश्वरज्ञानभी हो सकताहै; अनुमितिरूप ज्ञानके प्रति व्याप्तिज्ञानकी
करणता है; एवं उपमितिज्ञानके प्रति सादृश्यज्ञानको करणता है; एवं शाब्दबोधके
प्रति पदज्ञानको करणता है; ऐसेही स्मृतिरूप ज्ञानके प्रति अनुभवात्मक ज्ञानकी
करणता है; याते यह सभी ज्ञान ज्ञानान्तर करणक हैं, और प्रत्यक्ष ज्ञानका कोई
ज्ञानान्तर करण नहीं है; इसलिये पूर्वोक्त लक्षणजन्य प्रत्यक्षमें समन्वय होताहै
और अनुमिति आदि ज्ञानोंमें अतिव्याप्तिभी नहीं है.
परामर्शजन्यं ज्ञानमनुमितिः । यद्यपि परामर्शप्रत्यक्षादिकं परा-
मर्शजन्यं तथापि परामर्शजन्यं हेत्वविषयकं यज्ज्ञानं तदेवानुमि
तिः। न च कादाचित्कहेतुविषयकानुमितावव्याप्तिरिति वाच्यम् ।
तादृशज्ञानवृत्त्यनुभवत्वव्याप्यजातिमत्त्वस्य विवक्षितत्वात् ।
अथवा व्याप्तिज्ञानकरणकं ज्ञानमनुमितिः ।
भाषा-व्याप्तिकरणक परामर्शद्वारा उत्पन्न हुए ज्ञानका नाम 'अनुमिति' है. य-
द्यपि परामर्शका प्रत्यक्ष तथा परामर्शका ध्वंसभी परामर्शजन्य है, क्योंकि अपने
प्रत्यक्षमें परामर्शको विषयविधया कारणता है तथा अपने ध्वंसमें परामर्शको
प्रतियोगिविधया कारणता है तथापि हेतुको न विषय करनेवाला जो परामर्श
जन्य "पर्वतो वह्निमान्" इत्याकारक ज्ञान वह अनुमिति है. परामर्शात्मक
ज्ञानमें हेतुका भान होताहै इसलिये परामर्श ज्ञानके विषय करनेवाले ज्ञानमेंभी हेतु
का भान अवश्य होगा, याते उसको अनुमिति कहना योग्य नहीं. शंका-किसी २
स्थलमें हेतुकाभी भान पक्षतावच्छेदकरूपसे अनुमितिमें होता है; जैसे "धूमवान्पर्वतो
वह्निमान्" इस अनुमितिमें धूमरूप हेतुका पक्षतावच्छेदक रूपसे भान है; याते
हेतुकोभी विषय करनेवाली इस अनुमितिमें पूर्वोक्तलक्षणकी अव्याप्ति होगी. समा०-
(तादृश) व्याप्तिविशिष्टपक्षधर्मताज्ञानजन्य जो अनुमितिआत्मक ज्ञान उस ज्ञानमें
वर्तनेवाली जो अनुभवत्वकी व्याप्य 'अनुमितित्व' जाति तादृश जातिमत्ता अनु-
मितिको विवक्षित है याते पूर्वोक्त दोष नहीं अथवा लाघवसे व्याप्ति ज्ञानकरण हो
जिस ज्ञानका वह अनुमिति ज्ञान है ऐसा लक्षण करना उचित है.
एवं सादृश्यज्ञानकरणकं ज्ञानमुपमितिः ।
९२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
भाषा-एवं सादृश्य ज्ञानकरण हो जिस ज्ञानका, वह उपमिति रूप ज्ञान है.
पदज्ञानकरणं ज्ञानं शाब्दवोधः ।
भाषा-एवंही पद ज्ञान करण हो जिस ज्ञानका, वह ज्ञान शाब्दबोध रूप है.
वस्तुतो यां कांचिदनुमितिव्यक्तिमादाय तद्व्यक्तिवृत्तित्वे सति
यां कांचिन् प्रत्यक्षव्यक्तिमादाय तदवृत्तिजातिमत्त्वमनुमिति-
त्वम् । एवं यत्किञ्चित्प्रत्यक्षादिकमादाय तद्व्यक्तिवृत्तित्वे सति
यां कांचिदनुमितिव्यक्तिमादाय तदवृत्तिजातिमत्त्वं प्रत्यक्षादि-
कं वाच्यमिति ।
भाषा-वास्तवमें तो किसी एक अनुमिति व्यक्तिमें वर्तनेवाली तथा किसी एक
प्रत्यक्ष व्यक्तिमें न वर्तनेवाली जो अनुमितित्वजाति तादृश जातिवाली अनुमिति है.
एवं किसी एक प्रत्यक्ष व्यक्तिमें वर्तनेवाली तथा किसीएक अनुमिति व्यक्तिमें न वर्तने-
वाली 'प्रत्यक्षत्व'रूपा जाति तादृश जातिवाला प्रत्यक्ष है.ऐसेही उपमिति ज्ञानका तथा
शाब्दबोधका लक्षणभी करलेना.
घ्राणजादिप्रभेदेन प्रत्यक्षं षड्विधं मतम् ॥५२॥
भाषा-पूर्वोक्त प्रत्यक्ष घ्राणज आदिभेदसे षट् प्रकारका है ॥ ५२ ॥
घ्राणजादीति। घ्राणजं रासनं चाक्षुषं स्पार्शनं श्रौतं मानसमिति
षड्विधं प्रत्यक्षम् । नचेश्वरप्रत्यक्षस्याविभजनान्न्यूनत्वम् ।
जन्यप्रत्यक्षस्यैव निरूपणीयत्वात्, उक्तसूत्रानुसारात् ।
भाषा-घ्राणद्वारा १, रसनाद्वारा २, नेत्रद्वारा ३, त्वचाद्वारा ४, श्रोत्रद्वारा ५,
और मनद्वारा ६.ऐसेछः तरहका प्रत्यक्ष है.शंका-ईश्वर प्रत्यक्षका विभाग न करनेसे
ग्रन्थकारकी न्यूनता है. समाधान-पूर्वोक्त गौतम सूत्रानुरोधसे इस प्रकरणमें जन्य
प्रत्यक्षहीका निरूपण है ॥ ५२ ॥
घ्राणस्य गोचरो गन्धो गन्धत्वादिरपि स्मृतः ।
गोचर इति । ग्राह्य इत्यर्थः ।
भाषा-गन्ध गुण तथा गन्धत्वादि जातियोंका घ्राण इन्द्रियद्वारा ग्रहण होता है.
