न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ९५
भाषा-रूपको छोड़कर जो पदार्थ नेत्रसे ग्रहण होताहै उसीको त्वगिन्द्रियभी
ग्रहण कर सकताहै.
रूपान्यदिति । रूपभिन्नं रूपत्वादिभिन्नं च चक्षुषो यद्योग्यं
तत्त्वगिन्द्रियस्यापि ग्राह्यम् । तथा च पृथक्त्वसंख्यादयो ये
चक्षुर्ग्राह्या गुणा उक्ता एवं क्रियाजातयो योग्यवृत्तयश्च ते त्वचो
ग्राह्या इति ।
भाषा-रूपसे तथा रूपत्वादि धर्मोंसे भिन्न जिस २ वस्तुको नेत्र ग्रहण करताहै,
उसी २ पदार्थको त्वगिन्द्रियभी ग्रहण करताहै. एवं नेत्रोंद्वारा ग्रहणयोग्य पूर्व कहे
जो 'पृथक्त्व-संख्यादि गुण' तथा प्रत्यक्ष योग्यद्रव्योंकी 'क्रिया' और 'जातियां' उन
सबको त्वगिन्द्रियभी ग्रहण करताहै.
- रूपमत्रापि कारणम् ॥ ५६ ॥
द्रव्याध्यक्षे-
भाषा-द्रव्य त्वाचप्रत्यक्षमेंभी रूपहीको कारणता है ॥ ५६ ॥
अत्रापि त्वगिन्द्रियजन्यद्रव्यप्रत्यक्षेऽपि, रूपं कारणम् । तथा
च बहिरिन्द्रियजन्यद्रव्यप्रत्यक्षे रूपं कारणमिति । नवीनास्तु
बहिरिंद्रियजन्यद्रव्यप्रत्यक्षे रूपं न कारणं प्रमाणाभावात्,
किंतु चाक्षुषप्रत्यक्षे रूपं स्पार्शनप्रत्यक्षे स्पर्शः कारणमन्वयव्य-
तिरेकात् ।
भाषा-यहां त्वगिन्द्रियजन्य द्रव्य प्रत्यक्षमेंभी रूप कारण है; अर्थात् रूपसे
विना द्रव्यका त्वाचप्रत्यक्षभी नहीं होता. इसरीतिसे बाह्यइन्द्रियजन्य द्रव्यप्रत्यक्षके
प्रति लाघवसे रूप कारण है और नवीन आचार्य गंगेशोपाध्यायादिकोंका यह
मत है कि-बाह्य द्रव्य प्रत्यक्षके प्रति रूपको कारणता माननेमें कोई प्रबल युक्ति
प्रमाण नहींहै किंतु नेत्रजन्य प्रत्यक्षमें रूपको और त्वाच प्रत्यक्षमें स्पर्शको
भिन्न २ कारणता है. इस कार्यकारणभावका ग्रहण अन्वयव्यतिरेक द्वारा होताहै
अर्थात् पूर्वोक्त रीतिसे रूपसत्त्वसे चाक्षुषप्रत्यक्ष सत्त्व रूपके अभावसे चाक्षुषप्रत्यक्षका
अभाव सिद्ध है. ऐसेही स्पर्शसत्त्वसे त्वाचप्रत्यक्षसत्त्व स्पर्शाभावसे त्वाचप्रत्यक्षका
अभाव अनुभव सिद्ध है.