न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
भाषा-एवं सादृश्य ज्ञानकरण हो जिस ज्ञानका, वह उपमिति रूप ज्ञान है.
पदज्ञानकरणं ज्ञानं शाब्दवोधः ।
भाषा-एवंही पद ज्ञान करण हो जिस ज्ञानका, वह ज्ञान शाब्दबोध रूप है.
वस्तुतो यां कांचिदनुमितिव्यक्तिमादाय तद्व्यक्तिवृत्तित्वे सति
यां कांचिन् प्रत्यक्षव्यक्तिमादाय तदवृत्तिजातिमत्त्वमनुमिति-
त्वम् । एवं यत्किञ्चित्प्रत्यक्षादिकमादाय तद्व्यक्तिवृत्तित्वे सति
यां कांचिदनुमितिव्यक्तिमादाय तदवृत्तिजातिमत्त्वं प्रत्यक्षादि-
कं वाच्यमिति ।
भाषा-वास्तवमें तो किसी एक अनुमिति व्यक्तिमें वर्तनेवाली तथा किसी एक
प्रत्यक्ष व्यक्तिमें न वर्तनेवाली जो अनुमितित्वजाति तादृश जातिवाली अनुमिति है.
एवं किसी एक प्रत्यक्ष व्यक्तिमें वर्तनेवाली तथा किसीएक अनुमिति व्यक्तिमें न वर्तने-
वाली 'प्रत्यक्षत्व'रूपा जाति तादृश जातिवाला प्रत्यक्ष है.ऐसेही उपमिति ज्ञानका तथा
शाब्दबोधका लक्षणभी करलेना.
घ्राणजादिप्रभेदेन प्रत्यक्षं षड्विधं मतम् ॥५२॥
भाषा-पूर्वोक्त प्रत्यक्ष घ्राणज आदिभेदसे षट् प्रकारका है ॥ ५२ ॥
घ्राणजादीति। घ्राणजं रासनं चाक्षुषं स्पार्शनं श्रौतं मानसमिति
षड्विधं प्रत्यक्षम् । नचेश्वरप्रत्यक्षस्याविभजनान्न्यूनत्वम् ।
जन्यप्रत्यक्षस्यैव निरूपणीयत्वात्, उक्तसूत्रानुसारात् ।
भाषा-घ्राणद्वारा १, रसनाद्वारा २, नेत्रद्वारा ३, त्वचाद्वारा ४, श्रोत्रद्वारा ५,
और मनद्वारा ६.ऐसेछः तरहका प्रत्यक्ष है.शंका-ईश्वर प्रत्यक्षका विभाग न करनेसे
ग्रन्थकारकी न्यूनता है. समाधान-पूर्वोक्त गौतम सूत्रानुरोधसे इस प्रकरणमें जन्य
प्रत्यक्षहीका निरूपण है ॥ ५२ ॥
घ्राणस्य गोचरो गन्धो गन्धत्वादिरपि स्मृतः ।
गोचर इति । ग्राह्य इत्यर्थः ।
भाषा-गन्ध गुण तथा गन्धत्वादि जातियोंका घ्राण इन्द्रियद्वारा ग्रहण होता है.
गन्धत्वादिरिति । आदिपदात् सुरभित्वासुरभित्वपरिग्रहः। गन्ध