गन्धत्वादिरिति । आदिपदात् सुरभित्वासुरभित्वपरिग्रहः। गन्ध
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ९३
स्य प्रत्यक्षत्वात्तद्वृत्तिजातिरपि प्रत्यक्षा । गन्धाश्रयग्रहणे तु घ्रा-
णस्य न सामर्थ्यमिति बोध्यम् ।
भाषा-मूलोक्त 'आदि'पदसे 'सुरभित्व' 'असुरभित्व' धर्मोंका ग्रहण है. गन्धके
प्रत्यक्ष होनेसे उसमें रहनेवाली 'गन्धत्व' जातिभी प्रत्यक्षसिद्ध है. गन्धका आश्रय जो
पृथिवीरूप द्रव्य है उसके ग्रहण करनेमें घ्राणका सामर्थ्य नहीं है-इति ।
तथा रसो रसज्ञायास्तथा शब्दोऽपि च श्रुतेः ॥५३॥
तथा रस इति । रसत्वादिसहित इत्यर्थः ।
भाषा-ऐसेही रसगुणका तथा रसत्वादि जातियोंका रसना इन्द्रियद्वारा ग्रहण
होता है. एवंही शब्दगुणका तथा शब्दत्वादि जातियोंका श्रोत्र इन्द्रियद्वारा ग्रहण
होता है.
गन्धो रसश्चोद्भूतो बोध्यः । तथाशब्दत्वादिसहितः ॥ ५३ ॥
भाषा-इस प्रकरणमें ( उद्भूत ) प्रत्यक्षके योग्य गन्ध तथा रसका ग्रहण है.
उद्भूतरूपं नयनस्य गोचरो
द्रव्याणि तद्वन्ति पृथक्त्वसंख्ये ।
विभागसंयोगपरावरत्वस्नेहद्रवत्वं परिमाणयुक्तम् ५४
क्रियां जातिं योग्यवृत्तिं समवायं च तादृशम् ।
गृह्णाति चक्षुः संबन्धादालोकोद्भूतरूपयोः ॥ ५५ ॥
भाषा-उद्भूतरूपका तथा उद्भूतरूपवाले द्रव्यका, एवं पृथक्त्व तथा संख्या
का विभागका तथा संयोगका, परत्वका तथा अपरत्वका, स्नेहका तथा द्रव्य-
त्वका, परिमाणका, प्रत्यक्षके योग्य द्रव्यकी क्रियाका, जातिका तथा समवायका ग्रहण
नेत्रइन्द्रियद्वारा होताहै. प्रकाशसम्बन्ध तथा उद्भूतरूप पूर्वोक्त प्रत्यक्षमें सहकारी
हैं ॥ ५४ ॥ ५५ ॥
उद्भूतरूपमिति। ग्रीष्मोष्मादावनुद्भूतं रूपमिति न चाक्षुषं प्रत्य-
क्षम् । तद्वन्ति उद्भूतरूपवन्ति । योग्येति । पृथक्त्वादिकमपि
योग्यव्यक्तिवृत्तितया ग्राह्यम् । तादृशं योग्यव्यक्तिवृत्तीत्यर्थः ।
चक्षुर्योग्यत्वमेव कथं तदाह, गृह्णातीति—आलोकसंयोग उद्भूतरूपं
च चाक्षुषप्रत्यक्षंप्रति कारणम् ।
भाषा—ग्रीष्मऋतुमेंहोनेवाली(उष्मा)भाफमें रूप अनुद्बुद्ध होनेसे प्रत्यक्ष नहीं होता
पृथक्त्वसंख्यादिकभी प्रत्यक्षयोग्य पदार्थमें प्रत्यक्ष होते हैं. अन्यथा नहीं. समवायभी
प्रत्यक्षयोग्य पदार्थमें प्रत्यक्ष होताहै एवं प्रकाशका संयोग तथा उद्भूतरूप नेत्रजन्य
प्रत्यक्षके प्रति कारण है.
