न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
बहिरिन्द्रियजन्यद्रव्यप्रत्यक्षमात्रे किं कारणमितिचेत् । न
किञ्चित्। आत्मावृत्तिशब्दभिन्नविशेषगुणत्त्वं वा प्रयोजकमस्तु ।
रूपस्य कारणत्वे लाघवमिति चेत् । न। वायोस्त्वगिन्द्रियेणाग्रह-
णप्रसङ्गात्। इष्टापत्तिरिति चेत्। उद्भूतरूपर्श एव लाघवात् कार-
णमस्तु प्रभाया अप्रत्यक्षत्वे त्विष्टापत्तिरित्येव किं नेष्यते ।
प्राचीन-बाह्यइन्द्रियजन्य द्रव्य प्रत्यक्षमात्रमें अनुगत एक कारण कौन है? नवीन-
कोई नहीं. अथवा आत्मामें न वर्तनेवाले जो शब्दसे भिन्न विशेष गुण, तादृश गुण-
वत्त्व बाह्यद्रव्य प्रत्यक्षके प्रति कारण है; अर्थात् आत्मामें न वर्तनेवाले शब्दभिन्न
विशेषगुण पृथ्वी आदि चारहीमें रहते हैं तादृश गुणवत्त्व धर्म उन चारहीमें है; याते
वही बाह्यद्रव्य प्रत्यक्षमें कारण हैं. प्राचीन-यदि बाह्य प्रत्यक्षमात्रके प्रति केवल
रूपको कारणता माने तो लाघव है. नवीन-वायुका त्वगिन्द्रियसे साक्षात्कार नहीं
होगा. प्राचीन-हमको वायुका न प्रत्यक्ष होना इष्ट है; क्योंकि हमारे सिद्धान्तमें
वायुका स्पर्श रूपलिंगसे अनुमान होताहै. नवीन-बाह्येन्द्रियजन्य द्रव्यप्रत्यक्षके
प्रति यदि उद्भूतस्पर्शहीको लाघवसे कारणता मान लें तो क्या दोषहै? प्राचीन-
(प्रभा) प्रकाशका प्रत्यक्ष नहीं होगा, क्योंकि उसमें स्पर्शरूप कारण नहीं है. नवीन-
प्रभाका नाभी प्रत्यक्ष हो तो आपकी क्या हानि है? जैसे आपने वायुके प्रत्यक्षाभाव
में इष्टापत्ति मानी है वैसेही प्रभाके प्रत्यक्षाभावमेंभी इष्टापत्ति माननी
उचित है.
तस्मात् प्रभां पश्यामीतिवद्वायुं स्पृशामीति प्रत्ययस्य
सत्त्वाद्वायोरपि प्रत्यक्षत्वं भवत्येव । बहिर्द्रव्यप्रत्यक्षमात्रे तु न
रूपस्य न वा स्पर्शस्य हेतुत्वम् । वायुप्रभयोरेकत्वं गृह्यत एव,
क्वचित् द्वित्वादिकमपि, क्वचित् संख्यापरिमाणाद्यग्रहो दोषा-
दित्याहुः ॥ ५६ ॥
भाषा-इसलिये यही उचित है कि जैसे "मैं प्रभाकूं देखताहूं" यह बुद्धि होती है,
वैसेही " मैं वायुकी स्पर्श करताहूं " यह बुद्धिभी साक्षात्कारात्मिका है. इससे वायु-
का प्रत्यक्षभी होताही है, कोई बाधक नहीं बाह्यद्रव्य प्रत्यक्षमात्रमें न केवलरूप कारण
है और न केवल स्पर्शकारण है. प्रभागत एकत्व संख्याको जैसे नेत्र ग्रहण करता है
वैसेही वायुगत एकत्व संख्याको त्वचा ग्रहण करतीहै और कहीं सजातीय प्रत्यय