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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 114, कुल 350 में से

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पृष्ठ 114

तासां चतसृणां करणानि चत्वारि “प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः
प्रमाणानि” इति सूत्रोक्तानि वेदितव्यानि ॥ ५१ ॥
भाषा--उस बुद्धिके द्वैविध्यको प्रतिपादनकरताहै अर्थात् वह बुद्धि पहले अनुभूति
तथा स्मृतिभेदसे दो तरहकी है. उनमें अनुभूति पुनः चार तरहकी है. इन चारों
बुद्धियोंके साधन “प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि ३” अर्थात् प्रत्यक्ष १
अनुमान २, उपमान ३, शब्द ४ यह गौतमसूत्रोक्त चारप्रमाण जानने चाहिये ॥५१॥
प्रत्यक्षमप्यनुमितिरस्तथोपमितिशब्दजे ।
भाषा-एक प्रत्यक्षरूपा है, दूसरी अनुमितिरूपा है, तीसरी उपमितिरूपा है
और चौथी शब्दजन्या है.
प्रत्यक्षमिति । इन्द्रियजन्यं ज्ञानं प्रत्यक्षम्। यद्यपि मनोरूपेन्द्रिय-
जन्यं सर्वमेव ज्ञानम्, तथापीन्द्रियत्वेन रूपेणेन्द्रियाणां यत्र
ज्ञाने कारणत्वं तत्प्रत्यक्षमिति विवक्षितम्। ईश्वरप्रत्यक्षं तु न ल-
क्ष्यम्। “इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि
व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्” इति सूत्रे तथैवोक्तत्वात् ।
भाषा-नेत्रादि इन्द्रियसे उत्पन्न हुए ज्ञानका नाम प्रत्यक्ष है. यद्यपि मनोरूप
इन्द्रियजन्यता अनुमिति आदि यावत् ज्ञानोंकी है; यान्ते पूर्वोक्त लक्षण अतिव्याप्ति
ग्रस्त है, तथापि इन्द्रियत्वरूपसे इन्द्रियोंको जिस ज्ञानके प्रति कारणता है वह
ज्ञान प्रत्यक्ष है 'इन्द्रियत्व' का स्वरूप “शब्देतरोद्भूतविशेषगुणानाश्रयत्वे सति ज्ञान-
कारणमनःसंयोगाश्रयत्वम्” इत्यादि ग्रन्थसे ५८ कारिकाकी व्याख्यामें ग्रन्थकार
स्वयं लिखेगा. ज्ञानमात्रके प्रति मनको कारणता इन्द्रियत्वेन रूपेण नहीं किन्तु
मनस्त्वेन रूपेण विशेषधर्मसेहै. सुखादि साक्षात्के प्रति मनको इन्द्रियत्वेन रूपेण कारणता
है; याते मनमें इन्द्रियत्व धर्मकी हानिभी नहीं. प्रकृतमें जीवके जन्य प्रत्यक्षका विचार है
“ईश्वरका प्रत्यक्षजन्य नहीं किन्तु नित्य है याते पूर्वोक्त लक्षणका लक्ष्य नहीं है;
क्योंकि “नेत्रादि इन्द्रिय तथा घटादिरूप अर्थके परस्पर सम्बन्धसे उत्पन्न हो निर्वि-
कल्पस्वरूप हो पुनः व्यभिचार रहित निश्चयात्मक हो उस ज्ञानका नाम प्रत्यक्षहै”
इस गौतम ४ सूत्रमें जन्यप्रत्यक्षहीका लक्षण किया है.
अथवा ज्ञानाकरणकं ज्ञानं प्रत्यक्षम्, इदं लक्षणमीश्वरप्रत्यक्षसा-
धारणम् । अनुमितौ व्याप्तिज्ञानस्योपमितौ सादृश्यज्ञानस्य शा-