तत्र द्रव्यचाक्षुषंप्रति तयोः समवायसम्बन्धेन कारणत्वं द्रव्यसम-
वेतरूपादिप्रत्यक्षं प्रति स्वाश्रयसमवायसम्बन्धेन । द्रव्यसमवेत-
समवेतस्य रूपत्वादेः प्रत्यक्षे स्वाश्रयसमवेतसमवायसम्बन्धे-
नेति ॥ ५४ ॥ ५५ ॥
भाषा—उसमेंभी ( द्रव्य ) घटादिप्रत्यक्षके प्रति प्रकाशसंयोग तथा उद्भूतरूपको
समवायसम्बन्धसे कारणता है, क्योंकि घटका तथा प्रकाशका संयोग घट प्रकाश
उभयमें समवायसम्बन्धसे रहताहै और घटका रूपभी घटमें समवायसम्बन्धहीसे
रहताहै; याते दोनोंको विषयनिष्ठ समवायसम्बन्धसे विषयसाक्षात्कारमें कार-
णता है. एवं घटादि समवेत रूपादि प्रत्यक्षके प्रति प्रकाशसंयोग उद्भूत रूपको
स्व ) रूपादिका ( आश्रय ) अधिकरण जो घटादि द्रव्य तन्निष्ठ समवायसम्बन्धसे
कारणताहै. एवं घटादिद्रव्यमें समवेत जो रूपादि उन रूपादिकोंमें समवेत जो रूपत्वादि
उन रूपत्वादिकोंके प्रत्यक्षमें प्रकाशसंयोग उद्भूतरूपको (स्व) प्रकाशसंयोग उद्भूतरू-
पका ( आश्रय ) अधिकरण जो घटादिद्रव्य उस द्रव्यमें समवेत जो रूपादि उन
रूपादिकोंमें समवेत जो रूपत्वादि उन रूपत्वादिकोंके प्रत्यक्षमें एतादृश परंपरास-
म्बन्धसे कारणताहै—इति ॥ ५४ ॥ ५५ ॥
उद्भूतस्पर्शवद्द्रव्यं गोचरः सोऽपि च त्वचः ।
भाषा—जिस द्रव्यका स्पर्श उद्भूत हो उसको त्वगिन्द्रिय ग्रहण करता है:
उद्भूतेति । उद्भूतस्पर्शवद्द्रव्यं त्वचो गोचरः । सोऽप्युद्भूतस्पर्शो
ऽपि स्पर्शत्वादिसहितः ।
भाषा—उद्भूत स्पर्शवाले द्रव्यको त्वगिन्द्रिय ग्रहण करता है. उद्भूतस्पर्शको तथा
उसमें रहनेवाली स्पर्शत्वादि जातिकोभी त्वगिन्द्रिय ग्रहण करताहै.
रूपान्यच्चक्षुषो योग्यं -
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ९५
भाषा-रूपको छोड़कर जो पदार्थ नेत्रसे ग्रहण होताहै उसीको त्वगिन्द्रियभी
ग्रहण कर सकताहै.
रूपान्यदिति । रूपभिन्नं रूपत्वादिभिन्नं च चक्षुषो यद्योग्यं
तत्त्वगिन्द्रियस्यापि ग्राह्यम् । तथा च पृथक्त्वसंख्यादयो ये
चक्षुर्ग्राह्या गुणा उक्ता एवं क्रियाजातयो योग्यवृत्तयश्च ते त्वचो
ग्राह्या इति ।
भाषा-रूपसे तथा रूपत्वादि धर्मोंसे भिन्न जिस २ वस्तुको नेत्र ग्रहण करताहै,
उसी २ पदार्थको त्वगिन्द्रियभी ग्रहण करताहै. एवं नेत्रोंद्वारा ग्रहणयोग्य पूर्व कहे
जो 'पृथक्त्व-संख्यादि गुण' तथा प्रत्यक्ष योग्यद्रव्योंकी 'क्रिया' और 'जातियां' उन
सबको त्वगिन्द्रियभी ग्रहण करताहै.
- रूपमत्रापि कारणम् ॥ ५६ ॥
द्रव्याध्यक्षे-
भाषा-द्रव्य त्वाचप्रत्यक्षमेंभी रूपहीको कारणता है ॥ ५६ ॥
अत्रापि त्वगिन्द्रियजन्यद्रव्यप्रत्यक्षेऽपि, रूपं कारणम् । तथा
च बहिरिन्द्रियजन्यद्रव्यप्रत्यक्षे रूपं कारणमिति । नवीनास्तु
बहिरिंद्रियजन्यद्रव्यप्रत्यक्षे रूपं न कारणं प्रमाणाभावात्,
किंतु चाक्षुषप्रत्यक्षे रूपं स्पार्शनप्रत्यक्षे स्पर्शः कारणमन्वयव्य-
तिरेकात् ।
भाषा-यहां त्वगिन्द्रियजन्य द्रव्य प्रत्यक्षमेंभी रूप कारण है; अर्थात् रूपसे
विना द्रव्यका त्वाचप्रत्यक्षभी नहीं होता. इसरीतिसे बाह्यइन्द्रियजन्य द्रव्यप्रत्यक्षके
प्रति लाघवसे रूप कारण है और नवीन आचार्य गंगेशोपाध्यायादिकोंका यह
मत है कि-बाह्य द्रव्य प्रत्यक्षके प्रति रूपको कारणता माननेमें कोई प्रबल युक्ति
प्रमाण नहींहै किंतु नेत्रजन्य प्रत्यक्षमें रूपको और त्वाच प्रत्यक्षमें स्पर्शको
भिन्न २ कारणता है. इस कार्यकारणभावका ग्रहण अन्वयव्यतिरेक द्वारा होताहै
अर्थात् पूर्वोक्त रीतिसे रूपसत्त्वसे चाक्षुषप्रत्यक्ष सत्त्व रूपके अभावसे चाक्षुषप्रत्यक्षका
अभाव सिद्ध है. ऐसेही स्पर्शसत्त्वसे त्वाचप्रत्यक्षसत्त्व स्पर्शाभावसे त्वाचप्रत्यक्षका
अभाव अनुभव सिद्ध है.
९६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
बहिरिन्द्रियजन्यद्रव्यप्रत्यक्षमात्रे किं कारणमितिचेत् । न
किञ्चित्। आत्मावृत्तिशब्दभिन्नविशेषगुणत्त्वं वा प्रयोजकमस्तु ।
रूपस्य कारणत्वे लाघवमिति चेत् । न। वायोस्त्वगिन्द्रियेणाग्रह-
णप्रसङ्गात्। इष्टापत्तिरिति चेत्। उद्भूतरूपर्श एव लाघवात् कार-
णमस्तु प्रभाया अप्रत्यक्षत्वे त्विष्टापत्तिरित्येव किं नेष्यते ।
प्राचीन-बाह्यइन्द्रियजन्य द्रव्य प्रत्यक्षमात्रमें अनुगत एक कारण कौन है? नवीन-
कोई नहीं. अथवा आत्मामें न वर्तनेवाले जो शब्दसे भिन्न विशेष गुण, तादृश गुण-
वत्त्व बाह्यद्रव्य प्रत्यक्षके प्रति कारण है; अर्थात् आत्मामें न वर्तनेवाले शब्दभिन्न
विशेषगुण पृथ्वी आदि चारहीमें रहते हैं तादृश गुणवत्त्व धर्म उन चारहीमें है; याते
वही बाह्यद्रव्य प्रत्यक्षमें कारण हैं. प्राचीन-यदि बाह्य प्रत्यक्षमात्रके प्रति केवल
रूपको कारणता माने तो लाघव है. नवीन-वायुका त्वगिन्द्रियसे साक्षात्कार नहीं
होगा. प्राचीन-हमको वायुका न प्रत्यक्ष होना इष्ट है; क्योंकि हमारे सिद्धान्तमें
वायुका स्पर्श रूपलिंगसे अनुमान होताहै. नवीन-बाह्येन्द्रियजन्य द्रव्यप्रत्यक्षके
प्रति यदि उद्भूतस्पर्शहीको लाघवसे कारणता मान लें तो क्या दोषहै? प्राचीन-
(प्रभा) प्रकाशका प्रत्यक्ष नहीं होगा, क्योंकि उसमें स्पर्शरूप कारण नहीं है. नवीन-
प्रभाका नाभी प्रत्यक्ष हो तो आपकी क्या हानि है? जैसे आपने वायुके प्रत्यक्षाभाव
में इष्टापत्ति मानी है वैसेही प्रभाके प्रत्यक्षाभावमेंभी इष्टापत्ति माननी
उचित है.
तस्मात् प्रभां पश्यामीतिवद्वायुं स्पृशामीति प्रत्ययस्य
सत्त्वाद्वायोरपि प्रत्यक्षत्वं भवत्येव । बहिर्द्रव्यप्रत्यक्षमात्रे तु न
रूपस्य न वा स्पर्शस्य हेतुत्वम् । वायुप्रभयोरेकत्वं गृह्यत एव,
क्वचित् द्वित्वादिकमपि, क्वचित् संख्यापरिमाणाद्यग्रहो दोषा-
दित्याहुः ॥ ५६ ॥
भाषा-इसलिये यही उचित है कि जैसे "मैं प्रभाकूं देखताहूं" यह बुद्धि होती है,
वैसेही " मैं वायुकी स्पर्श करताहूं " यह बुद्धिभी साक्षात्कारात्मिका है. इससे वायु-
का प्रत्यक्षभी होताही है, कोई बाधक नहीं बाह्यद्रव्य प्रत्यक्षमात्रमें न केवलरूप कारण
है और न केवल स्पर्शकारण है. प्रभागत एकत्व संख्याको जैसे नेत्र ग्रहण करता है
वैसेही वायुगत एकत्व संख्याको त्वचा ग्रहण करतीहै और कहीं सजातीय प्रत्यय
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ९७
न हो तो वायुगत द्वित्व परिमाणादिकोंका ग्रहण भी होताहै. जैसे 'द्वितीयोऽयं महान्
वायुः' इस प्रत्ययमें द्वित्व तथा परिमाण उभयका भानहै और कहीं सजातीय प्रत्ययरूप
दोषसे संख्यापरिमाण आदिकोंका ग्रहण नहींभी होता ॥ ५६ ॥
– त्वचो योगो मनसा ज्ञानकारणम् ।
भाषा-मनके साथ त्वगिन्द्रियका सम्बन्ध ज्ञान सामान्यमें कारण है.
त्वचो योग इति । त्वङ्मनःसंयोगो ज्ञानसामान्ये कारणमित्यर्थः ।
किं तत्र प्रमाणम्, सुषुप्तिकाले त्वचं त्यक्त्वा पुरीततिवर्तमाननेन
मनसा ज्ञानाजननमिति ।
भाषा-त्वचामनका संयोग जन्यज्ञानमात्रमें कारण है. शंका-इसमें क्या प्रमाण
है? समाधान-गाढनिद्राकालमें त्वचासम्बन्धको त्यागके पुरीततीनामा नाडीमें
मन प्रवेश करता है तो ज्ञान नहीं होता. यही प्रमाण है.
ननु सुषुप्तिकाले किं ज्ञानं भविष्यति, अनुभवरूपं स्मरणरूपं
वा । नाद्यः, अनुभवसामग्र्यभावात् । तथाहि। चाक्षुषादिप्रत्यक्षे
चक्षुरादिना सह मनःसंयोगस्य हेतुत्वात्, तदभावादेव न चाक्षु-
षादिप्रत्यक्षम्,ज्ञानादेरभावादेव न मानसप्रत्यक्षम्,ज्ञानाद्यभावे
चात्मनोऽपि न प्रत्यक्षम्, एवं व्याप्तिज्ञानाभावान्नानुमितिः, सादृ-
श्यज्ञानाभावान्नोपमितिः, पदज्ञानाभावान्न शाब्दबोध इत्यनुभ-
वसामग्र्याभावान्नानुभवः, उद्बोधकाभावाच्च न स्मरणम्। मैवम् ।
सुषुप्तिप्राक्कालोत्पन्नेच्छादिव्यक्तेस्तत्सम्बन्धेनात्मनश्च प्रत्यक्ष-
त्वप्रसङ्गात् । तदतीन्द्रियत्वे मानाभावात् ।
शंका-सुषुप्तिकालमें यदि त्वङ्मनःसंयोग मानभी लिया जाय तो उस कालमें
कैसा ज्ञान होसकताहै? अनुभवरूप, अथवा स्मरणरूप? यदि अनुभवरूप कहो तो
युक्त नहीं; क्योंकि उस कालमें अनुभवजनकसामग्रीका अभाव है. अनुभवजनक
सामग्री मनका नेत्रादि इन्द्रियोंके साथ संयोगरूपा है. चाक्षुषत्वाचादि प्रत्यक्षमें चक्षु-
र्मनःसंयोग तथा त्वङ्मनःसंयोग आदिकोंको हेतुता है. सुषुप्तिकालमें त्वङ्मनःसंयो-
गादिके अभावसे त्वचाचाक्षुषादि प्रत्यक्ष नहीं होता; सुषुप्तिकालमें आत्माके ज्ञानादि
गुणोंकाभी तिरोधान है. याते मानसप्रत्यक्षभी नहीं होसकता और आत्माकाभी मा-
७
९८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली [ प्रत्यक्ष-
नसप्रत्यक्ष ज्ञानादि गुणोंद्वाराही होताहै.उसकालमें ज्ञानादिगुणोंके न होनेसे आत्मा-
का मानसप्रत्यक्षभी नहीं हो सकता. ऐसेही सुषुप्तिकालमें व्याप्तिज्ञानके न होनेसे
अनुमितिज्ञानभी नहीं हो सकता. सादृश्यज्ञानके न होनेसे उपमितिज्ञानभी नहीं
हो सकता, एवं सुषुप्तिकालमें पदज्ञान न होनेसे शाब्दबोधात्मक ज्ञानभी नहीं हो-
सकता.इस पूर्वोक्तरीतिसे सुषुप्तिकालमें अनुभव सामग्रीके न होनेसे अनुभव ज्ञान नहीं
होसकता. एवं सुषुप्तिकालमें संस्कारोंका उद्बोधक कोई पदार्थ नहीं है याते स्मृतिरूप
ज्ञानभी नहीं होता. समाधान-सुषुप्तिके प्रथमक्षणमें उत्पन्न हुई ( इच्छादि ) अ-
र्थात् इच्छाके आदिमें होनेवाली ज्ञान व्यक्तिका तथा उस ज्ञानके सम्बन्धसे आत्माका
साक्षात्कार होना चाहिये. शंका-सुषुप्तिके प्रथमक्षणमें ज्ञानव्यक्ति अतीन्द्रिय उत्पन्न
होती है इसलिये उसका तथा उसके सम्बन्धसे आत्माका प्रत्यक्ष नहीं होता-समा-
धान-उस ज्ञानव्यक्तिके अतीन्द्रिय माननेमें कोई प्रमाण नहीं है.
सुषुप्तिप्राक्काले निर्विकल्पकमेव जायत इत्यत्रापि प्रमाणाभावा-
त् । अथ ज्ञानमात्रे त्वङ्मनःसंयोगस्य यदि कारणत्वं तदा रास-
नचाक्षुषादिप्रत्यक्षकाले स्पार्शनप्रत्यक्षं स्यात्, विषयत्वक्संयो-
गस्य त्वङ्मनःसंयोगस्य च सत्त्वात् परस्परप्रतिबन्धादेकमपि
वा न स्यादिति ।
शंका-सुषुप्तिके पूर्वक्षणमें उत्पन्नहुआ ज्ञान नियमसे ( निर्विकल्पक ) प्रकारतादि
रहित होता है. याते उसका प्रत्यक्ष तथा उसके सम्बन्धसे आत्माका प्रत्यक्ष बन
नहीं सकता. समाधान-सुषुप्तिके प्रथम लक्षणमें ज्ञानके नियमसे ( निर्विकल्प )
प्रकारतादि शून्य उत्पन्न होनेमेंभी कोई प्रमाण नहीं है.शंका-यदि ज्ञानमात्रके प्रति
त्वचा मनका संयोग कारण है तो रसनाजन्य प्रत्यक्षकालमें तथा नेत्रादिजन्य प्रत्यक्ष
कालमें त्वाच प्रत्यक्षभी होना चाहिये; क्योंकि विषय घटादिके साथ त्वचाका
तथा त्वचाके साथ मनका संयोग विद्यमान है. समाधान-चाक्षुषादि ज्ञान जनका
सामग्री त्वचा जन्य स्पर्शन ज्ञानमें प्रतिबन्धका है इसलिये चाक्षुष ज्ञानकालमें
स्पार्शनज्ञान नहीं होता. शंका-यदि ज्ञानकी सामग्रियोंमें प्रतिबध्य प्रतिबन्धक
भावकी कल्पना की जाय तो विषयइन्द्रियसंयोग तथा इन्द्रियमनःसंयोगरूपा ज्ञान
सामग्री सर्वत्र उपस्थित है, वह सामग्री यदि ( परस्पर ) एक दूसरीकी प्रतिबन्धका
होगी तो कोई ज्ञानभी उत्पन्न नहीं होगा.
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ९९
अत्र केचित् । पूर्वोक्तयुक्त्या त्वङ्मनोयोगस्य हेतुत्वे सिद्धे
चाक्षुषादिसामग्र्याः स्पार्शनादिप्रतिबन्धकत्वमनुभवानुरोधात्
कल्प्यत इति । अन्ये तु सुषुप्त्यनुरोधाच्चर्ममनःसंयोगस्य ज्ञान-
हेतुत्वं कल्प्यम्, चाक्षुषादिप्रत्यक्षकाले च त्वङ्मनःसंयोगाभा-
वान्न स्पार्शनप्रत्यक्षमिति वदन्ति ।
समाधान-यहां कई आचार्य ऐसा कहते हैं कि-“सुषुप्तिकाले त्वचं त्यक्त्वा पुरी-
ततिवर्तमानेन मनसा ज्ञानाजननमिति” अर्थात् सुषुप्तिकालमें त्वगिन्द्रियको त्यागके
पुरीततीनामक नाडीमें वर्तमान मनसे ज्ञान उत्पन्न नहीं होता.इति।इस पूर्वोक्त युक्ति
से त्वचा मनःसंयोगको ज्ञानहेतुता सिद्ध है और एककालमें नाना ज्ञानकी उत्पत्ति
भी अनुभवसे विरुद्ध है. इसलिये अनुभवके अनुरोधसे चाक्षुषादि ज्ञानकी सामग्री
को स्पार्शन ज्ञानके प्रति प्रतिबन्धक कल्पना करसकते हैं. इस पूर्व प्रकरणमें 'त्वचा'
शब्दसे त्वगिन्द्रियका ग्रहण है. इसी स्थलमें ( अन्येतु ) पक्षधरमिश्र ऐसे कहते हैं
कि-सुषुप्तिके अनुरोधसे ( चर्म ) त्वग् इन्द्रियके गोलकके तथा मनके परस्पर संयो-
गको ज्ञान सामान्यके प्रति कारणता कल्पना करनी उचित है. ऐसे माननेसे पूर्व
दिया जो चाक्षुषादि प्रत्यक्षकालमें त्वाच प्रत्यक्ष आपत्तिरूप दोष वहभी नहीं है;
क्योंकि चाक्षुषादि प्रत्यक्षकालमें त्वग् इन्द्रियका तथा मनका संयोग नहीं है इसलिये
त्वाचप्रत्यक्षकी योग्यता नहीं है.
मनोग्राह्यं सुखं दुःखमिच्छा द्वेषो मतिः कृतिः ॥५७॥
भाषा-सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, ज्ञान तथा यत्न इन छहको मन इन्द्रिय ग्रहण
करता है ॥ ५७ ॥
मनोग्राह्यमिति।मनोजन्यप्रत्यक्षविषय इत्यर्थः।मतिर्ज्ञानं,कृतिः
प्रयत्नः। एवं सुखत्वादिकमपि मनोग्राह्यम् । एवमात्मापि मनो
ग्राह्यः, किंतु मनोमात्रस्य गोचर इत्यनेन पूर्वमुक्तत्वादत्र
नोक्तः॥ ५७ ॥
भाषा-यह सब मानस प्रत्यक्षके विषय हैं ऐसेही इन सबमें रहनेवाली ' सुख-
त्व ' आदि जातियोंकाभी मानस प्रत्यक्षही होता है. ऐसेही आत्माकाभी मानस
प्रत्यक्षही होता है "मनोमात्रस्य गोचरः५०" इस ग्रन्थसे पूर्व कहआये हैं; इसलिये
यहां नहीं कहा ॥ ५७ ॥
१०० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
ज्ञानं यन्निर्विकल्पाख्यं तदतीन्द्रियमिष्यते ।
भाषा-और जो निर्विकल्पात्मक ज्ञान है उसका किसी इन्द्रियद्वारा प्रत्यक्ष
नहीं होता.
ज्ञानं यदिति। चक्षुःसंयोगाद्यनन्तरं घट इत्याकारकं घटत्वादिवि-
शिष्टज्ञानं न सम्भवति पूर्वं विशेषणस्य घटत्वादेर्ज्ञानाभावात्,
विशिष्टबुद्धौ विशेषणज्ञानस्य कारणत्वात् । तथा च प्रथमतौ
घटघटत्वयोर्वैशिष्ट्यानवगाहि एव ज्ञानं जायते तदेव निर्विक-
ल्पकात्मकम् । तच्च न प्रत्यक्षम् ।
भाषा--उसमें प्रमाण यह है कि-नेत्रइन्द्रियके संयोगआदिके पश्चात् ही 'अयं
घटः' इत्याकारक घटत्वादि प्रकारक घटादिविशेष्यक विशिष्ट ज्ञान नहीं होता;
क्योंकि उससे पहले विशेषणीभूत घटत्वादिका ज्ञान नहीं है. और 'अयंघटः'
इत्याकारक विशिष्टबुद्धिमें ' घटत्वादि ' विशेषणज्ञानको कारणताका नियम है;
इसलिये पहले घटघटत्वादि उभयका ( वैशिष्ट्यानवगाहि ) जुदा जुदा "इमे घट-
घटत्वे" इत्याकारक ज्ञान ही होता है उसीका नाम निर्विकल्प ज्ञान है. वह निर्विकल्पकें
ज्ञान प्रत्यक्ष नहीं होता ।
तथाहि । वैशिष्ट्यानवगाहिज्ञानस्य प्रत्यक्षं न भवति घटमहं
जानामीति प्रत्ययात् । तत्रात्मनि ज्ञानं प्रकारीभूय भासते,ज्ञाने
घटस्तत्र घटत्वम् । यः प्रकारः स एव विशेषणमित्युच्यते ।
विशेषणे यद्विशेषणं तद्विशेषणतावच्छेदकमित्युच्यते । विशे-
षणतावच्छेदकप्रकारकं ज्ञानं विशिष्टवैशिष्ट्यज्ञाने कारणम् ।
भाषा-वह इसरीतिसे है कि (वैशिष्ट्यानवगाहि) 'विशेष्यता' प्रकारता, संसर्गता
को न विषय करनेवाले ज्ञानका प्रत्यक्ष नहीं होता क्योंकि ज्ञानका प्रत्यक्ष तो
“घटमहं जानामि” इत्याकारक अनुव्यवसायात्मक प्रतीतिमें होता है. इसप्रती-
तिमें आत्मामें ज्ञान विशेषणरूपसे प्रतीत होता है और ज्ञानमें घट विशेषणरूपसे
भासता है. एवं घटमें घटत्वविशेषण रूपसे भासता है. प्रकार और विशेषण ये एक
अर्थको कहनेवाले दो शब्द हैं. घटादिविशेषणोंमें जो घटत्वादि विशेषण है उन्हींको
विशेषणताके अवच्छेदक धर्मभी कहते हैं. उन घटत्वादिधर्मोंका जो विशेषणतावच्छे-
दक प्रकारकरूपसे ज्ञान वही 'घटमहं जानामि' इत्याकारक विशिष्ट वैशिष्ट्यावगाहि
ज्ञानमें कारण है.
·-परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. १०१
निर्विकल्पके च घटत्वादिकं न प्रकारः तेन घटत्वादिविशिष्टघ-
टादिवैशिष्ट्यभानं ज्ञाने न सम्भवति। घटत्वाद्यप्रकारकं च घटा-
दिविशिष्टज्ञानं न सम्भवति, जात्यखण्डोपाध्यतिरिक्तपदार्थज्ञा-
नस्य किञ्चिद्धर्मप्रकारकत्वनियमात् ।
भाषा-और निर्विकल्पकज्ञानमें घटत्वादिधर्मोंका प्रकारतारूपसे भान नहीं है
इसलिये घटत्वादि विशिष्ट जो घटादि, उन घटादिकोंका ( वैशिष्ट्य ) विशेषणरूपसे
भान निर्विकल्पक ज्ञानमें नहीं होता और घटत्वादिप्रकारकां जिसमें न भान हो
किन्तु केवल घटही प्रकाररूपसे जिसमें भान हो ऐसा घटादिविशिष्ट ज्ञान होही
नहीं सकता; क्योंकि जाति तथा अखण्ड उपाधिसे भिन्न पदार्थोंका किसी एक
धर्महीसे अवश्य भान होताहै, अन्यथा नहीं घटादि पदार्थ जाति तथा अखण्डोपा-
धिसे भिन्न हैं इसलिये उनका घटत्वादि धर्मोंद्वारा भान होताहै, केवल नहीं. अख
ण्डउपाधि नाम प्रतियोगित्व अनुयोगित्व आदि अनिर्वचनीय धर्मोंका है-इति ।
महत्त्वं षड्विधे हेतुः-
भाषा-पूर्वोक्त षड्विध प्रत्यक्षमें महत्त्वपरिमाणको कारणता है.
महत्त्वमिति । द्रव्यप्रत्यक्षे महत्त्वं समवायसम्बन्धेन कारणम् ।
द्रव्यसमवेतानां जातिगुणकर्मणां प्रत्यक्षे स्वाश्रयसमवायस-
म्बन्धेन कारणम्। द्रव्यसमवेतसमवेतानां गुणत्वकर्मत्वरूपत्वा-
दीनां प्रत्यक्षे स्वाश्रयसमवेतसमवायसम्बन्धेन कारणमिति ।
भाषा-द्रव्यके प्रत्यक्षमें महत्त्व परिमाण समवायसम्बन्धसे कारण है अर्थात्
जिस द्रव्यमें समवायसम्बन्धसे महत्त्वपरिमाण है उसीका प्रत्यक्ष होसकताहै,
अन्यका नहीं और द्रव्यमें समवायसम्बन्धसे रहनेवाले जाति गुण कर्म आदिकोंके
प्रत्यक्षमें महत्त्वपरिमाणको 'स्वाश्रयसमवाय' सम्बन्धसे कारणता है. 'स्व' शब्दसे
महत्त्वपरिमाण उसका आश्रय द्रव्य, उसमें समवायसम्बन्धसे जातिगुणादि रहतेहैं.
ऐसेही द्रव्यमें समवेत जो गुण कर्मरूपादि उन गुणकर्मरूपादिकोंमें समवेत जो
गुणत्वकर्मत्व रूपत्वादि उन गुणत्वकर्मत्व रूपत्वादिकोंके प्रत्यक्षके प्रति महत्त्वपरि-
माणको 'स्वाश्रयसमवेतरूमवाय' सम्बन्धसे कारणता है. 'स्व' शब्दसे महत्त्वपरिमाण
उसका आश्रय द्रव्य उसमें समवेत गुण कर्म रूपादि उनमे गुणत्व कर्मत्व
रूपत्वादिकोंका समवायसम्बन्ध है. एतादृश सम्बन्धसे महत्त्व परिमाणको गुणत्वादि
प्रत्यक्षके प्रति कारणता है-इति.
१०२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
-इन्द्रियं करणं मतम् ॥ ५८ ॥
भाषा-पूर्वोक्त षड्विध प्रत्यक्षमें नेत्रादिइन्द्रियोंको असाधारण कारण-
ता है ॥ ५८ ॥
इन्द्रियमिति।अत्रापि षड्विध इत्यनुषज्यते।इन्द्रियत्वं तु न जातिः
पृथिवीत्वादिना साङ्कर्यप्रसङ्गात् । किंतु शब्देतरोद्भूतविशेष-
गुणानाश्रयत्वे सति ज्ञानकारणमनःसंयोगाश्रयत्वम् । आत्मन्य-
तिव्यातिवारणाय सत्यन्तम्, उद्भूतविशेषगुणस्य शब्दस्यश्रोत्रे
सत्त्वाच्छब्देतरेति, विशेषगुणस्य रूपादेश्चक्षुषि सत्त्वादुद्भूतेति ।
उद्भूतत्वं न जातिः शुक्लत्वादिना सङ्करात् ।
भाषा-इन्द्रियोंमें इन्द्रियत्वरूप धर्मका पृथिवीत्व जलत्वादिधर्मोंके साथ संकर है
इसलिये 'इन्द्रियत्व' धर्मजातिरूप नहींहै,किन्तु सखण्डोपाधिरूप है.बहुपदार्थघटित
धर्मका नाम सखण्डोपाधि है.यह 'धर्म' शब्दसे इतर ( रूपसुखादि ) उद्भूत विशे-
षगुणके अनाश्रय तथा ज्ञानके कारणीभूत मनःसंयोगके आश्रयरूप इन्द्रियमें रहता
है यही इन्द्रियका निर्वचन है, ज्ञान कारणीभूत मनःसंयोगका आश्रय आत्माभी है
उसके वारणार्थ 'शब्देतरोद्भूत विशेषगुणानाश्रत्वे सति' कहा. आत्मा शब्देतरउद्भूत
विशेषगुण 'सुखादि' का आश्रय है,यति दोष नहीं. शब्दरूप उद्भूतविशेषगुण श्रोत्र
इन्द्रियमें है. श्रोत्र संग्रहार्थ शब्देतरउद्भूत गुणका अनाश्रय कहा, अनुद्भूतरूपादि
विशेषगुण नेत्रादि इन्द्रियोंमें विद्यमान हैं; उनके वारणार्थ उद्भूतविशेषगुण कहा
अर्थात् 'उद्भूत' पदके न देनेसे नेत्रादि इन्द्रियोंमें अव्याप्ति होगी. उद्भूतत्वरूप
धर्मका शुक्लत्वादि धर्मोंके साथ संकर है. इसलिये 'उद्भूतत्व' धर्मजातिरूप
नहीं है.
न च शुक्लत्वादिव्याप्यं नानैवोद्भूतत्वमिति वाच्यम् । उद्भूतरूप
१ संकरका प्रकार यह है कि-पृथिवीत्वरूप धर्मको छोड़कर इन्द्रियत्व धर्म नेत्रादिकोंमें
रहताहै और इन्द्रियत्वरूप धर्मको छोड़कर पृथिवीत्वरूप धर्म घटादिपृथिवीमें रहताहै. एवं पृथिवीत्व
इन्द्रियत्व उभयधर्मका एकत्र समावेश घ्राणेन्द्रियमें है-इति. ऐसेही जलत्वादि धर्मोंके साथ
संकर जानलेना.
२ संकरका प्रकार यह है कि-शुक्लत्वधर्मको छोड़कर उद्भूतत्व उद्भूतगन्धमें है एवं उद्भूतत्व
धर्मको छोड़कर शुक्लत्वधर्म अनुद्भूत शुक्लमें है एवं धर्मद्वयका समावेश उद्भूतशुक्लमें है. ऐसेही
नीलत्वादिधर्मोंके साथ जानलेना.
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. १०३
वत्त्वादिना चाक्षुषादौ जनकतानुपपत्तेः । किंतु शुक्लत्वादिव्या-
प्यमनुद्भूतत्वं नाना तदभावकूटश्चोद्भूतत्वम्, तच्च संयोगादावपि ।
तथा च शब्देतरोद्भूतगुणः संयोगादिश्चक्षुरादेरस्त्यतो विशेषे
ति । कालादिवारणाय विशेष्यदलम् ।
शंका-शुक्लत्वादि जातियोंके व्याप्यधर्म उद्भूतत्व अनेक माने तो क्या दोष है?
समाधान-यदि अनेक मानें तो चाक्षुषप्रत्यक्षमें उद्भूतरूपत्वादि धर्मोंसे जनकता
नहीं बन सकेगी क्योंकि उन उद्भूतरूपत्वादिकोंको यदि एक एक व्यक्तिको कार-
णतावच्छेदक मानें तो एक व्यक्तिके सत्त्वकालमेंभी द्वितीय ‘ उद्भूतत्व ’ व्यक्तिका
अभाव होनेसे उद्भूतरूपत्वादिकोंका चाक्षुषप्रत्यक्षके साथ कार्यकारणभावका व्यभिचार
होगा और अनेक उद्भूतत्व किसीएक व्यक्तिमेंभी नहीं रहसकते इसलिये कारणताके
अवच्छेदक नहीं होसकते; ( किन्तु ) परन्तु ऐसा कह सकते हैं कि शुक्लत्वादिधर्मोंके
व्याप्य ‘ अनुद्भूतत्व ’ धर्म अनेक हैं और उन सबके अभावका पुंजरूप एक
‘ उद्भूतत्व ’ है, वह उद्भूतत्वरूप धर्म संयोगादिगुणोंमेंभी है, एवं शब्दसे इतर उद्भूत
गुणसंयोगादिक नेत्रादि इन्द्रियोंमें विद्यमान हैं, इसलिये ‘ उद्भूतविशेषगुण ’ कहा.
संयोगादि विशेषगुण नहीं ह यांते अव्याप्तिरूप दोष नहीं है. शब्देतरउद्भूत विशेष
गुणके अनाश्रय कालादिभी हैं उनके वारणार्थ उत्तर विशेष्यदल कहाहै. कालादि
शब्देतरउद्भूतविशेषगुणके अनाश्रयहैंभी परन्तु ज्ञानकारणीभूत मनःसंयोगके आश्रय
नहींहैं यांते दोष नहीं.
इन्द्रियावयवविषयसंयोगस्यापि प्राचां मते प्रत्यक्षजनकत्वादिन्द्रि
यावयववारणाय, कालादौ रूपाभावप्रत्यक्षे सन्निकर्षघटकतया
कारणीभूतचक्षुःसंयोगाद्याश्रयस्य कालादेश्च वारणाय मनः
पदम् । ज्ञानकारणमित्यपि तद्वारणाय । करणमिति । असाधा-
रणं कारणं करणम् । असाधारणत्वं व्यापारवत्त्वम् ॥ ५८ ॥
भाषा-प्राचीन आचार्य नेत्रादिइन्द्रियके अवयवोंको तथा घटादि विषयके परस्पर
संयोगकोभी प्रत्यक्षके प्रति कारण मानतेहैं पूर्वोक्त इन्द्रियके लक्षणकी इन्द्रियके एकदेश
अवयवमें प्रसक्तिवारणार्थ ‘ मनः ’ पदका निवेश है. अथवा नवीन आचार्य कालादि-
कोंमें रूपाभावका चाक्षुष प्रत्यक्ष मानते हैं उसमें कारणीभूत चक्षुःसंयोगका आश्रय
होनेसे संबन्धका सम्पादक कालभी है । इसलिये “ काले रूपं नास्ति ” इ